हैदराबाद: अगर आपको साइंस के मजेदार इवेंट्स और टॉपिक्स को समझने में मजा आता है तो आपने डार्क एनर्जी के बारे में जरूर सुना होगा. डार्क एनर्जी विज्ञान की दुनिया में मौजूद अबतक का सबसे बड़ा रहस्य है. वैज्ञानिक डार्क एनर्जी के बारे में पिछले करीब 100 सालों से रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अबतक कुछ वैज्ञानिकों को कुछ भी ठोस नहीं मिला है. हालांकि पिछले कई दशकों से वैज्ञानिक दावा करते आ रहे हैं कि डार्क एनर्जी एक ऐसी पॉवर है, जिसके कारण ब्रह्मांड लगातार तेजी से फैल रहा है. हालांकि, अब वैज्ञानिकों ने एक नया दावा किया है कि असल में ब्रह्मांड में "डार्क एनर्जी" का कोई अस्तित्व ही नहीं है और इसे एक गलत समझी गई थ्योरी के रूप में समझा जा सकता है. आइए हम आपको इस विषय के बारे में विस्तार से समझाते हैं.
डार्क एनर्जी की गुत्थी सुलझी!
अल्बर्ट आइंस्टीन ने करीब 100 साल पहले अपनी एक रिसर्च के बाद दावा किया था कि ब्रह्मांड में पृथ्वी, मंगल, बुध, शनि, सूर्य और चांद की तरह और भी अनेकों ग्रह, उपग्रह और आकाशगंगाएं हैं. ऐसे में सवाल उठा था कि अगर ब्रह्मांड में इतने सारे ग्रह और उपग्रह हैं तो वो आपस में टकराते क्यों नहीं है? इस सवाल का जवाब ढूंढते हुए वैज्ञानिक डार्क एनर्जी नाम की एक रहस्यमयी थ्योरी तक पहुंचे थे. उनका मानना था कि डार्क एनर्जी नाम की किसी चीज के कारण ब्रह्मांड सभी दिशा में लगातार एक समान गति से फैल रहा है. हालांकि, इस थ्योरी पर हमेशा कई सवाल खड़े हुए और ज्यादातर सवालों के जवाब आजतक नहीं मिल पाए हैं.
अब, न्यूजीलैंड के कैन्टरबरी यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने सुपरनोवा (बड़े तारों में हुए विस्फोट) के लाइट कर्व्स का गहरा विश्लेषण करके एक नई थ्योरी पेश की है. इस नई रिसर्च को "Monthly Notices of the Royal Astronomical Society Letters" नाम की एक जर्नल में पब्लिश किया गया है. उनके अनुसार, ब्रह्मांड का विस्तार समान रूप से नहीं हो रहा, बल्कि यह कुछ हद तक "लम्पी" या ऊबड़-खाबड़ रूप में असमान तरीके से हो रहा है. इसे आसान शब्दों में समझे तो इन वैज्ञानिकों का मानना है कि ब्रह्मांड का विस्तार असमान रूप से किसी अदरक के आकार की तरह हो रहा है. इसका मतलब है कि ब्रह्मांड के कुछ हिस्से तेजी से फैल रहे हैं, जबकि कुछ हिस्से धीरे-धीरे, और इसका डार्क एनर्जी से कोई लेना-देना नहीं है, इसलिए डार्क एनर्जी जैसी कोई चीज कभी थी ही नहीं. ऐसे में सवाल उठता है कि ब्रह्मांड का विस्तार किस कारण हो रहा है, तो इसके लिए कैन्टरबरी यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के द्वारा किए गए नए रिसर्च के अनुसार "टाइम्सकेप" मॉडल (Timescape Model) को सही माना जा सकता है.
टाइम्सकेप मॉडल क्या है?
नए रिसर्च से पता चला है कि ब्रह्मांड के विस्तार के लिए "टाइम्सकेप" मॉडल (Timescape Model) को सही माना जा सकता है, जिसमें डार्क एनर्जी की जरूरत नहीं है. इस मॉडल के मुताबिक लाइट एक्सपैंशन में होने वाले अंतर का कारण ब्रह्मांड का तेजी से फैलना नहीं बल्कि इस बात का नतीजा है कि हम समय और दूरी को कैसे मापते हैं. इसमें यह विचार किया गया है कि गुरुत्वाकर्षण (Gravity) टाइम को स्लो कर देता है, इसका मतलब है कि घर में मौजूद एक साधारण घड़ी अंतरिक्ष में तेज़ रफ्तार से चलेगी, लेकिन किसी आकाशगंगा (Galaxy) के अंदर उसी सेम घड़ी की रफ्तार धीमी होगी.
इस शोध के मुताबिक, अगर हम मिल्की-वे यानी आकाशगंगाओं (Milky Way) में एक घड़ी रखें, तो वह सेम घड़ी से लगभग 35 प्रतिशत धीमी चलेगी, जो किसी बड़े ब्रह्मांडीय खाली स्थान (Cosmic Voids) में हो सकती है. इस थ्योरी से यह समझ में आता है कि ब्रह्मांड में खाली स्थानों का विस्तार अधिक दिखाई देता है, जिससे ऐसा लगता है कि ब्रह्मांड तेजी से फैल रहा है, जबकि असल में यह सिर्फ समय और दूरी को मापने की प्रक्रिया का नतीजा है.
इस थ्योरी को आसान शब्दों में समझें तो टाइमस्केप मॉडल" हमें यह बताता है कि, हमें ब्रह्मांड के फैलाव को समझने के लिए 'समय' और 'दूरी' को नए तरीके से देखने की जरूरत है. यह मॉडल बताता है कि गुरुत्वाकर्षण (Gravity) टाइम को स्लो कर देता है, यानी आकाशगंगाओं के अंदर टाइम बाहरी स्थानों की तुलना में स्लो चलता है. इस वजह से, हमारे द्वारा देखे गए फैलाव को सिर्फ समय और दूरी (Time and Distance) के सही हिसाब से ही समझा जा सकता है, ना कि डार्क एनर्जी के कारण.