रायपुर :छत्तीसगढ़ में लोकपर्व छेरछरा काफी उत्साह से मनाया जा रहा है. इस दिन ग्रामीण इलाकों में बच्चों की टोली घर-घर जाकर छेरछेरा मांगते हैं. छेरछेरा यानी नई धान की फसल से निकाला गया चावल. छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में इस पर्व की अलग ही छटा देखने को मिलती है.ऐसा कहा जाता है कि जो भी इस दिन बच्चों को ये दान करता है वो महादान कहलाता है. हर साल ये पर्व पौष माह की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है.
क्या है छेरछेरा की पौराणिक मान्यता ? :ऐसी मान्यता है कि कौसल प्रदेश के राजा कल्याण साय मुगल सम्राट ने जहांगीर की सल्तनत में युद्ध कला के प्रशिक्षण के लिए गए थे. इस दौरान 8 साल तक महारानी ने राज-काज का काम संभाला. जब वे वापस लौटे तो महारानी ने सोने-चांदी के सिक्के बांटे. उस दिन से दान देने की परंपरा शुरु हुई. ये परंपरा छेरछेरा के रूप में आज भी प्रदेश में जीवित है. इस दिन बच्चे घर-घर जाकर 'अरन बरन कोदो दरन, जभे देबे तभे टरन... छेरछेरा, माई कोठी के धान ले हेरते हेरा...' बोलकर दान मांगते हैं. इस दिन धान के दान का विशेष महत्व है. इस मौके पर छत्तीसगढ़ के नेताओं ने प्रदेशवासियों को छेरछेरा पर्व की बधाई दी है.