आर्कटिक महासागर के तल पर शोध में जुटे 17 देशों के वैज्ञानिक, समूह में एक भारतीय भी शामिल - Research in Arctic Ocean - RESEARCH IN ARCTIC OCEAN
आर्कटिक क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के बारे में जानने के लिए लंबे समय से शोध चल रहे हैं. मौजूदा समय में चल रहे एक शोध में 17 देशों के वैज्ञानिक शामिल हैं, जिनमें से एक वैज्ञानिक भारत के केरल राज्य से हैं. यह केरल के कासरगोड के रहने वाले हैं और इनका नाम डॉ. एवी सिजिन कुमार है.
डॉ. एवी सिजिन कुमार (फोटो- ETV Bharat Kerala Desk)
कासरगोड: आर्कटिक क्षेत्र में हो रहे जलवायु परिवर्तन के बारे में जानने के लिए वैज्ञानिक जगत हमेशा शोध करते रहते हैं. आर्कटिक क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन और वैश्विक स्तर पर इसके पर्यावरणीय प्रभावों के बारे में बहुत सारे शोध चल रहे हैं. आर्कटिक क्षेत्र में हो रहे परिवर्तनों का अध्ययन करने के लिए 17 देशों के वैज्ञानिक इस तरह के मिशन में शामिल हैं.
भारत का प्रतिनिधित्व एक मलयाली कर रहे हैं. कासरगोड के मूल निवासी डॉ. एवी सिजिन कुमार, जो केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय, कासरगोड में भूविज्ञान विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं, उनको इस मिशन के लिए चुना गया था. अंतर्राष्ट्रीय महासागर खोज कार्यक्रम के हिस्से के रूप में सिजिन आर्कटिक महासागर में एक शोध अभियान कर रहे हैं.
उन्हें राष्ट्रीय ध्रुवीय और महासागर अनुसंधान केंद्र (एनसीपीओआर), गोवा द्वारा शोध परियोजना के लिए चुना गया था. डॉ एवी सिजिन कुमार ने ईटीवी भारत से बात करते हुए बताया कि इसका उद्देश्य क्षेत्र में पिछले जलवायु परिवर्तनों का अध्ययन करना है, जिसमें आर्कटिक बर्फ की चादरों का विकास और पिघलना भी शामिल है.
अंतरराष्ट्रीय समुद्र विज्ञान अन्वेषण कार्यक्रम (आईओडीपी) के तहत आर्कटिक महासागर तल पर मिट्टी और चट्टानों की खुदाई शुरू हो गई है, जिससे वैज्ञानिक जगत को नई जानकारी मिल रही है. नेशनल साइंस फाउंडेशन द्वारा प्रायोजित परियोजना के तहत अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान और चीन जैसे 17 देशों के वैज्ञानिक उत्तरी ध्रुव पर पहुंच चुके हैं.
उन्होंने जून के पहले सप्ताह से खुदाई शुरू कर दी है. इस तरह से एकत्र किए गए नमूनों से चट्टान की संरचना का मूल्यांकन किया जाएगा और जीवाश्मों की उपस्थिति की जांच की जाएगी. इससे यह पता लगाया जाएगा कि सात लाख साल पहले आर्कटिक में जलवायु कैसी थी और समय के साथ इसमें क्या बदलाव आया है.
उत्तरी अटलांटिक महासागर से आने वाली गर्म धारा की ताकत और कमजोरी का अध्ययन किया जाएगा. फिलहाल वैज्ञानिक नमूने एकत्र करने के लिए समुद्र के नीचे 600-700 मीटर तक ड्रिलिंग कर रहे हैं. बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक में लंबे समय से बर्फ की कमी हो रही है. गर्मियों में पिघलने वाली बर्फ का एक बड़ा हिस्सा सर्दियों में वापस नहीं बनता.
इसके साथ ही आर्कटिक में बर्फ की मात्रा को संतुलित करने के लिए इस्तेमाल होने वाली सर्दियों की बर्फ का निर्माण भी गड़बड़ा गया है. ऐसे में यह नया अध्ययन बहुत प्रासंगिक है. विज्ञान जगत उत्तरी ध्रुव में बर्फ की चादरों, उनकी उत्पत्ति और उनके बनने के तरीके के बारे में बहुत सारे सवालों के जवाब तलाश रहा है. लाखों साल पहले जलवायु कैसी थी? क्या बदल गया है?
उम्मीद है कि इस शोध के ज़रिए ये सब पता चल जाएगा. डॉ. सिजिन कुमार अपना अन्वेषण पूरा करने के बाद 5 अगस्त को एम्सटर्डम लौटेंगे. छह महीने बाद, जर्मनी के ब्रेमेन में कोर लैब से उत्खनन के नमूने आगे के अध्ययन के लिए केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग के तहत पैलियो-3 अनुसंधान प्रयोगशाला में ले जाए जाएंगे.
सिजिन कुमार ने कहा कि 'यह भी खास बात है कि हमारे पास दुनिया का सबसे बड़ा महासागर अन्वेषण जहाज है. 1968 में कमीशन किया गया जोइड्स रेज़ोल्यूशन वर्तमान में आर्कटिक में है. यह एक ऐसा जहाज है जो समुद्र तल पर खनन करने में सक्षम है. यह भी खास बात है कि यह जोइड्स रेज़ोल्यूशन की आखिरी यात्रा है, जिसने कई महासागर अन्वेषण किए हैं.'