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आपराधिक प्रकरण में बरी होने के बाद भी चयन होने पर नियुक्ति क्यों नहीं: हाईकोर्ट

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Published : Sep 17, 2021, 8:49 PM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रमुख गृह सचिव, डीजीपी और एसपी भर्ती बोर्ड से जवाब मांगा है. कोर्ट ने पूछा है कि आपराधिक प्रकरण में बरी होने के बाद भी चयन होने पर नियुक्ति क्यों नहीं दी जा रही है.

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राजस्थान हाईकोर्ट ने किया तलब

जयपुर. राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रमुख गृह सचिव, डीजीपी और एसपी भर्ती बोर्ड को नोटिस जारी कर पूछा है कि पुलिस उपनिरीक्षक भर्ती-2016 में चयन होने के बावजूद अभ्यर्थी को नियुक्ति क्यों नहीं दी गई, जबकि वह ट्रायल कोर्ट से आपराधिक मामले में बरी हो चुका है. इसके साथ ही अदालत ने एक पद याचिकाकर्ता के लिए रिक्त रखने को कहा है. न्यायाधीश अरुण भंसाली ने यह आदेश रवि शेखर की याचिका पर दिए.

याचिका में अधिवक्ता तनवीर अहमद ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता का चयन एसआई भर्ती-2016 में हो गया था. वहीं विभाग ने कमेटी गठित कर उसे चयन के लिए अपात्र घोषित कर दिया. याचिका में कहा गया कि याचिकाकर्ता को आपराधिक प्रकरण से ट्रायल कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था.

पढ़ें: राजस्थान हाईकोर्टः कोविड स्वास्थ्य सहायक भर्ती 2021 के रिक्त पद नहीं भरने पर मांगा जवाब

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट भी तय कर चुका है कि सभी गवाहों का परीक्षण करने के बाद यदि ट्रायल कोर्ट संदेह का लाभ देते हुए बरी करती है तो उसे बाइज्जत बरी होना ही माना जाएगा. ऐसे में याचिकाकर्ता को नियुक्ति से वंचित रखना गलत है. इस पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ ने संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी करते हुए एक पद याचिकाकर्ता के लिए रिक्त रखने को कहा है.

जयपुर. राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रमुख गृह सचिव, डीजीपी और एसपी भर्ती बोर्ड को नोटिस जारी कर पूछा है कि पुलिस उपनिरीक्षक भर्ती-2016 में चयन होने के बावजूद अभ्यर्थी को नियुक्ति क्यों नहीं दी गई, जबकि वह ट्रायल कोर्ट से आपराधिक मामले में बरी हो चुका है. इसके साथ ही अदालत ने एक पद याचिकाकर्ता के लिए रिक्त रखने को कहा है. न्यायाधीश अरुण भंसाली ने यह आदेश रवि शेखर की याचिका पर दिए.

याचिका में अधिवक्ता तनवीर अहमद ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता का चयन एसआई भर्ती-2016 में हो गया था. वहीं विभाग ने कमेटी गठित कर उसे चयन के लिए अपात्र घोषित कर दिया. याचिका में कहा गया कि याचिकाकर्ता को आपराधिक प्रकरण से ट्रायल कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था.

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इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट भी तय कर चुका है कि सभी गवाहों का परीक्षण करने के बाद यदि ट्रायल कोर्ट संदेह का लाभ देते हुए बरी करती है तो उसे बाइज्जत बरी होना ही माना जाएगा. ऐसे में याचिकाकर्ता को नियुक्ति से वंचित रखना गलत है. इस पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ ने संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी करते हुए एक पद याचिकाकर्ता के लिए रिक्त रखने को कहा है.

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