इंदौर: मध्य प्रदेश के विभिन्न इलाकों से गांधी जी की यादें जुड़ी हुई है. वहीं इंदौर में उनकी विरासत की अनूठी धरोहर है. मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति जहां से बापू ने पूरे देश को भाषा के आधार पर एक सूत्र में बांधने का आंदोलन चलाया था.
हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का हुआ था आह्वान
इंदौर के रविंद्र नाट्य गृह मार्ग पर स्थित हिंदी साहित्य समिति की स्थापना 1910 में महात्मा गांधी की प्रेरणा से हुई थी. महात्मा गांधी ने समिति के इंदौर परिसर से ही सबसे पहले हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का आह्वान किया था. महात्मा गांधी की इसी धरोहर की बदौलत यहां आयोजित हिंदी साहित्य सम्मेलन में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के फैसले के साथ हिंदी प्रचार सभा की स्थापना हुई. इंदौर से ही धन संग्रह के बाद वर्धा में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की स्थापना की जा सकी. वहीं 1935 में इंदौर में ही दूसरी बार हिंदी साहित्य सम्मेलन का आयोजन हुआ. जिसकी अध्यक्षता खुद गांधी जी ने की थी.
शोधार्थी यहां करते है शोध
दूसरे हिंदी साहित्य सम्मेलन में महात्मा गांधी ने इस भवन का अनावरण भी किया था. फिलहाल, यहां महात्मा गांधी की धरोहर के रूप में भव्य इमारत के अलावा हिंदी साहित्य से जुड़ी करीब 25000 पुस्तकों का पुस्तकालय है, जो आज भी हिंदी साहित्य के ज्ञान विज्ञान का केंद्र है. फिलहाल, यहां उच्च स्तरीय शोध कार्यों को बढ़ावा देने के लिए शोध केंद्र की स्थापना की गई है. जहां कई शोधार्थी शोध और अध्ययन के लिए आते हैं.
महात्मा गांधी ने इस भवन का किया था अनावरण
इस केंद्र की स्थापना से लेकर हिंदी मातृभाषा को लेकर चलाए गए महात्मा गांधी के आंदोलन के बारे में हिंदी साहित्य समिति के प्रमुख अरविंद जावड़ेकर बताते हैं कि "यह एकमात्र इमारत है. जिसकी भूमि पूजन के बाद भवन का अनावरण खुद महात्मा गांधी ने किया है. आज भी हिंदी साहित्य समिति का भवन अपने प्राचीन भव्य स्वरूप में मौजूद है. जहां हिंदी के प्रचार प्रसार से संबंधित गतिविधियां आयोजित होती हैं."
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हिंदी का राष्ट्रभाषा के रूप में हुआ था शुरू प्रचार
हिंदी साहित्य समिति के सदस्य अखिलेश राव बताते हैं कि "हिंदी साहित्य समिति के प्रांगण से ही महात्मा गांधी ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए हिंदी के प्रचार प्रसार के साथ अपने पुत्र देवदास गांधी, हरिहर शर्मा, स्वामी सत्यदेव और ऋषिकेश को अलग-अलग राज्यों में भेजकर हिंदी के प्रचार की घोषणा की थी, जो आज भी यहां बापू के पद चिन्ह और उनके द्वारा किए गए शिलान्यास के शिलालेखों में मौजूद हैं."