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Mission 2023: विधानसभा चुनाव की कमान सतीश पूनिया के हाथ!

राजस्थान बीजेपी अध्यक्ष के रूप में सतीश पूनिया का कार्यकाल बढ़ाया जा सकता है. माना जा रहा है कि प्रदेश अध्यक्ष का कार्यकाल 1 साल के लिए बढ़ाया जा सकता (extension of Satish Poonia as BJP state head) है.

Mission 2023: extension of Satish Poonia as BJP state head on the cards
Mission 2023: विधानसभा चुनाव की कमान सतीश पूनिया के हाथ!
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Published : Jan 18, 2023, 8:40 PM IST

जयपुर. बीजेपी राष्ट्रीय नेतृत्व का जिम्मा जेपी नड्डा के हाथ में रहेगा. नड्डा के कार्यकाल के बढ़ने के साथ ही प्रदेश में भी बतौर चुनावी प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया को बनाए रखने की संभावना बढ़ गई है. चुनावी माहौल में जिस तरह से केंद्रीय नेतृत्व को नहीं बदलने का निर्णय लिया. इसी लिहाज से ये माना जा रहा है कि प्रदेश बीजेपी में कोई बदलाव नहीं होगा. हालांकि अभी प्रदेश अध्यक्ष के कार्यकाल को लेकर कोई निर्णय या चर्चा नहीं हुई है.

पूनिया का कार्यकाल हुआ पूरा: पूनिया का कार्यकाल यूं तो पिछले साल 14 सितंबर को पूरा हुआ था, लेकिन यदि निर्वाचन की तिथि देखी जाए, तो 27 दिसंबर को उनका कार्यकाल पूरा हो चुका है. पिछले कई दिनों से पूनिया का कार्यकाल बढ़ाए जाने को लेकर चर्चाएं थीं. सूत्रों की मानें तो जब जेपी नड्डा का कार्यकाल बढ़ाया जाएगा, उसी तर्क के साथ सतीश पूनिया का भी कार्यकाल बढ़ जाएगा. माना जा रहा है कि प्रदेश अध्यक्ष का कार्यकाल भी लगभग 1 साल बढ़ाया जा सकता है.

पढ़ें: सतीश पूनिया का बढ़ सकता है कार्यकाल, आलाकमान से मिले ये बड़े संकेत

दो नेता दे चुके संकेत: इस बात को बल इसलिए भी मिला क्योंकि पिछले दिनों बीजेपी के 2 राष्ट्रीय महामंत्रियों ने भी पूनिया के कार्यकाल बढ़ने के संकेत दिए थे. एक तरफ बीजेपी प्रदेश प्रभारी अरुण सिंह ने पूनिया के कार्यकाल को बढ़ाए जाने के संकेत स्पष्ट तौर पर दिए, तो दूसरी तरफ केंद्रीय नेता तरूण चुघ ने भी कहा था कि जब तक चुनाव नहीं होंगे पूनिया अध्यक्ष रहेंगे. हालांकि अब इंतजार इस बात का रहेगा कि पूनिया के कार्यकाल बढ़ाए जाने की आधिकारिक रूप से घोषणा कब होगी. नड्डा के 23 जनवरी से हो रहे जयपुर दौरे को लेकर इंतजार है. इसके बाद स्थिति साफ हो सकेगी.

पढ़ें: 2023 चुनाव से पहले क्या बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष पद पर होगा बदलाव, जानिए कैसा रहा पूनिया का तीन साल कार्यकाल

कार्यकाल नहीं बढ़ा तो कौन? : बता दें कि पार्टी में एक धड़ा पूनिया का विरोधी खेमा माना जाता है. उनकी दलील है कि कार्यकाल नहीं बढ़ाया जाएगा. प्रदेश अध्यक्ष मूल ओबीसी या फिर किसी ब्राह्मण को बनाया जाएगा. साथ ही दलील भी दी जाती है कि जब नेतृत्व की घोषणा ही नहीं होगी, तो प्रदेश अध्यक्ष कोई भी हो, कोई फर्क नहीं पड़ेगा. आगामी दिनों में आलाकमान की तरफ से भेजे हुए नेता या फिर कहें सीधे तौर पर आलाकमान राजस्थान की सियासी कमान को संभालेगा और चुनाव मैदान में शह और मात के खेल में अपना पूरा दखल रखेगा.

पूनिया के पक्ष में तीन प्रमुख बातें:

  1. पूनिया तीन साल से अध्यक्ष हैं. ऐसे में पार्टी, मुद्दों, रणनीति, क्षेत्रीय समीकरणों से बेहतर वाकिफ हैं. नए अध्यक्ष के आने पर उन्हें चीजों को समझने में थोड़ा वक्त लगेगा, जबकि चुनाव में थोड़ा ही समय है.
  2. पूनिया संघ की पसंद हैं. संघ की मजबूत अनुशंसा पर ही उन्हें तीन साल पहले प्रदेशाध्यक्ष बनाया गया था. संघ को अभी भी उनसे कोई गुरेज नहीं है.
  3. पूनिया जाट वर्ग से आते हैं. प्रदेश की राजनीति में इस वर्ग का खासा प्रभाव भी है. कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष गोविन्द सिंह डोटासरा भी इसी वर्ग से हैं.

पढ़ें: सरदारशहर का उपचुनाव 2023 के चुनाव का आंकलन नहीं, सिंपैथी की जगह स्थानीय मुद्दों पर होगा मुकाबला-पूनिया

पूनिया के खिलाफ तीन प्रमुख बातें -

  1. बतौर अध्यक्ष तीन साल में विधानसभा उपचुनाव में 8 में सिर्फ एक सीट जीता पाए.
  2. प्रदेश संगठन और कार्यकर्ताओं को एक जुट नहीं कर पाए.
  3. प्रदेश में जन आक्रोश को छोड़ दें, तो सरकार के खिलाफ कोई बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं कर पाए.

जयपुर. बीजेपी राष्ट्रीय नेतृत्व का जिम्मा जेपी नड्डा के हाथ में रहेगा. नड्डा के कार्यकाल के बढ़ने के साथ ही प्रदेश में भी बतौर चुनावी प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया को बनाए रखने की संभावना बढ़ गई है. चुनावी माहौल में जिस तरह से केंद्रीय नेतृत्व को नहीं बदलने का निर्णय लिया. इसी लिहाज से ये माना जा रहा है कि प्रदेश बीजेपी में कोई बदलाव नहीं होगा. हालांकि अभी प्रदेश अध्यक्ष के कार्यकाल को लेकर कोई निर्णय या चर्चा नहीं हुई है.

पूनिया का कार्यकाल हुआ पूरा: पूनिया का कार्यकाल यूं तो पिछले साल 14 सितंबर को पूरा हुआ था, लेकिन यदि निर्वाचन की तिथि देखी जाए, तो 27 दिसंबर को उनका कार्यकाल पूरा हो चुका है. पिछले कई दिनों से पूनिया का कार्यकाल बढ़ाए जाने को लेकर चर्चाएं थीं. सूत्रों की मानें तो जब जेपी नड्डा का कार्यकाल बढ़ाया जाएगा, उसी तर्क के साथ सतीश पूनिया का भी कार्यकाल बढ़ जाएगा. माना जा रहा है कि प्रदेश अध्यक्ष का कार्यकाल भी लगभग 1 साल बढ़ाया जा सकता है.

पढ़ें: सतीश पूनिया का बढ़ सकता है कार्यकाल, आलाकमान से मिले ये बड़े संकेत

दो नेता दे चुके संकेत: इस बात को बल इसलिए भी मिला क्योंकि पिछले दिनों बीजेपी के 2 राष्ट्रीय महामंत्रियों ने भी पूनिया के कार्यकाल बढ़ने के संकेत दिए थे. एक तरफ बीजेपी प्रदेश प्रभारी अरुण सिंह ने पूनिया के कार्यकाल को बढ़ाए जाने के संकेत स्पष्ट तौर पर दिए, तो दूसरी तरफ केंद्रीय नेता तरूण चुघ ने भी कहा था कि जब तक चुनाव नहीं होंगे पूनिया अध्यक्ष रहेंगे. हालांकि अब इंतजार इस बात का रहेगा कि पूनिया के कार्यकाल बढ़ाए जाने की आधिकारिक रूप से घोषणा कब होगी. नड्डा के 23 जनवरी से हो रहे जयपुर दौरे को लेकर इंतजार है. इसके बाद स्थिति साफ हो सकेगी.

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कार्यकाल नहीं बढ़ा तो कौन? : बता दें कि पार्टी में एक धड़ा पूनिया का विरोधी खेमा माना जाता है. उनकी दलील है कि कार्यकाल नहीं बढ़ाया जाएगा. प्रदेश अध्यक्ष मूल ओबीसी या फिर किसी ब्राह्मण को बनाया जाएगा. साथ ही दलील भी दी जाती है कि जब नेतृत्व की घोषणा ही नहीं होगी, तो प्रदेश अध्यक्ष कोई भी हो, कोई फर्क नहीं पड़ेगा. आगामी दिनों में आलाकमान की तरफ से भेजे हुए नेता या फिर कहें सीधे तौर पर आलाकमान राजस्थान की सियासी कमान को संभालेगा और चुनाव मैदान में शह और मात के खेल में अपना पूरा दखल रखेगा.

पूनिया के पक्ष में तीन प्रमुख बातें:

  1. पूनिया तीन साल से अध्यक्ष हैं. ऐसे में पार्टी, मुद्दों, रणनीति, क्षेत्रीय समीकरणों से बेहतर वाकिफ हैं. नए अध्यक्ष के आने पर उन्हें चीजों को समझने में थोड़ा वक्त लगेगा, जबकि चुनाव में थोड़ा ही समय है.
  2. पूनिया संघ की पसंद हैं. संघ की मजबूत अनुशंसा पर ही उन्हें तीन साल पहले प्रदेशाध्यक्ष बनाया गया था. संघ को अभी भी उनसे कोई गुरेज नहीं है.
  3. पूनिया जाट वर्ग से आते हैं. प्रदेश की राजनीति में इस वर्ग का खासा प्रभाव भी है. कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष गोविन्द सिंह डोटासरा भी इसी वर्ग से हैं.

पढ़ें: सरदारशहर का उपचुनाव 2023 के चुनाव का आंकलन नहीं, सिंपैथी की जगह स्थानीय मुद्दों पर होगा मुकाबला-पूनिया

पूनिया के खिलाफ तीन प्रमुख बातें -

  1. बतौर अध्यक्ष तीन साल में विधानसभा उपचुनाव में 8 में सिर्फ एक सीट जीता पाए.
  2. प्रदेश संगठन और कार्यकर्ताओं को एक जुट नहीं कर पाए.
  3. प्रदेश में जन आक्रोश को छोड़ दें, तो सरकार के खिलाफ कोई बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं कर पाए.
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