शहडोल। शहडोल जिले का कलचुरिकालीन विराट शिव मंदिर अनूठा है. इस शिव मंदिर में स्थित शिवलिंग के दर्शन मात्र से ही बारह ज्योतिर्लिंगों के दर्शन का लाभ एक साथ ही मिल जाता है. इतना ही नहीं, यह शिव मंदिर पुरातात्विक धरोहर है. इस मंदिर में गढ़ी गईं अद्भुत प्रतिमाएं और कलाकृतियां मन मोह लेती हैं. ये मंदिर अर्थ, काम के बाद मोक्ष का रास्ता बताता है. शिव मंदिर मुख्य मार्ग से लगा हुआ है. जहां आसानी से पहुंचा जा सकता है. इस विराट शिव मंदिर को लेकर पुरातत्वविद् रामनाथ सिंह परमार कहते हैं शहडोल संभाग का या कहिए विंध्य क्षेत्र का यह अति विशिष्ट शिव मंदिर है. यह विराटेश्वर शिव मंदिर के नाम से जाना जाता है. इस मंदिर का निर्माण कलचुरी नरेश युवराज देव प्रथम ने करवाया था.
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मंदिर का निर्माण 10 वीं से 11 वीं सदी में : इस मंदिर का निर्माण 10 वीं से 11 वीं सदी में कराया गया था. विराट मंदिर की विशेषता बताते हुए पुरातत्वविद् रामनाथ सिंह परमार कहते हैं ये पूर्वाभिमुख मंदिर शिव को समर्पित है. इसके गर्भ गृह में शिवलिंग जलहरी प्रतिस्थापित है. इसके गर्भ गृह में जो द्वार शाखाएं हैं, वह देवी-देवताओं से युक्त हैं. इसके अलावा भी अंदर अन्य प्रतिमाएं भी रखी हुई हैं. शिव को एक पारिवारिक देवता माना जाता है, जो सभी के लिए स्वीकार होते हैं. गणेश, कार्तिकेय, गौरी, उमा महेश्वर, गौरी शंकर इस तरह से प्रतिमाएं लगी हुई हैं.
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मंदिर में ब्रह्मा, विष्णु व महेश : मंदिर में ब्रह्मा, विष्णु व महेश का भी अंकन है. इसमें देवी गौरी के या नव दुर्गाओं के भी कुछ स्वरूपों का अंकन किया गया है. यह विशिष्ट रूप से विद्यमान हैं. अलग- अलग तरह के अप्सराओं का भी मंदिर में शिल्पन देखने को मिलता है. विभिन्न प्रकार की अप्सराएं हैं शिल्पित कर मंदिर में लगाई गईं हैं. प्राचीन काल से ही मनुष्य को चार आश्रम में ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास और उसी क्रम में चार पुरुषार्थ अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष इनका कॉन्बिनेशन करके ही इन प्रतिमाओं को इस मंदिर में लगाया गया है. जहां तीर्थाटन रूप में या पर्यटक रूप में जो लोग भी आते हैं और वहां के विभिन्न स्वरूपों का दर्शन करते हैं और जीवन को सार्थक बनाते हैं.
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मंदिर को देखकर खजुराहो की यादें ताज़ा हो जाएंगी : पुरातत्वविद् रामनाथ सिंह परमार कहते हैं मंदिर की बनावट ऐसी है कि अनायास ही खजुराहो की यादें ताज़ा हो जाएंगी. चंदेल शासकों ने खजुराहो के मंदिर बनवाए थे और महाकौशल या विंध्य क्षेत्र में कलचुरी नरेशों ने ये मंदिर बनवाए थे. शिल्पन का कार्य काफी मात्रा में हुआ, जिसमें अति विशिष्ट मंदिर बनाए गए और प्रतिमाएं गढ़ी गईं. यह मंदिर भी 10 वीं 11 वीं सदी ईस्वी के हैं. ये भी खजुराहो के समकालीन ही हैं और लगभग उसी तरह की प्रतिमाएं और उसी तरह से इसमें भी प्रतिमाओं का शिल्पन कर अंकन किया गया है. (Devotees gathered in Shiv Temple) (Shiv temple on first Monday of Sawan) (Splendor and history of Virat Shiva temple)