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स्वास्थ्य मंत्री से इच्छा मृत्यु की मांग, बीमारी से परेशान युवक का टूटा सब्र

कोरिया के एक शख्स ने स्वास्थ्यमंत्री से इच्छा मृत्यु की मांग की है.जानिए आखिर क्यों ये शख्स नहीं जीना चाहता.

Demand for euthanasia
स्वास्थ्य मंत्री से इच्छा मृत्यु की मांग (ETV Bharat Chhattisgarh)
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By ETV Bharat Chhattisgarh Team

Published : 2 hours ago

कोरिया : इस दुनिया में आपने लोगों को अपनी जिंदगी के लिए संघर्ष करते देखा होगा.कई लोग ऐसे भी हैं जिन्हें मौत का नाम सुनकर ही डर लगता है.फिर भी हमारे आसपास ऐसे कई लोग हैं जिन्हें जिंदगी से ज्यादा मौत का इंतजार है.ऐसे ही एक शख्स कोरिया जिले में हैं.जिन्हें अब जीने का कोई शौक नहीं है.इसलिए इस शख्स ने अपनी मौत के लिए बकायदा स्वास्थ्य मंत्री से गुहार लगाई है. शख्स की माने तो यदि स्वास्थ्य मंत्री इजाजत दे दें तो उसे इस जिंदगी से छुटकारा मिल जाएगा.

क्या है पूरा मामला ?: कोरिया जिले के सोनहत ब्लॉक के बंदरा गांव का निवासी शंकर यादव पिछले 20 साल से घुट-घुटकर जी रहा है.इसके लिए अब एक दिन भी निकालना किसी पहाड़ से कम नहीं है. शंकर यादव को फाइलेरिया हुआ है.जिसे लोग हाथी पांव के नाम से जानते हैं.बीमारी की वजह से इंसान का पांव अनियमित तौर पर बढ़ने लगता है.बात सिर्फ यही खत्म नहीं होती.जब पैर के मांस बढ़ते हैं तो उनमें घाव होता है.जो काफी तकलीफ देह होता है.एक घाव ठीक होने पर दूसरी जगह पर जख्म बन जाते हैं.ये सिलसिला चलता रहता है.

शंकर यादव के दोनों पैर इस बीमारी के चपेट में है.अपने जख्मों को बचाने के लिए उसे चौबीस घंटे दोनों पैरों को कपड़े से बांधकर रखना पड़ता है.जो काफी तकलीफदेह है.पिछले 20 साल से शंकर यादव इस बीमारी का बोझ ढो रहे हैं.लेकिन उनका इलाज नहीं हो सका.शंकर यादव अस्पताल के चक्कर काट रहे हैं.लेकिन उनकी उम्मीद उस वक्त जवाब दे गई जब डॉक्टरों ने बताया कि फाइलेरिया के इलाज के लिए 17 लाख रुपए लगेंगे.अब शंकर ने स्वास्थ्य मंत्री से इलाज करवाने की अपील की है.ऐसा ना होने पर शंकर इच्छा मृत्यु चाहता है.

मेरी स्वास्थ्य मंत्री से अपील है कि मेरा इलाज करवा दें या फिर मुझे इच्छा मृत्यु दे दें.क्योंकि बीस साल से मैं इस बीमारी का बोझ ढोकर थक गया हूं.जमीन भी गिरवी रख दी है.सबकुछ खत्म हो चुका है- शंकर यादव, पीड़ित

आर्थिक स्थिति नहीं है ठीक : शंकर यादव की आर्थिक स्थिति ठीक नही है. पिता बचपन में ही गुजर गए. मां बुजुर्ग है, बोल नहीं पाती लेकिन अपना और बेटे का पेट भरने के लिए मजदूरी करती है. मां ने बेटे के इलाज के लिए जमीन गिरवी रख दी.जिससे मिले पैसे तो खत्म हो गए लेकिन बेटे का दर्द जरा भी कम ना हुआ.अब परिवार के पास ना जमीन है और ना ही कोई दूसरी आजीविका का साधन.इसलिए शंकर यादव ने स्वास्थ्य मंत्री से गुहार लगाई है. शंकर यादव का कहना है कि यदि उसका इलाज सरकारी खर्चे से ना हो पाए तो कम से कम उसे इच्छा मृत्यु दे दी जाए.ताकि उसकी तकलीफ कम हो.

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क्या है पूरा मामला ?: कोरिया जिले के सोनहत ब्लॉक के बंदरा गांव का निवासी शंकर यादव पिछले 20 साल से घुट-घुटकर जी रहा है.इसके लिए अब एक दिन भी निकालना किसी पहाड़ से कम नहीं है. शंकर यादव को फाइलेरिया हुआ है.जिसे लोग हाथी पांव के नाम से जानते हैं.बीमारी की वजह से इंसान का पांव अनियमित तौर पर बढ़ने लगता है.बात सिर्फ यही खत्म नहीं होती.जब पैर के मांस बढ़ते हैं तो उनमें घाव होता है.जो काफी तकलीफ देह होता है.एक घाव ठीक होने पर दूसरी जगह पर जख्म बन जाते हैं.ये सिलसिला चलता रहता है.

शंकर यादव के दोनों पैर इस बीमारी के चपेट में है.अपने जख्मों को बचाने के लिए उसे चौबीस घंटे दोनों पैरों को कपड़े से बांधकर रखना पड़ता है.जो काफी तकलीफदेह है.पिछले 20 साल से शंकर यादव इस बीमारी का बोझ ढो रहे हैं.लेकिन उनका इलाज नहीं हो सका.शंकर यादव अस्पताल के चक्कर काट रहे हैं.लेकिन उनकी उम्मीद उस वक्त जवाब दे गई जब डॉक्टरों ने बताया कि फाइलेरिया के इलाज के लिए 17 लाख रुपए लगेंगे.अब शंकर ने स्वास्थ्य मंत्री से इलाज करवाने की अपील की है.ऐसा ना होने पर शंकर इच्छा मृत्यु चाहता है.

मेरी स्वास्थ्य मंत्री से अपील है कि मेरा इलाज करवा दें या फिर मुझे इच्छा मृत्यु दे दें.क्योंकि बीस साल से मैं इस बीमारी का बोझ ढोकर थक गया हूं.जमीन भी गिरवी रख दी है.सबकुछ खत्म हो चुका है- शंकर यादव, पीड़ित

आर्थिक स्थिति नहीं है ठीक : शंकर यादव की आर्थिक स्थिति ठीक नही है. पिता बचपन में ही गुजर गए. मां बुजुर्ग है, बोल नहीं पाती लेकिन अपना और बेटे का पेट भरने के लिए मजदूरी करती है. मां ने बेटे के इलाज के लिए जमीन गिरवी रख दी.जिससे मिले पैसे तो खत्म हो गए लेकिन बेटे का दर्द जरा भी कम ना हुआ.अब परिवार के पास ना जमीन है और ना ही कोई दूसरी आजीविका का साधन.इसलिए शंकर यादव ने स्वास्थ्य मंत्री से गुहार लगाई है. शंकर यादव का कहना है कि यदि उसका इलाज सरकारी खर्चे से ना हो पाए तो कम से कम उसे इच्छा मृत्यु दे दी जाए.ताकि उसकी तकलीफ कम हो.

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