देहरादून (नवीन उनियाल): इन दिनों उत्तराखंड के एक आईएफएस अधिकारी चर्चाओं में हैं. वर्तमान में चीफ कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट (CCF) अनुसंधान की जिम्मेदारी देख रहे संजीव चतुर्वेदी के एक प्रति नियुक्ति और मूल्यांकन रिपोर्ट से जुड़े मामले से केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) के दो न्यायाधीशों ने खुद को अलग किया था. इसके साथ ही केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय में भ्रष्टाचार उजागर संबंधित एक मामले पर दिल्ली हाईकोर्ट ने एम्स से संजीव चतुर्वेदी की याचिका पर जवाब मांगा है. बैक टू बैक मामलों को लेकर चतुर्वेदी फिर से सुर्खियों में आ गए हैं.
हालांकि, संजीव को लेकर ऐसा ये पहली बार नहीं हुआ है. 2015 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित होने वाले व्हिसलब्लोवर (भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाला) संजीव चतुर्वेदी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने में अग्रणी रहे हैं. यही नहीं, जब संजीव के बारे में ज्यादा जानकारी जुटाई गई तो उनके बड़े भाई राजीव का नाम भी सामने आया. राजीव भी अपने भाई के साथ कंधे से कंधा मिलाते हुए नजर आते हैं. ये दोनों भाई न केवल अखिल भारतीय सेवा के चर्चित अफसर हैं, बल्कि इनके फैसले अकसर सत्ताधारियों के गले की फांस भी बन जाते हैं.
मूल रूप से उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के रहने वाले चतुर्वेदी ब्रदर्स अबतक कई मामलों को लेकर राजनीतिक गलियारों से लेकर आमजन तक की जुबां पर आ चुके हैं. संजीव चतुर्वेदी उत्तराखंड में बतौर चीफ कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट (CCF) अनुसंधान की जिम्मेदारी देख रहे हैं, जबकि राजीव चतुर्वेदी राजस्थान में चीफ कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट के रूप में तैनात हैं.
कौन हैं राजीव चतुर्वेदी:राजीव चतुर्वेदी ने आईआईटी बीएचयू से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक किया है. वह अपने छोटे भाई संजीव चतुर्वेदी से 3 साल बड़े हैं. राजीव चतुर्वेदी सबसे पहले भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड से जुड़े. इसके बाद उन्होंने यूनियन पब्लिक सर्विस कमिशन (UPSC) में ट्राई किया और सफल भी हुए. साल 2002 में राजीव चतुर्वेदी और संजीव चतुर्वेदी दोनों ने ही भौतिक और रसायन विज्ञान के एक ही वैकल्पिक विषय के साथ सफलता हासिल की.
इन मामलों से चर्चाओं में आए IFS राजीव: मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारतीय वन सेवा में शामिल होने के बाद राजीव चतुर्वेदी को राजस्थान कैडर मिला. उनके ऐसे कुछ खास फैसले भी थे, जिन्होंने न केवल राजीव चतुर्वेदी को एक ईमानदार अधिकारी के रूप में उन्हें पहचान दी, बल्कि उन्हें विवादों में भी ला दिया. राजीव चतुर्वेदी ने राजस्थान सरकार द्वारा किए गए तबादले को केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण में चुनौती दी. जिसमें कहा गया कि 2002 बैच के राजीव चतुर्वेदी का न्यूनतम 2 साल का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही उन्हें हटा दिया गया. साल 2019 में मामले पर सरकार को कोर्ट के समक्ष अपनी गलती माननी पड़ी.
सरकारी भूमि पर निर्माण मामले पर मचा बवाल:इसके अलावा सरिस्का टाइगर रिजर्व में वन और राजस्व भूमि पर होटल बनाने के सनसनीखेज मामले में भी राजीव चतुर्वेदी की अहम भूमिका रही. इस मामले में न केवल बड़े सफेदपेशों का नाम आ रहा था, बल्कि कई बड़े अधिकारी भी इसमे संलिप्त बताए जा रहे थे. दबाव बना तो उच्च स्तरीय कमेटी बनाई गई जिसमें सीसीएफ राजीव चतुर्वेदी शामिल थे. जांच रिपोर्ट में पूरे मामले की कमेटी ने परतें खोल दी, जिस पर काफी राजनीतिक बवाल भी मचा.
फील्ड स्टाफ से मारपीट मामले पर मुखर हुए IFS: इसके अलावा राजीव चतुर्वेदी से जुड़ा बड़ा मामला सत्ताधारी विधायक पर मुकदमे से जुड़ा था. दरअसल आरोप था कि वन विभाग के फील्ड स्टाफ पर उस समय हमला कर दिया गया जब वह अवैध खनन को रोकने के लिए मौके पर पहुंची थी. बात सत्ताधारी दल के विधायक से जुड़ी थी. लिहाजा वन विभाग पर भारी दबाव होना भी लाजमी था. लेकिन इसके बावजूद अपने फील्ड स्टाफ के साथ डटकर खड़े रहे राजीव चतुर्वेदी की अहम भूमिका के कारण विधायक पर गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर दिया गया. विधायक पर यह मुकदमा न्यायालय के माध्यम से करवाया गया था.
छोटे भाई पा चुके हैं रेमन मैग्सेसे पुरस्कार:वहीं आईएफएस राजीव चतुर्वेदी के छोटे भाई आईएफएस संजीव चतुर्वेदी रेमन मैग्सेसे पुरस्कार पा चुके हैं और उनकी चर्चा गाहे बगाहे राजनीतिक गलियारों से लेकर ब्यूरोक्रेसी तक में होती रहती है.