शिमला: रविवार 3 दिसंबर को सामने आए चुनावी नतीजों में कांग्रेस को करारी हार मिली है. खासकर हिंदी बेल्ट के तीनों राज्यों में कांग्रेस के हाथ खाली रह गए हैं, मध्य प्रदेश में भले बीजेपी ने सरकार रिपीट की हो लेकिन राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकारें थी. ये दोनों राज्य अब कांग्रेस के हाथ से छिटक चुके हैं. इस करारी हार का असर मानो अब कांग्रेस शासित राज्य हिमाचल पर भी पड़ने लगा है. जहां कांग्रेस सरकार और संगठन की तकरार फिर से सामने आ गई है.
सिर्फ तीन राज्य कांग्रेस के हाथ- वैसे राज्य कोई भी हो कांग्रेस में अंदरूनी कलह नई बात नहीं है, लेकिन इसकी टाइमिंग कांग्रेस के लिए बिल्कुल ठीक नहीं है. 5 राज्यों के चुनावी नतीजे और आगामी लोकसभा चुनाव 2024 को देखते हुए कांग्रेस की कलह गाथा पार्टी की सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकती है. अब देश के सिर्फ 3 राज्यों हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना में ही कांग्रेस की सरकारें बची हैं. कर्नाटक में सरकार बने 6 महीने हुए हैं तो तेलंगाना में अभी नए मुख्यमंत्री का शपथ ग्रहण बाकी है. इस लिहाज से सबसे पुरानी सरकार हिमाचल में ही है जिसे एक साल होने वाला है.
![11 दिसंबर 2022 को सुखविंदर सुक्खू (सीएम), मुकेश अग्निहोत्री (डिप्टी सीएम) ने ली थी शपथ](https://etvbharatimages.akamaized.net/etvbharat/prod-images/06-12-2023/20201108_image1.jpg)
एक साल का जश्न और सरकार vs संगठन- दरअसल हिमाचल में 11 दिसंबर 2022 को सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी. अब सरकार को बने एक साल होने वाला है, इस मौके को जश्न के रूप में मनाने का प्लान भी कर लिया गया है. लेकिन इस बीच खबर आई कि इस जश्न के आयोजन और तैयारियों को लेकर विधायक दल की एक बैठक बुलाई गई थी. जिसकी जानकारी कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा सिंह को नहीं दी गई. जबकि इससे पहले पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कुलदीप राठौर को विधायक दल की बैठकों में बुलाया जाता रहा है. जिसके बाद खुद प्रतिभा सिंह ने कैमरे के सामने आकर ऐसा बयान दे दिया कि पार्टी में गुटबाजी फिर जगजाहिर हो गई.
"मुझे इस कार्यक्रम की कोई जानकारी नहीं दी गई. आखिरकार सरकारें संगठन की वजह से बनती हैं. संगठन ने काम किया तभी हमारी सरकार बन पाई है. अगर आज हमारी सरकार रहते हुए संगठन को नजरअंदाज करेंगे तो ये बात ठीक नहीं है. मुख्यमंत्री खुद संगठन से उभरे व्यक्ति हैं, वो हमेशा संगठन की बात करते हैं. संगठन में अलग-अलग पदों से होते हुए वो आज प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हैं. मैं चाहती थी कि वो संगठन को भी मजबूती देते, जिससे कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ता. सबके साथ तालमेल बनाने की जरूरत है ताकि कार्यकर्ताओं में जोश रहे और वो 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए तैयार रहें."- प्रतिभा सिंह, हिमाचल कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष
हिमाचल कांग्रेस और गुटबाजी- हिमाचल कांग्रेस में अंदरूनी कलह की कहानी पुरानी है. 6 बार मुख्यमंत्री रहे वीरभद्र सिंह के राज में भी कई गुट उभरे, हालांकि वीरभद्र सिंह के कद के आगे किसी गुट की भी नहीं चली. सुखविंदर सिंह सुक्खू भी प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए वीरभद्र सिंह के खिलाफ झंडा बुलंद करते थे. साल 2021 में मंडी से बीजेपी सांसद राम स्वरूप शर्मा का निधन हुआ तो स्वर्गीय वीरभद्र सिंह के नाम का फायदा उठाने के लिए पार्टी ने उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह को मंडी उपचुनाव का टिकट दे दिया. प्रतिभा सिंह की जीत भी हुई और फिर 2022 में विधानसभा चुनाव से करीब 6 महीने पहले उन्हें हिमाचल कांग्रेस की जिम्मेदारी भी दे दी गई. जिसके बाद गुटबाजी का एक नया दौर हिमाचल कांग्रेस का इंतजार कर रहा था.
सुखविंदर सिंह सुक्खू बनाम प्रतिभा सिंह- 2022 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 40 सीटें जीतकर सरकार बना ली. नतीजों के 48 घंटे बाद तक मुख्यमंत्री के नाम पर शिमला से लेकर दिल्ली तक माथापच्ची होती रही. प्रतिभा सिंह भी प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते मुख्यमंत्री पद की दावेदार थीं और वो वीरभद्र सिंह के नाम की दुहाई भी दे रहीं थीं. लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने 4 बार विधायक रहे सुखविंदर सुक्खू की ताजपोशी का ऐलान कर दिया. इसके साथ ही कईयों के अरमान धरे के धरे रह गए. 11 दिसंबर 2022 को सुखविंदर सुक्खू ने मुख्यमंत्री और मुकेश अग्निहोत्री ने डिप्टी सीएम के रूप में शपथ ली. करीब एक महीने बाद कैबिनेट मंत्रियों का ऐलान हुआ तो उसमें पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह और प्रतिभा सिंह के बेटे विक्रमादित्य सिंह का भी नाम था. मंत्रिमंडल में भी सिर्फ 7 चेहरों को जगह मिली तो कई नेताओं के अरमान टूट गए.
वरिष्ठ पत्रकार डॉ. एमपीएस राणा मानते हैं कि प्रतिभा सिंह का बयान भले सरकार के एक साल के जश्न की तैयारियों वाली बैठक में ना बुलाने या उनकी राय ना लेने पर सामने आया हो लेकिन पार्टी में उभर रही इस दरार की वजह जगजाहिर है. प्रतिभा सिंह चाहती हैं कि मंत्रिमंडल से लेकर बोर्ड निगमों की मलाईदार पोस्टों पर उनके करीबियों को भी जगह मिले. वो पहले भी संगठन के लोगों को एडजस्ट न करने पर नाराजगी जता चुकी थी, लेकिन इस बार संगठन और कार्यकर्ताओं की अनदेखी के बहाने पिछले एक साल से दबी टीस प्रतिभा सिंह की जुबान पर फिर आ गई है.
हिमाचल कांग्रेस की मुश्किल- सुखविंदर सुक्खू पहली बार मुख्यमंत्री बने हैं, इससे पहले वो कभी मंत्री भी नहीं रहे हैं. ऊपर से इस साल हिमाचल में आई आपदा और प्रदेश पर कर्ज के बढ़ते बोझ ने उनके लिए मुश्किलों का पहाड़ खड़ा कर दिया है. कांग्रेस द्वारा चुनाव प्रचार के दौरान हिमाचल की जनता को दी गई 10 गारंटियां पूरा करने का दारोमदार भी सुखविंदर सिंह सुक्खू के कंधों पर है. एक साल के कार्यकाल में सिर्फ ओपीएस की गारंटी ही सिरे चढ़ पाई है. जिसके कारण विपक्ष के साथ-साथ जनता भी सवाल उठा रही है. इस बीच हाल ही में आए चुनावी नतीजों और आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए सीएम सुक्खू और हिमाचल कांग्रेस के लिए मुश्किलों का पहाड़ और ऊंचा हो चला है.
मुश्किलें और भी हैं- सुखविंदर सुक्खू के लिए सिर्फ प्रतिभा सिंह या कांग्रेस संगठन ही मुश्किल नहीं है, उनके अपने विधायक भी मोर्चा खोल चुके हैं. कैबिनेट में 3 कुर्सियां खाली हैं और स्थिति एक अनार सौ बीमार वाली है. सुजानपुर से विधायक राजेंद्र राणा मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखकर चुनावी वादे याद दिला चुके हैं. साथ ही कैबिनेट विस्तार की मांग भी कर चुके हैं. वीरभद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे सुधीर शर्मा भी मंत्री बनने का इंतजार कर रहे हैं. पूर्व विधायक नीरज भारती अपनी सरकार और अपने मंत्री पिता को नसीहत दे चुके हैं. सरकार के मंत्री ही कई बार डॉक्टर्स का NPA बंद करने से लेकर खनन और टैक्सी चालकों के मुद्दे पर आमने-सामने आ चुके हैं. सियासी गलियारों में गाहे बगाहे ऑपरेशन लोटस की चर्चा भी छिड़ती रहती है. नवंबर महीने में ही दिल्ली एम्स से करीब दो हफ्ते इलाज करवाने के बाद वो शिमला लौटे हैं. इस बीच संगठन और सरकार के बीच की दरारों का फिर से खुलना मुश्किलें बढ़ा सकता है.
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जनहित के कई संवेदनशील मुद्दों को लेकर मैंने आज माननीय मुख्यमंत्री श्री @SukhuSukhvinder जी को पत्र लिखकर उन्हें प्रदेश के युवाओं की भावनाओं से भी अवगत करवाया है।@ShuklaRajiv @virbhadrasingh
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जय हिन्द
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वरिष्ठ पत्रकार धनंजय शर्मा कहते हैं कि सरकार कोई भी हो, किसी ना किसी रूप में गुटबाजी रहती ही है. वीरभद्र सरकार के दौरान आनंद शर्मा, कौल सिंह ठाकुर, विद्या स्टोक्स जैसे नेताओं का अलग गुट माना जाता था. बीजेपी के राज में शांता कुमार और प्रेम कुमार धूमल के गुट चर्चा में रहे हैं. गुटबाजी नई बात नहीं लेकिन सुक्खू सरकार के लिए प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा सिंह की नाराजगी अच्छे संकेत नहीं हैं.
व्यवस्था परिवर्तन और सुख की सरकार के नारे के साथ सत्ता में आई कांग्रेस की सुखविंदर सरकार के लिए हर लिहाज से पहला साल मुश्किलों भरा रहा है. दूसरे साल में सरकार की अग्निपरीक्षा लोकसभा चुनाव के रूप में है. साल 2014 और 2019 में हिमाचल प्रदेश की चारों सीटें बीजेपी ने जीतीं थी. तमाम मुश्किलों से घिरी कांग्रेस हिमाचल में लोकसभा चुनाव के दौरान अपने प्रदर्शन को कैसे और कितना बेहतर कर पाती है. ये आने वाला वक्त बताएगा.
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