रायपुर:छत्तीसगढ़ की राजनीति में नेताओं के वंशजों पर जनता की शुरु से नजर रही है. छत्तीसगढ़ में कई ऐसे नेता हैं जिनके बेटे आज राजनीति में अपना भाग्य आजमा रहे हैं. कई दिग्गजों के बेटे आज राजनीति में सफल हैं तो कईयों ने सियासी मैदान से अपनी दूरी बना ली है. पीढ़ी परिवर्तन की ये प्रक्रिया करीब दो दशकों से जारी है. छत्तीसगढ़ की राजनीति में जिन बेटों ने पिता की सियासी विरासत को आगे बढ़ाया उसमें कई नाम शामिल हैं.
पिता से मिली सियासी विरासत संभाल रहे बेटे: बीजेपी हो या फिर कांग्रेस दोनों ही दलों दिग्गज नेताओं के बेटे आज छत्तीसगढ़ की राजनीति में अपना अहम स्थान रखते हैं. बात चाहे रमन सिंह के बेटे की हो या फिर नंदकुमार पटेल के बेटे उमेश पटेल की. ज्यादातर नेताओं के बेटे आज सियासत के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाने में कामयाब रहे हैं. कुछ नाम ऐसे भी रहे जिन्होने सिसायत के क्षेत्र से अपनी दूरी बना ली.
मोतीलाल वोरा के बेटे अरुण वोरा: कांग्रेस में एक समय दो बड़े नाम होते थे मोतीलाल वोरा और पंडित श्यामाचरण शुक्ल. मोतीलाल वोरा के बेटे अरुण वोरा, उन्होंने एक अच्छी लंबी पारी तो खेली लेकिन उनकी खुशकिस्मती देखिए की तीन बार लगातार चुनाव हारने के बाद भी उन्हें चौथी बार टिकट दिया गया. चौथी बार में वो चुनाव जीते. साल 2023 में हुए विधानसभा चुनाव में हार गए.
पं.श्यामा चरण शुक्ल के बेटे अमितेश शुक्ल और फिर उनके बेटे भवानी शुक्ला: वहीं अमितेश शुक्लपंडित श्यामा चरण शुक्ल के बाद कि विरासत को वो बढ़ाते हुए नजर आए. साल 2023 के विधानसभा चुनाव लेकिन वो राजिम से हार गए. अब वहां से अमितेश शुक्ल के बेटे भवानी शुक्ल का नाम राजनीति में आने लगा और अब वो सियासत के मैदान में स्थापित हो गए हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव में यह चर्चा थी कि भवानी शुक्ला को महासमुंद लोकसभा सीट से कांग्रेस की टिकट मिल सकता है. पर पार्टी ने उनको टिकट नहीं दिया.
नंदकुमार पटेल के बेटे उमेश पटेल: नंदकुमार पटेल कांग्रेस के दिग्गज नेता थे, प्रदेश अध्यक्ष रहे. झीरम कांड में उनकी हत्या हो गई. पिता की विरासत को दीपक पटेल संभालते लेकिन उनकी भी मौत झीरम हमले में हो गई. पिता और भाई की मौत के बाद उमेश पटेल ने परिवार की सियासी विरासत को आगे बढ़ाया. साल 2013, 2018, 2023 का चुनाव जीते. सदन से लेकर पार्टी स्तर पर उनकी पकड़ मजबूत है. उमेश पटेल राजनीति में अभी लंबी पारी खेलने को तैयार हैं.