नाहन: श्री रेणुकाजी में फाल्गुन सक्रांति के पावन अवसर पर जिले के विभिन्न क्षेत्रों एवं पड़ोसी राज्य से आए असंख्य लोगों ने पवित्र जल में स्नान किया. वहीं, पच्छाद विधानसभा के नारग से आए सैकड़ों लोगों ने अपने आराध्य देव कुंवारू नाग देवता का भी मंत्रोच्चारण के साथ स्नान करवाया.
पुजारी प्रभु दत्त ने बताया कि कुंवारू नाग देवता नारग क्षेत्र की आठ पंचायतों में रहने वाले 16 खेल के लोगों के कुलदेवता है, जिसका प्रादुर्भाव कालांतर में नारग के गांव भड़ूत में एक ब्राह्मण परिवार में नाग के रूप में हुआ था.
कहा जाता है कि नाग देवता को बचपन में उनकी माता एक मिट्टी के घड़े में रखा करती थी और उनका पालन पोषण अपने बेटे की तरह किया करती थी. एक दिन नाग देवता की माता पशुओं को घास लाने जंगल में गई और उन्होंने अपनी बड़ी बेटी से नाग की सुरक्षा करने और उन्हें समय पर दूध पिलाने बारे कहा गया था. ब्राह्मणी जंगल जाते समय घर पर चूल्हे पर दूध को उबालने रख गई थी और बड़ी बेटी को कहा कि दूध में उबाल आने के बाद जब दूध ठंडा हो जाए तो उसे नाग को पिला देना.
नाग की बड़ी बहन बाहर बच्चों के साथ खेलने में इतनी मग्न हुई और नाग भाई को दूध पिलाना भूल गई. बेटी ने जब अपनी माता को वापस घास लाते देखा तो बेटी डर गई और उसने चूल्हे पर रखा गर्म दूध घड़े में रखे नाग पर डाल दिया, जिससे नाग की खाल जल गई और नाग क्रोधित होकर घड़े से बाहर निकले और जाते हुए उन्हें रास्ते में माता से भेंट हुई और माता ने अपने नाग पुत्र को पहचानने में देरी नहीं लगाई. माता ने नाग पुत्र से कहा कि बेटा कहां जा रहे हो और वापस घर चलो. क्रोधित नाग ने कहा कि आपकी बेटी और मेरी बहन ने मेरे शरीर पर गर्म दूध डाला है, जिससे मेरा सारा शरीर झुलस गया है और मैं अब आपके साथ नहीं रहूंगा. हमारा मां-बेटा का संबंध अब खत्म हो चुका है. इसके बाद मां ने नाग से आग्रह किया कि बेटा तू ही मेरा सहारा था. अब मैं तेरे बगैर अपना जीवन यापन कैसे करूंगी. जिस पर नाग ने माता को कहा कि गांव के रास्ते में फूमरा का पौधा है, जिसकी तीन टहनियां घर ले जाओ जो आपको जीवन भर सहारा देगी.
माता ने फूमरा पौधे की तीन टहनियां काट कर अपने घर ले गई और दो टहनियों को पशुशाला में छोड़ दिया और एक मोटी टहनी को इस आश्य से ले गई कि वह बेटी की उस टहनी से पिटाई करेगी जिसकी वजह से उसका नाग पुत्र घर छोड़ कर चला गया. जैसे की नाग माता घर की डियोढी पर पहुंचती है कि उस टहनी के चमत्कार से घर में बेशकीमती धन दौलत हो गई. नाग ने जाते हुए अपनी माता को दो वचन दिए थे कि भड़ूत गांव के लोग कभी सर्पदंश का शिकार नहीं होंगे और वह साल में दो बार अपने जन्म स्थान भड़ूत मकर सक्रांति और हरियाली सक्रांति के अवसर पर लोगों को आशीर्वाद देने आया करेंगे और वचन में बंधे नाग देवता हर वर्ष भड़ूत में पंडित सत्यानंद शर्मा के घर आते हैं. जहां पर विधि विधान से कुंवारू नाग देवता की पारंपरिक पूजा अर्चना की जाती है. इसमें पूरे क्षेत्र के लोग भाग लेते हैं और रात्रि को कीर्तन का आयोजन किया जाता है.
माता से बात करने के बाद नाग भड़ूत गांव के सामने टिल्ला पर चले गए और टिब्बा के पजैली नामक गांव में स्थित कुवांरू देवता के गले में लिपट गए और इस क्षेत्र से लोग उन्हें कालांतर से अपना कुल देवता मानते हैं. दिवाली व प्रबोधनी एकादशी के पर्व पर इस क्षेत्र के लोग आस्था व श्रद्धा से कुवांरू नाग देवता के मंदिर में जाकर भेंट चढ़ाते हैं और नाग देवता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं. देवता के पुजारी प्रभु दत्त ने बताया कि वह रेणुका झील में कुवांरू देवता का स्नान करने के बाद हरिद्वार जाएगें. वहीं गंगा में भी देवता का स्नान करवाकर अपने स्थान लाया जाएगा जहां मंदिर में वेदोमंत्रोच्चारण के साथ देवता को दोबारा प्रवेश करवाया जाएगा.