भोपाल। अगर चार मिनिट तीस सेकण्ड की फिल्म आप पर इतना असर डाले कि आप अपने आस पास की दुनिया में कटते जंगल और बढ़ते कचरे पर गौर कर सकें. आपकी सोच बदल जाए, तो क्या इसे पर्यावरण बचाने के संघर्ष में मजबूत कदम नहीं कहा जाएगा. स्टोरी टेलिंग के मजबूत कम्यूनिकेशन मीडियम के जरिए भारत में यूएस काउंसलेट जनरल के सहयोग से ये प्रयास हुआ है. चार से पांच मिनिट की ऐसी फिल्में भारत के अलग-अलग हिस्सों से तैयार की गई हैं. जिसमें बिगड़ते पर्यावरण पर चिंता से ज्यादा उन नायकों को शोकेस किया गया है. जो अपने हाथ बिगड़ते पर्यावरण की संभाल में अपना हाथ जगन्नाथ किए हुए हैं. खास बात ये है कि इनमें से ज्यादातर फिल्में स्टूडेंट्स ने बनाई है.
हर फिल्म का संदेश, बचा लो जंगल पानी
यूएस काउंसलेट के सहयोग से आयोजित हुए इस फिल्म फेस्टिवल में सात फिल्में दिखाई गई. ये फिल्में अलग-अलग कैटेगरी में बेस्ट फिल्म के साथ सेकण्ड और फर्स्ट रनर अप दिया गया. इनमें टेल ऑफ सेल फिल्म में सेल की पूरी कहानी है, तो उत्तराखंड की महिलाएं भी फिल्म का सब्जेक्ट बनी हैं. जो पहाड़ों के जंगल की आग बुझाने जुट जाती हैं. इनडीजिनियस सीड कीपर फिल्म में नार्थ ईस्ट में खेती के पारंपरिक ढंग को बचाने के साथ बीजों को बचा ले जाने की कहानी है. इस फिल्म फेस्टिवल में यूएस काउंसलेट जनरल ने भी भागीदारी की.
काउंसलेट की अधिकारी ब्रम्डा सोया कहती हैं, 'पूरी दुनिया ही इस संकट से जूझ रही है. भारत में पर्यावरण संरक्षण को बचाने के प्रयास हो इसकी महती आवश्यकता है. इन फिल्मों को देखकर लगता है कि किस तरह भारत में अलग-अलग नायक हैं. जो जंगल पानी और धरती को बचाने में जुटे हुए हैं. काउंसलेट जनरल की ही अधिकारी अलमित्रा के मुताबिक स्टोरी टेलिंग एक ऐसा माध्यम है कि जिसके जरिए बहुत आसानी से अपनी बात पहुंचाई जा सकती है. फिल्मों के जरिए ये मैसेज बहुत मजबूती के साथ पहुंचाया गया है.