करनाल: हिंदू धर्म में एकादशी का अपना महत्व होता है. हर महीने आने वाली एकादशी का व्रत व पूजन विधि भी उसी के अनुसार अलग अलग होती है. हिंदू पंचांग के अनुसार 15 मई को अपरा एकादशी मनाई जाएगी. जेष्ठ माह के कृष्ण पक्ष में जो एकादशी आती है, उस एकादशी को अपरा एकादशी कहा जाता है. वहीं कुछ लोग इसको अंचला एकादशी के नाम से भी जानते हैं.
हिंदू मान्यताओं के अनुसार अपरा एकादशी के दिन व्रत रखा जाता हैं और यह दिन भगवान विष्णु को समर्पित होता है. भगवान विष्णु के साथ इस दिन लक्ष्मी माता की पूजा भी की जाती है. शास्त्रों में बताया गया है कि जो भी एकादशी के दिन व्रत रखते हैं. उन्हें सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है और उन्हें स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है. जो मनुष्य अपरा एकादशी का व्रत रखता है, उसको प्रेत योनि से मुक्ति मिल जाती है.
अपरा एकादशी का शुभ मुहूर्त: हिंदू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की अपरा एकादशी की शुरुआत 15 मई को सुबह 2 बजकर 46 मिनट से होगा. जबकि इसका समापन अगले दिन 16 मई को सुबह 1 बजकर 3 मिनट पर होगा. जिस दिन हिंदू पंचांग के अनुसार तिथि की शुरुआत हो रही है. उस दिन सूर्य उदय के साथ ही व्रत रखा जाता है. इसलिए 15 मई को उदया तिथि के साथ अपरा एकादशी व्रत रखा जाएगा.
पूजा का शुभ मुहूर्त : हिंदू पंचांग के अनुसार 15 मई को अपरा एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 8 बजकर 54 मिनट से सुबह 10 बजकर 36 मिनट है. अपरा एकादशी व्रत के पारण का समय 16 मई को सुबह 6 बजकर 41 मिनट से सुबह 8 बजकर 13 मिनट तक है. इस शुभ मुहूर्त के दौरान भगवान विष्णु और लक्ष्मी माता की पूजा और अपने व्रत का पारण कर सकते हैं.
अपरा एकादशी का महत्व: हिंदू शास्त्रों में जेष्ठ महीने के कृष्ण पक्ष में आने वाली अपरा एकादशी को पुण्य दायिनी माना गया है. अपरा एकादशी का पुण्य मनुष्य को मृत्यु के बाद भी प्राप्त होता है. इस व्रत को रखने से बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है. शास्त्रों में बताया गया है कि भगवान श्री कृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को इस व्रत के बारे में बताया था कि इस व्रत को रखने से बड़े-बड़े पापों का नाश हो जाता है. उसके बाद पांडवों ने भी इस व्रत को किया था. माना जाता है जो भी मनुष्य इस दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा अर्चना करता है. उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती है.
व्रत का पूजा का विधि विधान: अपरा एकादशी के दिन मनुष्य को जल्दी उठकर स्नान इत्यादि करके भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा अर्चना करनी चाहिए. पूजा अर्चना करने उपरांत व्रत रखने का प्रण लें और पूरे दिन बिना अन्न खाए रहे. भगवान विष्णु और लक्ष्मी माता की पूजा करने के दौरान उनको पीले रंग के फल, फूल, पीला चंदन, मिठाई और पीले कपड़े अर्पित करें. इसके साथ में ओम नमो भगवते वासुदेवाय नम: का जाप करते रहे.
पूजा के दौरान भगवान विष्णु को केसर का तिलक लगाएं. इस दिन आप विष्णु पुराण का पाठ करें और भगवान विष्णु के लिए श्री हरि का कीर्तन करें. जिससे भगवान प्रसन्न होते हैं, जो लोग एकादशी का व्रत रख रहे हैं. वह एकादशी के व्रत की कथा भी पढ़े या सुने. व्रत के पारण के समय भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने के उपरांत उनकी आरती करें और उनको भोग लगाएं.
भोग लगाने के उपरांत ब्राह्मण, गरीब, जरूरतमंद और गाय को भोजन कराऐं और अपनी इच्छा अनुसार दान भी करें. इसके बाद अपना व्रत खोलें. इस दिन अगर आप व्रत रख रहे हैं तो एकादशी की कथा अवश्य पढ़ें और भगवान श्री हरि का कीर्तन भी अवश्य करें. ऐसा करने से मनुष्य के सभी पाप दूर हो जाते हैं. भगवान विष्णु उसके और उसके परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखते हैं और उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं.