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उत्तराखंड में वन गुर्जरों के साथ सौतेले व्यवहार पर HC सख्त, सरकार को लगाई फटकार - state government rebuked in the case of Gurjars,

गुर्जरों को गोविंद वन्य जीव अभ्यारण में रुकने से रोकने पर हाईकोर्ट ने सरकार और विभाग को जमकर फटकार लगाई है.

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गुर्जरों को गोविंद वन्य जीव अभ्यारण में रुकने से मना करने पर हाईकोर्ट सख्त
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Published : May 26, 2021, 4:35 PM IST

नैनीताल: गोविंद वन्य जीव विहार अभ्यारण में वन गुर्जरों के परिवारों को प्रवेश न देने के मामले पर नैनीताल हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है. मुख्य न्यायाधीश राघवेंद्र सिंह चौहान की खंडपीठ ने मामले में राज्य सरकार को जमकर फटकार लगाई है. साथ ही कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा है कि कोरोना संक्रमण काल के दौरान वन गुर्जरों को कोरोना महामारी का हवाला देते हुए उनके घरों तक जाने से रोकना मानव अधिकारों का उल्लंघन है. विभाग के द्वारा किया गया कार्य असंवेदनशील हैं.

बता दें कि रामनगर की हिमालयन ग्रामीण विकास समिति के अध्यक्ष मयंक मैनाली ने इस मामले में हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी. जिसमें कहा गया कि रामनगर क्षेत्र में रिसॉर्ट मालिकों ने कानून को ताक पर रखकर कोसी नदी में अवैध कब्जा कर रिसॉर्ट का निर्माण किया है. उनके द्वारा वन्यजीवों को हानि पहुंचाई जा रही है. लिहाजा वन क्षेत्रों में किए गए अतिक्रमण को हटाया जाए.

मामले में सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने रिजर्व फॉरेस्ट में रह रहे वन गुर्जरों के मामले को स्वतः संज्ञान लिया था. राज्य सरकार से वन गुर्जरों को विस्थापित करने के लिए कमेटी बनाकर प्लान तैयार करने का कहा था, ताकि वन गुर्जरों को रिजर्व फॉरेस्ट क्षेत्र से विस्थापित किया जा सके.

पढ़ें- नगर पालिका मुनि की रेती के अध्यक्ष ने सौंपी कृषि मंत्री को 1 लाख पैरासिटामोल टैबलेट

हिमालयन ग्रामीण विकास समिति की जनहित याचिका के बाद कई अन्य लोगों के द्वारा इस जनहित याचिका में प्रार्थना पत्र दायर किए गए. जिसमें कोर्ट को बताया कि वन गुर्जरों के साथ राज्य सरकार व वन विभाग के द्वारा अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है. साथ ही फोटो के द्वारा कोर्ट को बताया गया कि वन गुर्जर परिवारों का एक बच्चा मरी हुई भैंस के ऊपर सोता है.

पढ़ें- उत्तराखंड में 1 जून तक बढ़ाया गया कोरोना कर्फ्यू, हुए ये बदलाव

अर्जुन कसाना का कहना है कि राज्य सरकार के द्वारा वन गुर्जरों को वन भूमि से हटाया जा रहा है. जिस वजह से वन गुर्जर जानवरों जैसा जीवन बिताने पर मजबूर है. मामले में सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश राघवेंद्र सिंह चौहान की खंडपीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि कोई भी वन गुर्जरों के साथ गलत व्यवहार नहीं कर सकता है. क्योंकि 'वो जानवर नहीं हैं, आपकी और हमारी तरह इंसान हैं'. गुर्जरों के पास भी आम आदमी के समान मौलिक अधिकार व मानव अधिकार हैं, लिहाजा वन विभाग समेत राज्य सरकार वन गुर्जरों को उनके आवासों तक जाने दे.

पढ़ें- खुशखबरीः कोरोना काल में उत्तराखंड प्रवासियों को भी मिलेगा सस्ता राशन

बताते चले कि वन गुर्जरों को रिजर्व फॉरेस्ट क्षेत्र से विस्थापित करने के लिए पूर्व में नैनीताल हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने राज्य सरकार को आदेश दिए थे कि सक्षम अधिकारियों की कमेटी बनाकर वन गुर्जरों को रिजर्व फॉरेस्ट से विस्थापित करने के लिए कार्य योजना बनाकर रिपोर्ट 3 माह के भीतर कोर्ट में पेश करें, लेकिन राज्य सरकार के द्वारा मामले में टालमटौल करते हुए कुछ अधिकारियों की कमेटी बना कर रिपोर्ट कोर्ट में पेश कर दी.

जिससे नाराज होकर हाईकोर्ट ने सरकार को सक्षम अधिकारियों की कमेटी बनाने के आदेश दिए हैं. कोर्ट खुद इस कमेटी के द्वारा किए जा रहे कार्यों की निगरानी करेगा. हर माह मामले में सुनवाई भी करेगा. जिसकी रिपोर्ट राज्य सरकार कोर्ट में पेश करनी होगी.

नैनीताल: गोविंद वन्य जीव विहार अभ्यारण में वन गुर्जरों के परिवारों को प्रवेश न देने के मामले पर नैनीताल हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है. मुख्य न्यायाधीश राघवेंद्र सिंह चौहान की खंडपीठ ने मामले में राज्य सरकार को जमकर फटकार लगाई है. साथ ही कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा है कि कोरोना संक्रमण काल के दौरान वन गुर्जरों को कोरोना महामारी का हवाला देते हुए उनके घरों तक जाने से रोकना मानव अधिकारों का उल्लंघन है. विभाग के द्वारा किया गया कार्य असंवेदनशील हैं.

बता दें कि रामनगर की हिमालयन ग्रामीण विकास समिति के अध्यक्ष मयंक मैनाली ने इस मामले में हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी. जिसमें कहा गया कि रामनगर क्षेत्र में रिसॉर्ट मालिकों ने कानून को ताक पर रखकर कोसी नदी में अवैध कब्जा कर रिसॉर्ट का निर्माण किया है. उनके द्वारा वन्यजीवों को हानि पहुंचाई जा रही है. लिहाजा वन क्षेत्रों में किए गए अतिक्रमण को हटाया जाए.

मामले में सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने रिजर्व फॉरेस्ट में रह रहे वन गुर्जरों के मामले को स्वतः संज्ञान लिया था. राज्य सरकार से वन गुर्जरों को विस्थापित करने के लिए कमेटी बनाकर प्लान तैयार करने का कहा था, ताकि वन गुर्जरों को रिजर्व फॉरेस्ट क्षेत्र से विस्थापित किया जा सके.

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हिमालयन ग्रामीण विकास समिति की जनहित याचिका के बाद कई अन्य लोगों के द्वारा इस जनहित याचिका में प्रार्थना पत्र दायर किए गए. जिसमें कोर्ट को बताया कि वन गुर्जरों के साथ राज्य सरकार व वन विभाग के द्वारा अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है. साथ ही फोटो के द्वारा कोर्ट को बताया गया कि वन गुर्जर परिवारों का एक बच्चा मरी हुई भैंस के ऊपर सोता है.

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अर्जुन कसाना का कहना है कि राज्य सरकार के द्वारा वन गुर्जरों को वन भूमि से हटाया जा रहा है. जिस वजह से वन गुर्जर जानवरों जैसा जीवन बिताने पर मजबूर है. मामले में सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश राघवेंद्र सिंह चौहान की खंडपीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि कोई भी वन गुर्जरों के साथ गलत व्यवहार नहीं कर सकता है. क्योंकि 'वो जानवर नहीं हैं, आपकी और हमारी तरह इंसान हैं'. गुर्जरों के पास भी आम आदमी के समान मौलिक अधिकार व मानव अधिकार हैं, लिहाजा वन विभाग समेत राज्य सरकार वन गुर्जरों को उनके आवासों तक जाने दे.

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बताते चले कि वन गुर्जरों को रिजर्व फॉरेस्ट क्षेत्र से विस्थापित करने के लिए पूर्व में नैनीताल हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने राज्य सरकार को आदेश दिए थे कि सक्षम अधिकारियों की कमेटी बनाकर वन गुर्जरों को रिजर्व फॉरेस्ट से विस्थापित करने के लिए कार्य योजना बनाकर रिपोर्ट 3 माह के भीतर कोर्ट में पेश करें, लेकिन राज्य सरकार के द्वारा मामले में टालमटौल करते हुए कुछ अधिकारियों की कमेटी बना कर रिपोर्ट कोर्ट में पेश कर दी.

जिससे नाराज होकर हाईकोर्ट ने सरकार को सक्षम अधिकारियों की कमेटी बनाने के आदेश दिए हैं. कोर्ट खुद इस कमेटी के द्वारा किए जा रहे कार्यों की निगरानी करेगा. हर माह मामले में सुनवाई भी करेगा. जिसकी रिपोर्ट राज्य सरकार कोर्ट में पेश करनी होगी.

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