उत्तराखंड

uttarakhand

ETV Bharat / state

उत्तराखंड के इस मंदिर में बिना बोए उगते हैं नगरास के फूल, चमत्कार और रहस्यों से भरी है मान्यता - MAHASU DEVTA TEMPLE HANOL

हनोल में महासू देवता की फुलवारी है खास, बिना बोए उग आते हैं फूल, देव पूजा के लिए नगरास फूल का है विशेष महत्व

Hanol Mahasu Devta Temple Nagaras Flowers
हनोल महासू देवता मंदिर परिसर में नगरास के फूल (फोटो सोर्स- Chandram Rajguru)

By ETV Bharat Uttarakhand Team

Published : Feb 26, 2025, 4:06 PM IST

Updated : Feb 26, 2025, 4:32 PM IST

टीकम वर्मा, विकासनगर: हनोल स्थित महासू देवता मंदिर की महिमा दूर-दूर तक है. यहां देव दर्शनों के लिए भक्तों का तांता लगा रहता है. उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश समेत अन्य प्रदेशों से भी भक्त शीश नवाने और महासू महाराज के आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं. कहा जाता है कि जो भी भक्त सच्ची श्रद्धा से मंदिर में कामना करता है, उसे महासू महाराज पूरी करते हैं. मंदिर की बेजोड़ वास्तु और स्थापत्य कला अपने आप में खास है, जो बरबस ही लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है. इसके अलावा मंदिर परिसर में एक फुलवारी भी है, जो काफी खास है.

हनोल महासू देवता मंदिर परिसर में है नगरास फूलों की फुलवारी:दरअसल, हनोल महासू देवता मंदिर परिसर में एक फुलवारी है. इसमें नगरास के फूल खिलते हैं. इनका पूजा में बड़ा महत्व है. इस फुलवारी की एक बार खुदाई की जाती है. खुदाई के बाद न कोई बीज बोए जाते हैं ना ही पौधे रोपे जाते हैं. इसके बावजूद नगरास उग आते हैं. पौधे उगने के कुछ समय अवधि के बाद खूबसूरत और सुगंधित फूल खिल आते हैं. इन फूलों का देव पूजा में इस्तेमाल किया जाता है. इस फुलवारी की भी अपनी कहानी है, जो बेहद रोचक और चमत्कारों से भरी है.

हनोल मंदिर में नगरास के फूल का रहस्य (वीडियो- ETV Bharat)

लोक मान्यता के अनुसार, सैकड़ों साल पहले हर साल सावन माह की 25 गते की रात को एक जंगली जानवर इस फुलवारी की खुदाई कर देता था. लोग जब सुबह उठते थे तो देव फुलवारी की खुदाई देख हैरान रह जाते थे. देव फुलवारी की खुदाई का सिलसिला कई सालों तक यूं ही चलता रहा. एक दिन तांदूर मुहासों ने इसकी जासूसी की और रात के समय हथियारों से लैस होकर घात लगाकर बैठे. तभी एक जंगली जानवर आया और अपने पंजों से फुलवारी की खुदाई करने लगा. तभी मुहासों ने उस जानवर को मार गिराया.

नगरास के फूल (फोटो सोर्स- Chandram Rajguru)

इसके बाद कई सालों तक देव फुलवारी की खुदाई नहीं हुई और नगरास के फूल नहीं उग पाए. कहा जाता है कि परिणाम स्वरूप देवता का दोष तांदूर मुहासों को झेलना पड़ा. दोषमुक्त होने के लिए तांदूर मुहासों (चातरा गांव के ग्रामीण परिवार) ने महासू देवता की शरण में आकर फरियाद की. कहते हैं कि महासू देवता ने उन्हें सिर्फ एक शर्त पर माफी दी कि जंगली जानवर के बजाय अब तांदूर मुहासे उसी तिथि को फुलवारी की खुदाई करेंगे.

देव फुलवारी की खुदाई करते हैं तांदूर मुहासे:देवता के कहे अनुसार, तांदूर मुहासे दोष से बचने के लिए सावन माह को हर साल 25 गते को अपने घरों से फावडे़-कुदाल लेकर देव फुलवारी की खुदाई करने हनोल मंदिर पहुंचते हैं. जहां राजगुरु के शंखनाद और ढोल बाजे के साथ देव फुलवारी की खुदाई परंपरागत तरीके से की जाती है. खुदाई के बाद नगरास के पौधे फिर से उग आते हैं और मंदिर परिसर को महका देते हैं.

ईटीवी भारत पर चंदराम राजगुरु ने दी खास जानकारी:हनोल महासू देवता मंदिर के राजगुरु व मंदिर समिति के सदस्य चंदराम राजगुरु ने ईटीवी भारत को बताया कि महासू देवता मंदिर में जो हरी घास की बगिया है, इसे स्थानीय बोली में 'कुगंवाड' कहा जाता है. इसमें नगरास के फूल उगते हैं. इसकी खुदाई हर साल सावन के 25 गते को मैनुअल तरीके से की जाती है. इसमें चातरा गांव के लोग शामिल होते हैं.

महासू मंदिर में नगरास की फुलवारी की खुदाई (फोटो सोर्स- Chandram Rajguru)

चंदराम राजगुरु बताते हैं कि लोक मान्यता के अनुसार पहले सावन माह के 25 गते को कोई जंगली जानवर आकर अपने पंजों से इसकी खुदाई कर जाता था. उसके बाद प्राकृतिक रूप से नगरास के फूल उग जाते थे. आज ग्रामीण इसकी खुदाई करते हैं. खास बात ये है कि इसमें कोई भी बीज नहीं बोए या डाले जाते हैं, ना ही कोई पौध लगाई जाती है. खुद ब खुद पौधे उग आते हैं. यह कुदरती शक्ति महासू महाराज की है.

खास हैं नगरास के फूल:नगरास के पौधों पर अक्टूबर से जनवरी के बीच सफेद और हल्के पीले रंग के फूल खिलते हैं. जो सुंदर होने के साथ ही काफी सुगंधित होते हैं. इन फूलों को महासू महाराज की पूजा में शामिल किया जाता है. नगरास के फूल मैंद्रथ के बाशिक महासू देवता मंदिर और देवलाड़ी माता मंदिर, देववन में पौराणिक पवासी महासू देवता मंदिर, कनासर समेत कुल्लू, कश्मीर आदि जगहों पर भी उगते हैं.

पूजा में इस्तेमाल होते हैं फूल (फोटो सोर्स- Chandram Rajguru)

महासू देवता एक नहीं चार देवताओं का है सामूहिक नाम:असल में महासू एक देवता नहीं, बल्कि 4 देवताओं का सामूहिक नाम है. जो चार भाई हैं. स्थानीय भाषा में महासू शब्द का अर्थ भगवान शिव/भोलेनाथ से है. चारों महासू भाइयों में बाशिक महासू (मैंद्रथ), पवासी महासू (ठडियार), बूठिया या बौठा महासू (हनोल) और चालदा महासू (दसऊ) हैं. चालदा महासू चलायमान देवता हैं. वर्तमान में चकराता के दसऊ गांव के नव निर्मित मंदिर में विराजमान हैं. ये सभी भगवान शिव के ही रूप माने जाते हैं.

इनमें बाशिक महासू महाराज बड़े हैं. बौठा महासू दूसरे तो पवासी महासू तीसरे और चालदा महासू महाराज चौथे नंबर पर हैं. महासू महाराज की पालकी को लोग पूजा-अर्चना के लिए नियमित अंतराल पर एक जगह से दूसरी जगह प्रवास पर ले जाते हैं. हनोल में बौठा महासू देवता का भव्य मंदिर है. यहां चातरा गांव के लोग पुजारी हैं. महासू देवता के मंदिर जौनसार बावर, बंगाण से लेकर हिमाचल में भी हैं.

ये भी पढ़ें-

Last Updated : Feb 26, 2025, 4:32 PM IST

ABOUT THE AUTHOR

...view details