रांची: देश की राजधानी नई दिल्ली, हरियाणा और पंजाब में पराली के धुएं से होने वाला प्रदूषण हर साल सुर्खियों में होता है. पराली की वजह से पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों खराब होता है. आलम ऐसा होता है कि एकड़-एकड़ के खेत जला दिए जाते हैं, जिससे धुआं कई दिनों तक निकलता रहता है. कई वर्षों से इनके निष्पादन पर काम किया जा रहा है.
ऐसे में झारखंड के बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के कृषि अभियंत्रण विभाग के वैज्ञानिकों के एक सफल प्रयोग ने उम्मीद की बड़ी किरण दिखाई है. अब तक एक बड़ी समस्या के रूप में देखे जा रहे धान, गेंहू, मक्का और अन्य अनाजों के अवशेष अब निपटारे की ओर है. इससे प्रदूषण नहीं फैलेगा और पराली के निष्पादन के बाद जो अवशेष बायोचार बचेंगे वह मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढ़ा कर खेतों में हरियाली लाएगा.
BAU का चलंत बायोचार किल्न
बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के कृषि अभियंत्रण विभाग के सहायक प्रबंधक डॉ. उत्तम कुमार की देखरेख में इस मशीन का निर्माण किया गया है. कृषि अभियंत्रण के वैज्ञानिकों ने भारत सरकार की कृषि एवं कृषि आधारित उद्योगों में ऊर्जा से संबंधित अखिल भारतीय अनुसंधान परियोजना के तहत एक उपकरण तैयार किया है. जिसमें पराली या क्रॉप अवशेष को बेहद कम ऑक्सीजन में एक ऐसे उत्पाद में बदल दिया जाता है जो राख से पहले वाला स्टेज (चारकोल जैसे टुकड़े) होता है. यह खेतों में उर्वरा शक्ति को बढ़ाने में बेहद मददगार होता है.
महज 10-15 हजार रुपये में तैयार होता है मशीन
बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के कृषि अभियंत्रण विभाग के सहायक प्रध्यापक डॉ. उत्तम कुमार ने कहा कि हमारे विभाग द्वारा बनाये गए "बीएयू चलंत बायोचार किल्न" को बनाने में 10 से 15 हजार रुपये की लागत आयी है. इसमें पराली के जलाने में बेहद कम यानी सीमित मात्रा में आक्सीजन का इस्तेमाल होता है. ऐसे में पहला तो इस प्रक्रिया में धुआं कम निकलता है और ऑक्सीजन कम होने के कारण यह राख में न बदलकर टुकड़े में रह जाता है.