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SPECIAL: राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच टकराव! क्या कहते हैं संविधान विशेषज्ञ ?

राज्यपाल अनुसुइया उइके ने कृषि मंडी संशोधन विधेयक पर अब तक हस्ताक्षर नहीं किए हैं. यह विधेयक भूपेश सरकार की ओर से विधानसभा के विशेष सत्र में पारित किया गया था. राजनीतिक दलों के भले ही इस पर अलग-अलग तर्क है. लेकिन संविधान विशेषज्ञों ने इस विषय पर चिंता जताई है.

Opinion of constitution experts
राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच टकराव!
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Published : Nov 21, 2020, 11:07 PM IST

रायपुर: एक बार फिर से राज्यपाल और छत्तीसगढ़ सरकार के बीच टकराव जैसे हालात दिख रहे हैं. दरअसल, राज्यपाल अनुसुइया उइके ने कृषि मंडी संशोधन विधेयक पर अब तक हस्ताक्षर नहीं किए हैं. यह विधेयक भूपेश सरकार की ओर से विधानसभा के विशेष सत्र में पारित किया गया था.राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच टकराव के हालात को लेकर राजनीतिक दलों के भले ही अलग-अलग तर्क होंगे. लेकिन संविधान विशेषज्ञों ने इस विषय पर चिंता जताई है.

कृषि बिल को लेकर आमने-सामने राजभवन और सरकार

राजभवन के सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक इस विधेयक को लेकर राज्यपाल विधि विशेषज्ञों से राय भी ले रही हैं. वहीं इस तरह की समस्याओं से निपटने के लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल 28 नवंबर को कैबिनेट की बैठक भी बुला रहे हैं. इससे पहले विधानसभा के विशेष सत्र को लेकर भी राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच टकराव के हालात बने थे. 27 और 28 अक्टूबर को विधानसभा में विशेष सत्र बुलाने को लेकर भी राजभवन फाइल भेजी गई थी, लेकिन राजभवन की तरफ से फाइल को लौटा दिया गया था. राजभवन की तरफ से यह कहा गया था कि ऐसी कौन सी परिस्थिति है कि विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया जाए?. काफी विवाद के बाद राज्यपाल ने विशेष सत्र बुलाने को लेकर मंजूरी दे दी थी.

संविधान विशेषज्ञों ने भी जताई चिंता

संविधान विशेषज्ञ और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी रहे डॉ. सुशील त्रिवेदी ने बताया कि अभी लगातार ऐसे हालात देखने को मिल रहे हैं जो राज्य के हित के लिए सही नहीं है. छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से छत्तीसगढ़ में राज्यपाल और सरकार के बीच कभी भी विवाद के हालात नहीं बने हैं. राज्यपाल को यह देखना होता है कि राज्य में संविधान के अनुरूप काम हो रहा है या नहीं, संविधान के अनुरूप विधानसभा सत्र बुलाने का अधिकार राजभवन को दिया गया है, वो औपचारिक है.

पढ़ें-विधेयक पर विवाद! राज्यपाल ने नहीं किए कृषि उपज मंडी संशोधन विधेयक पर दस्तखत, सीएम ने बुलाई बैठक

क्या कहता है नियम?

डॉक्टर सुशील त्रिवेदी ने बताया कि संवैधानिक नियमों के तहत राज्यपाल, पारित विधेयक को एक बार राज्य सरकार को वापस भेज सकती है. इसके बाद यदि यह राज्य सरकार विधेयक उसे फिर से भेजे तो, राज्यपाल को विधेयक को मंजूर करना अनिवार्य हो जाता है. इसके अलावा राज्यपाल विधेयक को राष्ट्रपति को भेज कर उनका भी मत मिलने का इंतजार करेंगे.

राज्यपाल को जानने का अधिकार

इस मसले को लेकर भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहू ने बताया कि राज्यपाल संवैधानिक पद है. इसे लेकर टिप्पणी करना सही नहीं है. उन्होंने बताया कि राज्य सरकार जिस तरफ से मंडी टैक्स में संशोधन करके नया कानून लाया जा रहा हैं, उसमें अनाज और रॉ मटेरियल दोनों में टैक्सेशन है, जो कि गलत है. राज्य सरकार मंडी की आय की चिंता कर रही है, लेकिन किसानों की आय के चिंता नहीं कर रही है. अगर इस बात की जानकारी राजभवन की ओर से ली जा रही है तो इसमें कुछ गलत नहीं है.

पढ़ें-कृषि उपज मंडी संशोधन विधेयक पास: सीएम बोले- राज्यपाल इस पर हस्ताक्षर करती हैं या नहीं, उन पर निर्भर

देश के तमाम गैर भाजपा शासित राज्यों में टकराव के हालात

गैर भाजपा शासित राज्यों में राज्यपाल और राज्य सरकारों के बीच टकराव की स्थिति नजर आ रही है. इनमें पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और केरल का नाम प्रमुख है. पश्चिम बंगाल में राज्यपाल जगदीप धनखड़ और राज्य सरकार के बीच आए दिन किसी न किसी मुद्दे पर विवाद की स्थिति बनी रहती है. इसी तरह महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली सरकार और भगत सिंह कोश्यारी के बीच टकराव की बात सामने आती रही है. केरल में भी संशोधित नागरिकता कानून को लेकर राज्यपाल और केरल सरकार के बीच टकराव चरम पर पहुंच गया था.

सचिव सोनमणि बोरा को हटाए जाने को लेकर जताई थी आपत्ति

हाल ही में राज्यपाल अनुसुइया उइके ने राजभवन के सचिव आईएएस सोनमणि बोरा को हटाए जाने को लेकर राज्य सरकार के खिलाफ जमकर नाराजगी दिखाई थी. उन्होंने अपने सचिव को हटाए जाने के लिए आपत्ति जताते हुए, मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नाम पत्र भी लिख दिया था. इतना ही नहीं उन्होंने राज्य सरकार की ओर से नियुक्त किए गए सचिव की नियुक्ति को लेकर जमकर खिलाफत भी की थी. अनुसुइया उइके ने कहा था कि इसके पहले राजभवन में सचिव स्तर की नियुक्ति करने के लिए राज्यपाल की स्वीकृति की जाती रही है. लेकिन अब उनके बिना सहमति के ही अधिकारियों की नियुक्ति कर दी गई है.

पढ़ें-क्या रोजगार बनेगा नक्सलवाद का तोड़, सीएम और राज्यपाल की राय कितनी आएगी काम ?

राजभवन के दरवाजे सबके लिए खोलने का प्रयास

राज्यपाल अनुसुइया उइके ने छत्तीसगढ़ पहुंचने के साथ ही परंपरागत अवधारणा के विपरीत आम लोगों, आदिवासियों और दीनदुखियों के लिए काम करने राजभवन के दरवाजे खोल दिए. कुछ ही दिनों में उनकी सक्रियता की जानकारी छत्तीसगढ़ के कोने-कोने में पहुंची. लोग अपनी समस्या लेकर राजभवन तक पहुंचने लगे.

फील्ड में भी जाकर दिखाई सक्रियता

राज्यपाल अनुसुइया उइके ने फील्ड में जाकर भी सक्रियता दिखाई है. जैसे ही उन्हें सुपेबेड़ा में किडनी के बीमारियों से ग्रसित इलाके की जानकारी मिली. उस जगह का दौरा करके उन्होंने लोगों से सीधे बात की. उन्होंने सारे निर्धारित कार्यक्रमों को रद्द कर खुद सुपेबेड़ा पहुंचकर ग्रामीणों का का हाल जाना. उनकी पहल पर स्वास्थ्य विभाग ने 24 करोड़ के कार्यों की घोषणा की जो कि 15 सालों से लंबित थी.

पढ़ें-छत्तीसगढ़ को नक्सल मुक्त करने की कोशिश, आदिवासी इलाकों में बेराजगारी समस्या: राज्यपाल

राज्य सरकार के खिलाफ भी खुल कर रही मुखर

राज्यपाल अनुसुइया उइके तमाम मुद्दों और मसलों को लेकर हमेशा से ही सुर्खियों में रही है. छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार की ओर से प्रदेश के तमाम विश्वविद्यालयों में नाम बदलने को लेकर उन्होंने आपत्ति जताई थी. राज्य सरकार के कैबिनेट मंत्रियों के प्रतिनिधिमंडल उनसे मिलने पहुंचे तो उन्होंने सीधे तौर पर इस फैसले को लेकर कड़ा एतराज जताया था.

कहीं ये तो नहीं टकराव की वजह ?

केंद्र सरकार की ओर से लाए गए कृषि बिल को लेकर कांग्रेस देशभर में विरोध कर रही है. छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार है और यहां भी सरकार ने इस बिल को लेकर विरोध किया है. अब राज्य सरकार किसानों के लिए मंडी संशोधन विधेयक को विधानसभा में पारित करवा लिया है. लेकिन इसके लिए राज्य सरकार की ओर से भेजे गए विधेयक पर राज्यपाल अनुसुईया उईके ने हस्ताक्षर नहीं किया है. अनुसुइया उइके राज्यपाल की परिपाटी से अलग होकर लगातार जनता के तमाम मुद्दों पर मुखर होकर संपर्क में रही है. यही वजह है कि अब उनकी ये सक्रियता राज्य सरकार और राजभवन के बीच टकराहट का कारण बनने लगी है.

रायपुर: एक बार फिर से राज्यपाल और छत्तीसगढ़ सरकार के बीच टकराव जैसे हालात दिख रहे हैं. दरअसल, राज्यपाल अनुसुइया उइके ने कृषि मंडी संशोधन विधेयक पर अब तक हस्ताक्षर नहीं किए हैं. यह विधेयक भूपेश सरकार की ओर से विधानसभा के विशेष सत्र में पारित किया गया था.राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच टकराव के हालात को लेकर राजनीतिक दलों के भले ही अलग-अलग तर्क होंगे. लेकिन संविधान विशेषज्ञों ने इस विषय पर चिंता जताई है.

कृषि बिल को लेकर आमने-सामने राजभवन और सरकार

राजभवन के सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक इस विधेयक को लेकर राज्यपाल विधि विशेषज्ञों से राय भी ले रही हैं. वहीं इस तरह की समस्याओं से निपटने के लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल 28 नवंबर को कैबिनेट की बैठक भी बुला रहे हैं. इससे पहले विधानसभा के विशेष सत्र को लेकर भी राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच टकराव के हालात बने थे. 27 और 28 अक्टूबर को विधानसभा में विशेष सत्र बुलाने को लेकर भी राजभवन फाइल भेजी गई थी, लेकिन राजभवन की तरफ से फाइल को लौटा दिया गया था. राजभवन की तरफ से यह कहा गया था कि ऐसी कौन सी परिस्थिति है कि विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया जाए?. काफी विवाद के बाद राज्यपाल ने विशेष सत्र बुलाने को लेकर मंजूरी दे दी थी.

संविधान विशेषज्ञों ने भी जताई चिंता

संविधान विशेषज्ञ और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी रहे डॉ. सुशील त्रिवेदी ने बताया कि अभी लगातार ऐसे हालात देखने को मिल रहे हैं जो राज्य के हित के लिए सही नहीं है. छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से छत्तीसगढ़ में राज्यपाल और सरकार के बीच कभी भी विवाद के हालात नहीं बने हैं. राज्यपाल को यह देखना होता है कि राज्य में संविधान के अनुरूप काम हो रहा है या नहीं, संविधान के अनुरूप विधानसभा सत्र बुलाने का अधिकार राजभवन को दिया गया है, वो औपचारिक है.

पढ़ें-विधेयक पर विवाद! राज्यपाल ने नहीं किए कृषि उपज मंडी संशोधन विधेयक पर दस्तखत, सीएम ने बुलाई बैठक

क्या कहता है नियम?

डॉक्टर सुशील त्रिवेदी ने बताया कि संवैधानिक नियमों के तहत राज्यपाल, पारित विधेयक को एक बार राज्य सरकार को वापस भेज सकती है. इसके बाद यदि यह राज्य सरकार विधेयक उसे फिर से भेजे तो, राज्यपाल को विधेयक को मंजूर करना अनिवार्य हो जाता है. इसके अलावा राज्यपाल विधेयक को राष्ट्रपति को भेज कर उनका भी मत मिलने का इंतजार करेंगे.

राज्यपाल को जानने का अधिकार

इस मसले को लेकर भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहू ने बताया कि राज्यपाल संवैधानिक पद है. इसे लेकर टिप्पणी करना सही नहीं है. उन्होंने बताया कि राज्य सरकार जिस तरफ से मंडी टैक्स में संशोधन करके नया कानून लाया जा रहा हैं, उसमें अनाज और रॉ मटेरियल दोनों में टैक्सेशन है, जो कि गलत है. राज्य सरकार मंडी की आय की चिंता कर रही है, लेकिन किसानों की आय के चिंता नहीं कर रही है. अगर इस बात की जानकारी राजभवन की ओर से ली जा रही है तो इसमें कुछ गलत नहीं है.

पढ़ें-कृषि उपज मंडी संशोधन विधेयक पास: सीएम बोले- राज्यपाल इस पर हस्ताक्षर करती हैं या नहीं, उन पर निर्भर

देश के तमाम गैर भाजपा शासित राज्यों में टकराव के हालात

गैर भाजपा शासित राज्यों में राज्यपाल और राज्य सरकारों के बीच टकराव की स्थिति नजर आ रही है. इनमें पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और केरल का नाम प्रमुख है. पश्चिम बंगाल में राज्यपाल जगदीप धनखड़ और राज्य सरकार के बीच आए दिन किसी न किसी मुद्दे पर विवाद की स्थिति बनी रहती है. इसी तरह महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली सरकार और भगत सिंह कोश्यारी के बीच टकराव की बात सामने आती रही है. केरल में भी संशोधित नागरिकता कानून को लेकर राज्यपाल और केरल सरकार के बीच टकराव चरम पर पहुंच गया था.

सचिव सोनमणि बोरा को हटाए जाने को लेकर जताई थी आपत्ति

हाल ही में राज्यपाल अनुसुइया उइके ने राजभवन के सचिव आईएएस सोनमणि बोरा को हटाए जाने को लेकर राज्य सरकार के खिलाफ जमकर नाराजगी दिखाई थी. उन्होंने अपने सचिव को हटाए जाने के लिए आपत्ति जताते हुए, मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नाम पत्र भी लिख दिया था. इतना ही नहीं उन्होंने राज्य सरकार की ओर से नियुक्त किए गए सचिव की नियुक्ति को लेकर जमकर खिलाफत भी की थी. अनुसुइया उइके ने कहा था कि इसके पहले राजभवन में सचिव स्तर की नियुक्ति करने के लिए राज्यपाल की स्वीकृति की जाती रही है. लेकिन अब उनके बिना सहमति के ही अधिकारियों की नियुक्ति कर दी गई है.

पढ़ें-क्या रोजगार बनेगा नक्सलवाद का तोड़, सीएम और राज्यपाल की राय कितनी आएगी काम ?

राजभवन के दरवाजे सबके लिए खोलने का प्रयास

राज्यपाल अनुसुइया उइके ने छत्तीसगढ़ पहुंचने के साथ ही परंपरागत अवधारणा के विपरीत आम लोगों, आदिवासियों और दीनदुखियों के लिए काम करने राजभवन के दरवाजे खोल दिए. कुछ ही दिनों में उनकी सक्रियता की जानकारी छत्तीसगढ़ के कोने-कोने में पहुंची. लोग अपनी समस्या लेकर राजभवन तक पहुंचने लगे.

फील्ड में भी जाकर दिखाई सक्रियता

राज्यपाल अनुसुइया उइके ने फील्ड में जाकर भी सक्रियता दिखाई है. जैसे ही उन्हें सुपेबेड़ा में किडनी के बीमारियों से ग्रसित इलाके की जानकारी मिली. उस जगह का दौरा करके उन्होंने लोगों से सीधे बात की. उन्होंने सारे निर्धारित कार्यक्रमों को रद्द कर खुद सुपेबेड़ा पहुंचकर ग्रामीणों का का हाल जाना. उनकी पहल पर स्वास्थ्य विभाग ने 24 करोड़ के कार्यों की घोषणा की जो कि 15 सालों से लंबित थी.

पढ़ें-छत्तीसगढ़ को नक्सल मुक्त करने की कोशिश, आदिवासी इलाकों में बेराजगारी समस्या: राज्यपाल

राज्य सरकार के खिलाफ भी खुल कर रही मुखर

राज्यपाल अनुसुइया उइके तमाम मुद्दों और मसलों को लेकर हमेशा से ही सुर्खियों में रही है. छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार की ओर से प्रदेश के तमाम विश्वविद्यालयों में नाम बदलने को लेकर उन्होंने आपत्ति जताई थी. राज्य सरकार के कैबिनेट मंत्रियों के प्रतिनिधिमंडल उनसे मिलने पहुंचे तो उन्होंने सीधे तौर पर इस फैसले को लेकर कड़ा एतराज जताया था.

कहीं ये तो नहीं टकराव की वजह ?

केंद्र सरकार की ओर से लाए गए कृषि बिल को लेकर कांग्रेस देशभर में विरोध कर रही है. छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार है और यहां भी सरकार ने इस बिल को लेकर विरोध किया है. अब राज्य सरकार किसानों के लिए मंडी संशोधन विधेयक को विधानसभा में पारित करवा लिया है. लेकिन इसके लिए राज्य सरकार की ओर से भेजे गए विधेयक पर राज्यपाल अनुसुईया उईके ने हस्ताक्षर नहीं किया है. अनुसुइया उइके राज्यपाल की परिपाटी से अलग होकर लगातार जनता के तमाम मुद्दों पर मुखर होकर संपर्क में रही है. यही वजह है कि अब उनकी ये सक्रियता राज्य सरकार और राजभवन के बीच टकराहट का कारण बनने लगी है.

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