अलीगढ़ः किसान देश का अन्नदाता है...किसान भारत के अर्थतंत्र की रीढ़ हैं...ये सब बातें कहने-सुनने में तो बहुत अच्छी लगती हैं लेकिन किसानों की समस्याएं किसी से छिपी नहीं है. इसका जिम्मेदार कभी सरकारी नीतियों को ठहराया जाता है तो कभी बिचौलियों को, लेकिन अलीगढ़ क्षेत्र में कई किसानों को अब नई राह मिल गई है, जिससे न केवल वह आर्थिक स्थिति सुधार रहे हैं बल्कि लोगों के स्वास्थ्य को भी बेहतर बना रहे हैं. ये राह है जैविक खेती की. कमाल की बात ये जैविक खाद भी किसान गायों के गोबर से खुद बना रहे हैं. इस प्रशंसनीय काम का बीड़ा उठाया है क्षेत्र की पूनम सिंह ने.
जैविक खेती से सुधर रहा भविष्य
रासायनिक खेती से जहां किसानों को मायूसी हाथ लग रही है. वहीं जैविक खेती कर किसान अपना भविष्य सुधार रहे हैं. अलीगढ़ में जैविक खाद बनाने की ट्रेनिंग पूनम सिंह दे रही हैं. उन्होंने अब तक करीब 1500 किसानों को जैविक खाद बनाने की ट्रेनिंग दी है. पूनम ने एक एफपीओ का गठन भी किया है. इसके तहत 300 किसानों को जोड़ा है. वह किसानों तक जैविक खाद पहुंचा रही हैं. वे किसानों को अधिक से अधिक लाभ पहुंचा कर आत्मनिर्भर बनाना चाहती हैं. उनका मानना है कि भूमि के पोषण से ही राष्ट्र का पोषण संभव है. पूनम किसानों को जैविक खाद बनाने की टेक्निक बताती हैं तो वहीं अच्छे बीज, दवा और यंत्र भी उपलब्ध कराती हैं. किसान के खेत की मिट्टी की जांच करवाने में सहयोग करती हैं तो किसानों के कृषि उत्पाद का भी उचित मूल्य दिलवाती हैं. किसानों की आय दोगुनी करने के लिए उन्हें निशुल्क परामर्श और प्रशिक्षण भी दे रही हैं.
देशी गाय के गोबर और गोमूत्र से बनाते हैं जैविक खाद
पूनम देसी गाय से जैविक खाद बनाने का ट्रेनिंग दे रही हैं. पूनम ने बताया कि किसान यदि गाय पालेगा तो उसको बहुत फायदा होगा. बाजार से किसान को रासायनिक खाद नहीं खरीदनी पड़ेगी. गाय के गोबर और गोमूत्र से ही पूनम जैविक खाद बनाने का प्रशिक्षण दे रही हैं. अब तक करीब 1500 किसानों को ट्रेनिंग दे चुकी हैं. किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) बनाकर करीब 300 किसानों को भी जोड़ा है, जिन्होंने जैविक खेती को अपनाया है. उन्हें खाद बनाने के साथ ही फूड प्रोसेसिंग का प्रशिक्षण भी दे रही हैं. पूनम बताती हैं कि किसान अपनी फसलों की प्रोसेसिंग नहीं कर पाता. इससे उसकी ज्यादातर फसल बर्बाद होती है.
जैविक खाद बनाने में मिलाते हैं गुड़ और बेसन
पूनम ने बताया कि जीवामृत और घन जीवामृत के तरीके से जैविक खाद बनाते हैं. इसमें यूरिया की जगह लिक्विड खाद भी बनाते हैं. यह तीन दिन में तैयार हो जाती है और उसको 15 दिन में इस्तेमाल कर सकते हैं. इसके अलावा गोबर में गुड़ और बेसन मिलाकर जैविक खाद बनाते हैं. उन्होंने बताया कि एफपीओ इसीलिए बनाया है, जिससे किसान संगठित होकर काम करें. किसान अपनी फसल की कीमत तय नहीं कर पाता, जिससे बाजार में फसल का सही मूल्य नहीं मिल पाता है. इससे मंडी में भी बिचौलियों को अपनी फसल बेचनी पड़ती है. पूनम कहती है कि अब किसानों की सोच बदल रही है. पहले किसान ज्यादा रासायनिक खाद का प्रयोग करता था लेकिन अब वह जैविक खाद का इस्तेमाल कर रहा है. किसान दूसरे किसानों की नकल कर फसल का उत्पादन करता है. वे फसल का कैलकुलेशन नहीं कर पाते कि खेती में कितना लगाया और कितना पाया. पूनम कहती हैं कि भले ही सरकार किसानों की आय दोगुनी करने का प्रयास कर रही है लेकिन नीति बनाने से किसानों की आय दोगनी नहीं होगी. किसानों को खुद ही प्रयास करना पड़ेगा और वह अपने आप कैलकुलेशन कर काम करेगा तो खेती से चौगुनी आय कर सकता है.
जैविक खाद से खेती के लिए कर रहे जागरूक
पूनम बृज किसान प्रोड्यूसर कंपनी से जुड़कर काम कर रही हैं. किसान संगठन कंपनी चलाने वाले संतोष कुमार बताते हैं कि किसानों को संगठित करके उन्हें प्रशिक्षण दिया जा रहा है. किसानों को जैविक खाद बनाने की तकनीक निशुल्क बताई जा रही है. खासतौर से गो आधारित खाद बनाने का प्रशिक्षण दे रहे हैं. संतोष बताते हैं कि जैसा खाओगे अन्न, वैसा होगा मन. इसी विधा को बढ़ाने का काम कर रहे हैं. किसान जो अन्नदाता हैं, वह अपने लिए शुद्ध अन्न का उत्पादन करें और समाज को भी स्वस्थ भोजन उपलब्ध कराएं, इसलिए किसानों को जैविक खेती करने के लिए जागरूक कर रहे हैं. संतोष ने बताया कि रासायनिक खेती करने में लागत ज्यादा होती है और जो उत्पादन होता है वह शुद्ध नहीं होता है. जैविक खाद से उत्पादन शुद्ध होता है और इससे किसान दोगनी आय भी कर सकते हैं.
जैविक खाद से खेती की मिट्टी नहीं होती खराब
पूनम स्वयं गन्ने की पौध जैविक खाद की तकनीक से उगा रही हैं, साथ ही सरसों भी पैदा कर रही हैं. सरसों की फली में जहां सामान्यतः 13-14 दाने होते हैं, वहीं जैविक खाद लगाने से सरसों की एक फली में 16-17 दाने निकले. प्रशिक्षण ले चुके किसान खूबी सिंह बताते हैं कि बाजार से जो रासायनिक खाद लेकर आते हैं वह महंगी होती है और जो स्वयं घर पर ही जैविक विधि से बनाते हैं वह सस्ती होती है. इससे अच्छा फायदा होता है. खूबी सिंह बताते हैं कि रासायनिक खाद से फसलों को हानि होती है. खेत की मिट्टी को भी नुकसान पहुंचता है. वहीं जैविक खाद डालने से फसल भी स्वस्थ रहती है और मिट्टी भी खराब नहीं होती है.
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डीएपी व यूरिया महंगी
किसान शैलेश कुमार बताते हैं कि डीएपी और यूरिया किसानों के लिए बहुत महंगा पड़ता है. इससे किसानों को उत्पादन अधिक मिलता है लेकिन खेती को नुकसान होता है. जैविक खाद बनाने की प्रक्रिया को समझकर अब खेती में जैविक खाद का प्रयोग कर रहे हैं, जिससे शुद्ध खाना मिल सकें. जैविक उत्पाद से मिलने वाली फसल स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती है.