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8 साल बाद मां को पाकर भर आईं बेटे की आंख, मिलाने का माध्यम बना सोशल मीडिया

मां के लिए पिछले 8 साल से दर-दर भटक रहे बेटे के चेहरे पर उस वक्त खुशी की झलक देखने को मिली, जब सोशल मीडिया के जरिए उसकी मां का पता चल गया.

मिलाने का माध्यम बना सोशल मीडिया
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Published : Nov 26, 2021, 7:28 PM IST

वाराणसीः एक बेटे के चेहरे की खोई हुई मुस्कान वापस लौट आई. वो जिस मां की तलाश में दर-दर भटक रहा था, उसका पता सोशल मीडिया के जरिए चल गया. फिर क्या था मां से मिलने के लिए बेटा बिहार के भोजपुर से वाराणसी के अपना घर आश्रम आया और मां को देख उसकी आंखें भर आईं.

गौरतलब है कि बिहार के भोजपुर जिले की वंदना जिसकी उम्र 48 साल है, वो साल 2013 में मानसिक स्थिति ठीन न होने की वजह से घर से लापता हो गई थी. बेटे के साथ परिवार के सभी सदस्यों ने उन्हें खोजने का बहुत प्रयास किया. लेकिन कहीं कुछ पता नहीं चल सका. जिसके बाद परिजनों ने इसकी पुलिस में भी शिकायत की. लेकिन उन्हें निराशा ही हाथ लगी. थक हार कर उसने मां की तलाश भगवान के भरोसे पर छोड़ दिया और धीरे-धीरे गम को भूलकर अपनी जिंदगी में लौटने लगा.

मां को पाकर भर आईं बेटे की आंख

लेकिन कहते हैं कि भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं. ये कहावत इस परिवार के लिए सच साबित हो गई. एकाएक वंदना के बेटे विशाल को उसके मित्रों ने मां की फोटो व्हाट्सएप पर दिखाया. उसके मित्र ने बताया कि मां वाराणसी के अपनाघर आश्रम में रह रही है, जो साल 2018 से गरीब असहाय लोगों की मदद कर रहा है.

ईटीवी भारत से ऑनलाइन बातचीत में अपनाघर आश्रम के अध्यक्ष डॉक्टर निरंजन कुमार ने बताया कि ये महिला घायल अवस्था में एक साल पहले बाईपास रोड पर घायल अवस्था में मिली थी. जिनको यहां पर लाया गया और इनका ट्रीटमेंट किया गया. उस समय इन्होंने अपना नाम वंदना बताया और बिहार बक्सर भोजपुर की रहने वाली बताया. तब से हम लोग लगातार प्रयास कर रहे थे. सोशल मीडिया के माध्यम से लगातार फोटो शेयर किया जा रहा था. बिहार में रहने वाले और एनजीओ से हम लोग संपर्क में थे. कल उनके परिवार के लोग उनको ले गए. अपना घर आश्रम 2018 से अब तक 168 लोगों को उनके परिवार से मिला चुका है.

इसे भी पढ़ें- बौद्ध सर्किट के केंद्र कुशीनगर अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट से शुरू हुईं उड़ानें, जानें क्या होगा शेड्यूल

वंदना के बेटे ने बताया कि ये हमारी मां लगती हैं. 2013 में नवंबर महीने में घर से यह निकल गई थीं. हम लोगों ने बहुत ज्यादा इनको खोजने का प्रयास किया. जहां सब संभव था कि यहां जा सकती हैं. रिश्तेदारी-नातेदारी आसपास के शहरों में खोजा गया. अपना घर आश्रम में मेरी मां है. इसका पता मुझे मेरे दोस्तों के माध्यम से चला. उन्होंने सोशल मीडिया पर मां का फोटो देखकर मुझे बताया क्योंकि जब बचपन में हम अपने दोस्तों के साथ खेलने जाते थे. तो उन लोगों ने उस समय मेरी मां को देखा था. 8 साल बाद अपनी मां से मिलकर बहुत ही अच्छा लग रहा है अपना घर आश्रम को बहुत-बहुत शुक्रिया.

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वाराणसीः एक बेटे के चेहरे की खोई हुई मुस्कान वापस लौट आई. वो जिस मां की तलाश में दर-दर भटक रहा था, उसका पता सोशल मीडिया के जरिए चल गया. फिर क्या था मां से मिलने के लिए बेटा बिहार के भोजपुर से वाराणसी के अपना घर आश्रम आया और मां को देख उसकी आंखें भर आईं.

गौरतलब है कि बिहार के भोजपुर जिले की वंदना जिसकी उम्र 48 साल है, वो साल 2013 में मानसिक स्थिति ठीन न होने की वजह से घर से लापता हो गई थी. बेटे के साथ परिवार के सभी सदस्यों ने उन्हें खोजने का बहुत प्रयास किया. लेकिन कहीं कुछ पता नहीं चल सका. जिसके बाद परिजनों ने इसकी पुलिस में भी शिकायत की. लेकिन उन्हें निराशा ही हाथ लगी. थक हार कर उसने मां की तलाश भगवान के भरोसे पर छोड़ दिया और धीरे-धीरे गम को भूलकर अपनी जिंदगी में लौटने लगा.

मां को पाकर भर आईं बेटे की आंख

लेकिन कहते हैं कि भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं. ये कहावत इस परिवार के लिए सच साबित हो गई. एकाएक वंदना के बेटे विशाल को उसके मित्रों ने मां की फोटो व्हाट्सएप पर दिखाया. उसके मित्र ने बताया कि मां वाराणसी के अपनाघर आश्रम में रह रही है, जो साल 2018 से गरीब असहाय लोगों की मदद कर रहा है.

ईटीवी भारत से ऑनलाइन बातचीत में अपनाघर आश्रम के अध्यक्ष डॉक्टर निरंजन कुमार ने बताया कि ये महिला घायल अवस्था में एक साल पहले बाईपास रोड पर घायल अवस्था में मिली थी. जिनको यहां पर लाया गया और इनका ट्रीटमेंट किया गया. उस समय इन्होंने अपना नाम वंदना बताया और बिहार बक्सर भोजपुर की रहने वाली बताया. तब से हम लोग लगातार प्रयास कर रहे थे. सोशल मीडिया के माध्यम से लगातार फोटो शेयर किया जा रहा था. बिहार में रहने वाले और एनजीओ से हम लोग संपर्क में थे. कल उनके परिवार के लोग उनको ले गए. अपना घर आश्रम 2018 से अब तक 168 लोगों को उनके परिवार से मिला चुका है.

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वंदना के बेटे ने बताया कि ये हमारी मां लगती हैं. 2013 में नवंबर महीने में घर से यह निकल गई थीं. हम लोगों ने बहुत ज्यादा इनको खोजने का प्रयास किया. जहां सब संभव था कि यहां जा सकती हैं. रिश्तेदारी-नातेदारी आसपास के शहरों में खोजा गया. अपना घर आश्रम में मेरी मां है. इसका पता मुझे मेरे दोस्तों के माध्यम से चला. उन्होंने सोशल मीडिया पर मां का फोटो देखकर मुझे बताया क्योंकि जब बचपन में हम अपने दोस्तों के साथ खेलने जाते थे. तो उन लोगों ने उस समय मेरी मां को देखा था. 8 साल बाद अपनी मां से मिलकर बहुत ही अच्छा लग रहा है अपना घर आश्रम को बहुत-बहुत शुक्रिया.

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