जयपुर: यूनेस्को हर साल 19 से 25 नवंबर के बीच विश्व विरासत सप्ताह मनाता है. इस साल यूनेस्को ने इस सप्ताह को 'विविधता की खोज और अनुभव' की थीम दी है. इस खास मौके पर इतिहासकार जितेंद्र सिंह शेखावत के जरिए हम जानेंगे जयपुर में वर्ल्ड हेरिटेज साइट परकोटा और जंतर-मंतर के बारे में....
जयपुर को लेकर तारीफ में कई पंक्तियां लिखी गई हैं. किसी ने कहा है कि जलसे, जज्बात और जवाहरात का शहर जयपुर. सवाई जयसिंह के सपने से जन्मा शहर जयपुर. जयपुर को लेकर यह भी कहा जाता है कि जगत में आए और जयपुर नहीं देखा तो क्या देखा. गुलाबी शहर के नाम से पहचाने जाने वाले इस नगर को लेकर दुनिया भर में शोहरत भरे कई किस्से मशहूर हैं. यहां का आमेर किला विश्व विरासत का हिस्सा है, तो जंतर-मंतर और शहर की दीवार यानी परकोटा भी यूनेस्को ने धरोहर की सूची में शामिल किया है.
वहीं, जयपुर के जंतर-मंतर का जिक्र करते हुए इतिहासकार जितेंद्र सिंह कहते हैं कि खगोल शास्त्र का पूरा अध्ययन जंतर-मंतर में निहित है. सवाई जयसिंह जो एक खगोल वैज्ञानिक भी थे. उन्होंने इसका निर्माण करवाया था. जवाहरलाल नेहरू ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक भारत : एक खोज में इसका जिक्र किया है. सवाई जयसिंह ने जंतर-मंतर के निर्माण से पहले विश्व के कई देशों में अपने सांस्कृतिक दूत भेज कर वहां से खगोल-विज्ञान के प्राचीन और महत्वपूर्ण ग्रंथों की पांडुलिपियां मंगवाईं थीं और उन्हें अपने पोथीखाने में संरक्षित किया और अनुवाद भी करवाया था. इसी के आधार पर कोण और ज्यामितीय का ध्यान रखकर जंतर-मंतर का निर्माण किया गया. जितेंद्र सिंह के अनुसार जंतर-मंतर वाले स्थान पर पहले तोप बनाने का कारखाना था और इसके बाद एक टकसाल भी बनाई गई थी.
खगोल शास्त्र और विज्ञान का तालमेल जंतर-मंतर : महाराजा जय सिंह द्वितीय ने पूरे भारत में पांच जगह वेधशाला यानी जंतर-मंतर बनवाई थी. जयपुर, दिल्ली, काशी, उज्जैन और मथुरा में इनका निर्माण हुआ था. साल 1725 में दिल्ली में और 1734 में जयपुर में जंतर-मंतर वेधशाला का निर्माण किया गया था. इन पांच वेधशालाओं में से आज जयपुर और दिल्ली की वेधशाला ही है, जो सही स्थिति में है. जयपुर की वेधशाला में 14 प्रमुख यन्त्र हैं, जो समय मापने, ग्रहण की भविष्यवाणी करने, किसी तारे की गति और स्थिति जानने के अलावा सौर मण्डल के ग्रहों के स्थिति जानने आदि में सहायक हैं. देश की सभी पांच वेधशालाओं में जयपुर की वेधशाला सबसे बड़ी है. यहां के यंत्रों में एक विशाल सूर्यघड़ी 'सम्राट-यन्त्र' है, जो धरती से करीब 105 फीट सर्वाधिक ऊंचा है. जिसके माध्यम से सूर्य की चाल के आधार पर समय बताया जा सकता है. इस वजह से इस धूप घड़ी भी कहा जाता है. इसके अलावा 'जयप्रकाश-यन्त्र' और 'राम-यन्त्र' ज्यादा मशहूर हैं.
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ऐतिहासिक परकोटा भी है विश्व विरासत : जुलाई 2019 में जयपुर के चारदीवारी शहर को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा दिया गया. इतिहासकार जितेंद्र सिंह शेखावत कहते हैं कि जयपुर का परकोटा बनावट के लिहाज से काफी अद्भुत है. जिस तरह से ब्रह्मांड में नौ ग्रह हैं, उसी गणना के आधार पर इस परकोटे को 9 वर्ग मील में तैयार किया गया. उन्होंने बताया कि 1727 में जयपुर बसाने के साथ ही शहर की जनता को सुरक्षित रखने के लिहाज से इसका निर्माण किया गया था. इसकी ऊंचाई करीब 20 फीट है, तो चौड़ाई कहीं से 9 फीट, तो कुछ जगह पर 11 फीट तक है. उन्होंने बताया कि घुड़सवार सैनिक हमेशा परकोटे के ऊपर पहरेदारी किया करते थे. इसी तरह से कुछ अंतराल पर पराकोट पर बुर्ज बनाई गई थी, जिनमें सुरक्षा के लिहाज से तोप तैनात रखी जाती थी.
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सूर्य के रथ की परिकल्पना के आधार पर दरवाजे : पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य को रथ पर सवार माना जाता है, जिसमें सात घोड़े होते हैं. उसी तर्ज पर जयपुर शहर के परकोटे में सात दरवाजे बनाए गए हैं. इनमें पश्चिम में चांदपोल, फिर कृष्ण पोल या किशन पोल, जिसे वर्तमान में अजमेरी गेट कहा जाता है, उसके आगे सांगानेरी गेट, जिसे रामपोल कहते थे, चौथा घाट गेट, जिसका नाम शिवपोल है. पांचवा सूरजपोल , छटवां गंगापोल और सातवां ध्रूव पोल, जिसका वर्तमान नाम जोरावर सिंह दरवाजा है. वर्तमान में अजमेरी गेट और सांगानेरी गेट के बीच एक नया रास्ता बनाया गया है, जो चौड़ा रास्ता की ओर रामनिवास बाग के सामने से खुलता है. इसे न्यू गेट कहते हैं. शेखावत के अनुसार एक वक्त था जब परकोटे में सभी दरवाजे समय के अनुसार खोले जाते थे और सुरक्षा के लिहाज से रात में बंद कर दिए जाते थे.
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वक्त के साथ बदलती रही परकोटे की दशा : जयपुर शहर का यह परकोटा 1727 में महाराजा सवाई जयसिंह की ओर से बसाए गए शहर का सुरक्षा कवच था. दो दशक पहले तक यह सफेद रंग का था, जिसे महाराजा सवाई राम सिंह द्वितीय ने गेरुआ या गुलाबी रंग दिया था. उन्होंने ही इस वाल के कंगूरों पर चित्रकारी करवाई थी. जितेंद्र सिंह शेखावत कहते हैं कि एक वक्त था जब इस दीवार में किसी को कील तक लगाने की इजाजत नहीं थी, लेकिन आज यह पर कोटा अतिक्रमण के कारण अपने दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है.
जितेंद्र सिंह शेखावत ने बताया कि घाट गेट की बुर्ज पर सेना की छावनी रहा करती थी. इस जगह तोप भी तैनात होती थी, मराठों के साथ प्रसिद्ध युद्ध यही हुआ था, जिसके बाद जयपुर की सेना ने मराठी सेना को बगरू तक खदेड़ दिया था. इसी तरह से चांदपोल दरवाजे के पास दरबार स्कूल वाली जगह पर भी एक छावनी हुआ करती थी.