रोहतास: 'शरीर से हिन्दू लेकिन रूह में इस्लाम..', सुनने में थोड़ा अजीब लग रहा होगा, लेकिन यही सच्चाई है. बिहार में एक ऐसा ही मामला सामने आया है, जिससे हैरानी तो होगी लेकिन इससे यह सीख जरूर मिलेगी की "सभी धर्मों का सम्मान करना जरूरीहै." धर्म कोई भी हो एक ना एक दिन सभी को इसी मिट्टी में मिल जाना है. जब मिट्टी धर्म में भेदवाव नहीं करती तो हमें घमंड किस बात का.
7 फरवरी 2025 शुक्रवार का दिन था. डेहरी इलाके के मणिनगर में लक्ष्मण राम की धर्मपत्नी 58 वर्षीय संगीता देवी का निधन हो जाता है. निधन की खबर जैसे ही फैली गांव के मुस्लिम समुदाय के लोग संगीता देवी को कंधा देने लिए पहुंच गए. साजो-सज्जा के साथ जनाजा निकाल कर कब्रिस्तान में संगीता देवी को दफन किया गया.
हिन्दू होते हुए भी अल्लाह में आस्था: संगीता देवी का जन्म हिन्दू परिवार में हुआ था लेकिन इनका अंतिम संस्कार मुस्लिम धर्म के अनुसार हुआ. इसके पीछे की कहानी काफी अलग है. इस बारे में संगीता के पति लक्ष्मण राम बताते हैं कि हिन्दू होते हुए भी इनकी पत्नी की आस्था अल्लाह के प्रति थी. इसका सबसे बड़ा कारण है परिवार.
"संगीता देवी को बचपन से ही इस्लाम धर्म में आस्था रही थी. पांचों वक्त जुम्मे की नमाज अदा करती थी. माहे रमजान में महीने के तीस रोजा भी करती थी. ख्वाजा, अजमेर शरीफ की दरगाह से लेकर गौस पाक जाकर अल्लाह से दुआ मांगती थी. इसलिए संगीता की इच्छा थी कि उनके निधन के बाद उन्हें दफनाया जाए."-लक्ष्मण राम, संगीता के पति
संतान प्राप्ति के बाद रोजा रखा: लक्ष्मण राम बताते हैं कि 40 वर्ष पूर्व उनकी शादी संगीता से हुई थी. शादी की तकरीबन 10 साल तक उन्हें कोई संतान नहीं हुआ. इसके बाद संगीता को किसी ने दरगाह जाने की सलाह दी. संगीता कई दरगाह गयी और संतान के लिए मन्नत मांगी. लक्ष्ण बताते हैं कि इसके बाद उन्हें संतान की प्राप्ति हुई. इसके बाद से संगीत रोजा रखने लगी और इस्लाम धर्म के प्रति गहरी आस्था हो गयी.