टीकम वर्मा, विकासनगर: हनोल स्थित महासू देवता मंदिर की महिमा दूर-दूर तक है. यहां देव दर्शनों के लिए भक्तों का तांता लगा रहता है. उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश समेत अन्य प्रदेशों से भी भक्त शीश नवाने और महासू महाराज के आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं. कहा जाता है कि जो भी भक्त सच्ची श्रद्धा से मंदिर में कामना करता है, उसे महासू महाराज पूरी करते हैं. मंदिर की बेजोड़ वास्तु और स्थापत्य कला अपने आप में खास है, जो बरबस ही लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है. इसके अलावा मंदिर परिसर में एक फुलवारी भी है, जो काफी खास है.
हनोल महासू देवता मंदिर परिसर में है नगरास फूलों की फुलवारी:दरअसल, हनोल महासू देवता मंदिर परिसर में एक फुलवारी है. इसमें नगरास के फूल खिलते हैं. इनका पूजा में बड़ा महत्व है. इस फुलवारी की एक बार खुदाई की जाती है. खुदाई के बाद न कोई बीज बोए जाते हैं ना ही पौधे रोपे जाते हैं. इसके बावजूद नगरास उग आते हैं. पौधे उगने के कुछ समय अवधि के बाद खूबसूरत और सुगंधित फूल खिल आते हैं. इन फूलों का देव पूजा में इस्तेमाल किया जाता है. इस फुलवारी की भी अपनी कहानी है, जो बेहद रोचक और चमत्कारों से भरी है.
लोक मान्यता के अनुसार, सैकड़ों साल पहले हर साल सावन माह की 25 गते की रात को एक जंगली जानवर इस फुलवारी की खुदाई कर देता था. लोग जब सुबह उठते थे तो देव फुलवारी की खुदाई देख हैरान रह जाते थे. देव फुलवारी की खुदाई का सिलसिला कई सालों तक यूं ही चलता रहा. एक दिन तांदूर मुहासों ने इसकी जासूसी की और रात के समय हथियारों से लैस होकर घात लगाकर बैठे. तभी एक जंगली जानवर आया और अपने पंजों से फुलवारी की खुदाई करने लगा. तभी मुहासों ने उस जानवर को मार गिराया.
इसके बाद कई सालों तक देव फुलवारी की खुदाई नहीं हुई और नगरास के फूल नहीं उग पाए. कहा जाता है कि परिणाम स्वरूप देवता का दोष तांदूर मुहासों को झेलना पड़ा. दोषमुक्त होने के लिए तांदूर मुहासों (चातरा गांव के ग्रामीण परिवार) ने महासू देवता की शरण में आकर फरियाद की. कहते हैं कि महासू देवता ने उन्हें सिर्फ एक शर्त पर माफी दी कि जंगली जानवर के बजाय अब तांदूर मुहासे उसी तिथि को फुलवारी की खुदाई करेंगे.
देव फुलवारी की खुदाई करते हैं तांदूर मुहासे:देवता के कहे अनुसार, तांदूर मुहासे दोष से बचने के लिए सावन माह को हर साल 25 गते को अपने घरों से फावडे़-कुदाल लेकर देव फुलवारी की खुदाई करने हनोल मंदिर पहुंचते हैं. जहां राजगुरु के शंखनाद और ढोल बाजे के साथ देव फुलवारी की खुदाई परंपरागत तरीके से की जाती है. खुदाई के बाद नगरास के पौधे फिर से उग आते हैं और मंदिर परिसर को महका देते हैं.