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सहानुभूति की लहर कर सकती है चिराग की 'नैया' पार, 'फंसे' नीतीश

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Published : Oct 9, 2020, 8:41 PM IST

Updated : Oct 9, 2020, 9:33 PM IST

एलजेपी संस्थापक राम विलास पासवान के निधन के बाद बिहार विधानसभा चुनाव में सहानुभूति फैक्टर सियासी समीकरण बना और बिगाड़ सकते हैं. ऐसे में माना जा रहा है कि इसका सीधा नुकसान नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू को हो सकता है.

chirag victory
चिराग की नैया पार

पटना : बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले चिराग पासवान ने बिहार में एनडीए से नाता तोड़ लिया. वहीं, चिराग पासवान ने यह भी साफ कर दिया कि वह जेडीयू के हर प्रत्याशी के खिलाफ उम्मीदवार उतारेंगे. इसी बीच केंद्रीय मंत्री और चिराग के पिता राम विलास पासवान का निधन हो गया. चुनावी सरगर्मी के बीच पासवान के निधन से लोगों के बीच सहानुभूति की लहर उठ सकती है और उससे कई सीटों पर सियासी समीकरण बदल सकते हैं. कयास लगाए जा रहे हैं कि इससे सबसे ज्यादा नुकसान जेडीयू को हो सकता है.

लोगों के बीच सहानुभूति की लहर
बिहार के पांच जिलों में दलित वोटर एक बड़ा फैक्टर है. इन जिलों में राम विलास पासवान के निधन के बाद लोगों के बीच सहानुभूति की लहर है. माना जा रहा है कि इसका सीधा फायदा एलजेपी को हो सकता है.

ये भी पढ़ें: बिहार के इन सीटों पर रहेगी सबकी नजर, कई पर है सीधा मुकाबला

दलित और महादलित वोटरों की आबादी करीब 16 फीसदी
अगर पूरे बिहार के परिपेक्ष्य में बात करें तो दलित वोटरों का रुख किसी भी पार्टी की हार जीत तय कर सकता है. बिहार में दलित और महादलित वोटरों की आबादी करीब 16 फीसदी है. 2005 के विधानसभा चुनाव में एलजेपी ने नीतीश का साथ नहीं दिया था. इससे नाराज नीतीश कुमार ने दलित वोटों में सेंधमारी के लिए बड़ा दांव चलते हुए 22 में से 21 दलित जातियों को महादलित घोषित कर दिया और इसमें उन्होंने पासवान जाति को शामिल नहीं किया. जिसके बाद बिहार में महादलितों की आबादी करीब 10 फीसदी हो गई, जबकि पासवान वोटरों की संख्या करीब 4.5 फीसदी रह गई. नीतीश कुमार के इस मास्टरस्ट्रोक का असर पासवान पर दिखा और 2009 के लोकसभा चुनाव में वह खुद चुनाव हार गए. इसके बाद 2014 में पासवान एनडीए में आ गए और नीतीश कुमार एनडीए से बाहर चले गए. हालांकि, 2018 में एक बार फिर नीतीश और राम विलास पासवान में सुलह हो गई. इसके बाद पासवान जाति को भी महादलित वर्ग में शामिल कर दिया गया.

इन पांच जिलों में सहानुभूति फैक्टर कर सकता है काम

अब राम विलास पासवान के निधन से 5 जिले ऐसे हैं, जहां सहानुभूति फैक्टर काम कर सकता है. नालंदा, जमुई, समस्तीपुर, वैशाली और खगड़िया में महादलितों का दबदबा है. इसके अलावा इस इलाके के अगड़ी जाति के लोग भी पासवान को नापसंद नहीं करते हैं.

यह भी पढ़ें: 'छोटे सरकार' के पास है 22 लाख कैश, 15 साल में 2 हजार गुना बढ़ी संपत्ति, पत्नी से 'गरीब' हैं अनंत सिंह

नालंदा में बिगड़ सकता है नीतीश कुमार का खेल
बात करें नालंदा की तो ये नीतीश कुमार का गृह जिला है. इस लोकसभा क्षेत्र में 7 विधानसभा सीटें हैं. नालांदा में महादलितों की आबादी साढ़े 4 लाख के करीब है. हालांकि, यहां कि 7 में से 6 विधानसभा सीटें जेडीयू के पास हैं, जबकि राजगीर सुरक्षित सीट है. चिराग ने इन सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है. ऐसे में यहां नीतीश कुमार का खेल बिगड़ सकता है.

जमुई में चिराग की पकड़
वहीं, जमुई लोकसभा क्षेत्र भी सुरक्षित सीट है. चिराग पासवान सांसद हैं. इस लोकसभा क्षेत्र में 6 विधनासभा क्षेत्र हैं, जिसमें 4 जमुई जिले में है. जमुई जिले की 2 सीटें जेडीयू के खाते में गईं हैं. झाझा और चकाई. इस बार चिराग ने इन दोनों ही सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं. झाझा से रविंद्र यादव को टिकट दिया है और चकाई से संजय कुमार मंडल को टिकट दिया है. दलित वोटों के साथ-साथ चिराग ने यहां अतिपिछड़ी जातियों के वोट में भी सेंधमारी की कोशिश की है. कहा जा रहा है कि यहां सहानुभूति फैक्टर काम करेगा, जिसका सीधा असर जेडीयू पर पड़ सकता है.

समस्तीपुर में हो सकता है जदयू को नुकसान
समस्तीपुर लोकसभा क्षेत्र में महादलित वोटरों की संख्या करीब साढ़े तीन लाख है. यहां से राम विलास पासवान के भतीजे प्रिंस राज सांसद हैं. इस लोकसभा क्षेत्र में 6 विधानसभा सीटें आती हैं. छह में कल्याणपुर और रोसड़ा सुरक्षित सीटें हैं. इन दोनों सीटों पर महादलित वोट काफी मायने रखते हैं. पिछली बार कल्याणपुर जेडीयू के खाते में चली गई थी. इस बार एलजेपी ने यहां भी उम्मीदवार उतारने की घोषणा कर दी है. ऐसे में जेडीयू को नुकसान तय है. वहीं, रोसड़ा बीजेपी के खाते में है, जिसके खिलाफ एलजेपी ने कोई उम्मीदवार नहीं उतारा है.

खगड़िया में दलित वोटर तय करेंगे जीत और हार
खगड़िया लोकसभा सीट पर भी एलजेपी का कब्जा है. ये इसलिए भी खास है क्योंकि राम विलास पासवान ने खगड़िया के अलौली सीट से ही राजनीतिक करियर की शुरुआत की थी. पहली बार वह इसी सीट से विधायक बने थे. यहां दलित वोटर करीब 4 लाख हैं. इस विधानसभा क्षेत्र में 6 विधानसभा सीटें हैं, जिसमें सिमरी बख्तियारपुर, हसनपुर, अलौली, खगड़िया, बेलदौर और परबत्ता हैं. अलौली सुरक्षित सीट है, जहां से जेडीयू ने उम्मीदवार दिया है. ऐसे में एलजेपी ने भी इस सीट से उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है. अगर यहां सहानुभूति फैक्टर काम करता है तो इसका सीधा नुकसान जेडीयू को होगा.

यह भी पढ़ें: पासवान के निधन के बाद गोयल को मिला उनके मंत्रालय का जिम्मा

हाजीपुर में साढ़े तीन लाख से ज्यादा दलित वोटर
हाजीपुर संसदीय क्षेत्र से राम विलास पासवान खुद चुनाव लड़ते रहे हैं. हाजीपुर में भी करीब साढ़े तीन लाख से ज्यादा दलित वोटरों की संख्या है. इस संसदीय क्षेत्र में 7 विधानसभा सीटें हैं. जिसमें हाजीपुर, महुआ, राजापाकर, जंदाहा, महनार, पातेपुर और राघोपुर विधानसभा क्षेत्र आती हैं. राजापाकर सुरक्षित सीट है और यह जेडीयू के खाते में है. इस सीट पर एलजेपी ने उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है. ऐसे में यहां भी जेडीयू को नुकसान की संभावना है, साथ ही दूसरे सीटों पर भी दलित वोटरों का असर है.

राम विलास पासवान पर कोई नहीं करेगा सीधा हमला
राम विलास पासवान के निधन के बाद अब ऐसी स्थिति बन गई है कि कोई भी विरोधी दल सीधे तौर पर रामविलास पासवान का नाम नहीं ले सकता है. चिराग पासवान भी इस चुनाव में सहानुभूति कार्ड खेलने की कोशिश करेंगे. संभव है कि नीतीश कुमार भी सीधे वार करने से बचते रहेंगे. ऐसे में इसका फायदा चिराग को मिल सकता है. इस चुनाव में 42 में से 18 सीटों पर चिराग ने अगड़ी जाति के लोगों को उम्मीदवार बनाया है. ऐसे में माना जा रहा है कि उन्होंने दलितों के साथ-साथ अगड़ी जाति के लोगों को भी लुभाने की कोशिश की है.

पटना : बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले चिराग पासवान ने बिहार में एनडीए से नाता तोड़ लिया. वहीं, चिराग पासवान ने यह भी साफ कर दिया कि वह जेडीयू के हर प्रत्याशी के खिलाफ उम्मीदवार उतारेंगे. इसी बीच केंद्रीय मंत्री और चिराग के पिता राम विलास पासवान का निधन हो गया. चुनावी सरगर्मी के बीच पासवान के निधन से लोगों के बीच सहानुभूति की लहर उठ सकती है और उससे कई सीटों पर सियासी समीकरण बदल सकते हैं. कयास लगाए जा रहे हैं कि इससे सबसे ज्यादा नुकसान जेडीयू को हो सकता है.

लोगों के बीच सहानुभूति की लहर
बिहार के पांच जिलों में दलित वोटर एक बड़ा फैक्टर है. इन जिलों में राम विलास पासवान के निधन के बाद लोगों के बीच सहानुभूति की लहर है. माना जा रहा है कि इसका सीधा फायदा एलजेपी को हो सकता है.

ये भी पढ़ें: बिहार के इन सीटों पर रहेगी सबकी नजर, कई पर है सीधा मुकाबला

दलित और महादलित वोटरों की आबादी करीब 16 फीसदी
अगर पूरे बिहार के परिपेक्ष्य में बात करें तो दलित वोटरों का रुख किसी भी पार्टी की हार जीत तय कर सकता है. बिहार में दलित और महादलित वोटरों की आबादी करीब 16 फीसदी है. 2005 के विधानसभा चुनाव में एलजेपी ने नीतीश का साथ नहीं दिया था. इससे नाराज नीतीश कुमार ने दलित वोटों में सेंधमारी के लिए बड़ा दांव चलते हुए 22 में से 21 दलित जातियों को महादलित घोषित कर दिया और इसमें उन्होंने पासवान जाति को शामिल नहीं किया. जिसके बाद बिहार में महादलितों की आबादी करीब 10 फीसदी हो गई, जबकि पासवान वोटरों की संख्या करीब 4.5 फीसदी रह गई. नीतीश कुमार के इस मास्टरस्ट्रोक का असर पासवान पर दिखा और 2009 के लोकसभा चुनाव में वह खुद चुनाव हार गए. इसके बाद 2014 में पासवान एनडीए में आ गए और नीतीश कुमार एनडीए से बाहर चले गए. हालांकि, 2018 में एक बार फिर नीतीश और राम विलास पासवान में सुलह हो गई. इसके बाद पासवान जाति को भी महादलित वर्ग में शामिल कर दिया गया.

इन पांच जिलों में सहानुभूति फैक्टर कर सकता है काम

अब राम विलास पासवान के निधन से 5 जिले ऐसे हैं, जहां सहानुभूति फैक्टर काम कर सकता है. नालंदा, जमुई, समस्तीपुर, वैशाली और खगड़िया में महादलितों का दबदबा है. इसके अलावा इस इलाके के अगड़ी जाति के लोग भी पासवान को नापसंद नहीं करते हैं.

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नालंदा में बिगड़ सकता है नीतीश कुमार का खेल
बात करें नालंदा की तो ये नीतीश कुमार का गृह जिला है. इस लोकसभा क्षेत्र में 7 विधानसभा सीटें हैं. नालांदा में महादलितों की आबादी साढ़े 4 लाख के करीब है. हालांकि, यहां कि 7 में से 6 विधानसभा सीटें जेडीयू के पास हैं, जबकि राजगीर सुरक्षित सीट है. चिराग ने इन सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है. ऐसे में यहां नीतीश कुमार का खेल बिगड़ सकता है.

जमुई में चिराग की पकड़
वहीं, जमुई लोकसभा क्षेत्र भी सुरक्षित सीट है. चिराग पासवान सांसद हैं. इस लोकसभा क्षेत्र में 6 विधनासभा क्षेत्र हैं, जिसमें 4 जमुई जिले में है. जमुई जिले की 2 सीटें जेडीयू के खाते में गईं हैं. झाझा और चकाई. इस बार चिराग ने इन दोनों ही सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं. झाझा से रविंद्र यादव को टिकट दिया है और चकाई से संजय कुमार मंडल को टिकट दिया है. दलित वोटों के साथ-साथ चिराग ने यहां अतिपिछड़ी जातियों के वोट में भी सेंधमारी की कोशिश की है. कहा जा रहा है कि यहां सहानुभूति फैक्टर काम करेगा, जिसका सीधा असर जेडीयू पर पड़ सकता है.

समस्तीपुर में हो सकता है जदयू को नुकसान
समस्तीपुर लोकसभा क्षेत्र में महादलित वोटरों की संख्या करीब साढ़े तीन लाख है. यहां से राम विलास पासवान के भतीजे प्रिंस राज सांसद हैं. इस लोकसभा क्षेत्र में 6 विधानसभा सीटें आती हैं. छह में कल्याणपुर और रोसड़ा सुरक्षित सीटें हैं. इन दोनों सीटों पर महादलित वोट काफी मायने रखते हैं. पिछली बार कल्याणपुर जेडीयू के खाते में चली गई थी. इस बार एलजेपी ने यहां भी उम्मीदवार उतारने की घोषणा कर दी है. ऐसे में जेडीयू को नुकसान तय है. वहीं, रोसड़ा बीजेपी के खाते में है, जिसके खिलाफ एलजेपी ने कोई उम्मीदवार नहीं उतारा है.

खगड़िया में दलित वोटर तय करेंगे जीत और हार
खगड़िया लोकसभा सीट पर भी एलजेपी का कब्जा है. ये इसलिए भी खास है क्योंकि राम विलास पासवान ने खगड़िया के अलौली सीट से ही राजनीतिक करियर की शुरुआत की थी. पहली बार वह इसी सीट से विधायक बने थे. यहां दलित वोटर करीब 4 लाख हैं. इस विधानसभा क्षेत्र में 6 विधानसभा सीटें हैं, जिसमें सिमरी बख्तियारपुर, हसनपुर, अलौली, खगड़िया, बेलदौर और परबत्ता हैं. अलौली सुरक्षित सीट है, जहां से जेडीयू ने उम्मीदवार दिया है. ऐसे में एलजेपी ने भी इस सीट से उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है. अगर यहां सहानुभूति फैक्टर काम करता है तो इसका सीधा नुकसान जेडीयू को होगा.

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हाजीपुर में साढ़े तीन लाख से ज्यादा दलित वोटर
हाजीपुर संसदीय क्षेत्र से राम विलास पासवान खुद चुनाव लड़ते रहे हैं. हाजीपुर में भी करीब साढ़े तीन लाख से ज्यादा दलित वोटरों की संख्या है. इस संसदीय क्षेत्र में 7 विधानसभा सीटें हैं. जिसमें हाजीपुर, महुआ, राजापाकर, जंदाहा, महनार, पातेपुर और राघोपुर विधानसभा क्षेत्र आती हैं. राजापाकर सुरक्षित सीट है और यह जेडीयू के खाते में है. इस सीट पर एलजेपी ने उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है. ऐसे में यहां भी जेडीयू को नुकसान की संभावना है, साथ ही दूसरे सीटों पर भी दलित वोटरों का असर है.

राम विलास पासवान पर कोई नहीं करेगा सीधा हमला
राम विलास पासवान के निधन के बाद अब ऐसी स्थिति बन गई है कि कोई भी विरोधी दल सीधे तौर पर रामविलास पासवान का नाम नहीं ले सकता है. चिराग पासवान भी इस चुनाव में सहानुभूति कार्ड खेलने की कोशिश करेंगे. संभव है कि नीतीश कुमार भी सीधे वार करने से बचते रहेंगे. ऐसे में इसका फायदा चिराग को मिल सकता है. इस चुनाव में 42 में से 18 सीटों पर चिराग ने अगड़ी जाति के लोगों को उम्मीदवार बनाया है. ऐसे में माना जा रहा है कि उन्होंने दलितों के साथ-साथ अगड़ी जाति के लोगों को भी लुभाने की कोशिश की है.

Last Updated : Oct 9, 2020, 9:33 PM IST
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