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'अनलॉक' के बावजूद आर्थिक संकट से गुजर रहे कैब ड्राइवर - अनलाॅक में भी आर्थिक संकट से गुजर रहे कैब ड्राइवर

कोरोना संकट का प्रभाव सभी कारोबार पर पड़ा है. छोटे कारोबार बंद हो जाने के कारण सैकड़ों कामगार बेरोजगार हो गए. वहीं उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में अनलाॅक के बाद भी कैब चालकों का रोजगार अभी पटरी पर नहीं आया है, जिस कारण उन्हें आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.

अनलाॅक के बाद भी आर्थिक संकट से गुजर रहे कैब ड्राइवर.
अनलाॅक के बाद भी आर्थिक संकट से गुजर रहे कैब ड्राइवर.
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Published : Sep 28, 2020, 12:41 PM IST

लखनऊ: कोरोना की रोकथाम के लिए देश में लगाए गए लाॅकडाउन के कारण कई छोटी कंपनियां बंद हो गई. सैकड़ों कामगार बेरोजगार हो गए. कोरोना के डर से लोग बाहर आने-जाने से परहेज करने लगे. अनलाॅक के बाद ट्रेन का संचानल केंद्र सरकार ने शुरू कर दिया लेकिन बहुत की आवश्यक होने पर ही लोग आवागमन कर रहे हैं. ऐसे में राजधानी लखनऊ के कैब चालक और प्रीपेड ऑटो चालकों को यात्री नहीं मिल रहे हैं. इस कारण उन्हें आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ रहा है. ईटीवी भारत ने चारबाग रेलवे स्टेशन के बाहर कैब चालक और प्रीपेड ऑटो चालकों से बातचीत की, तो उन्होंने बताया कि पहले की अपेक्षा अब रोजगार सिमट कर आधे से भी कम रह गया है.

'अनलॉक' के बाद भी कैब के पहियों ने नहीं पकड़ी रफ्तार, आर्थिक संकट से जूझ रहे ड्राइवर

कई दिनों तक नहीं मिलती सवारी
रेलवे स्टेशन के बाहर पिछले 30 वर्षों से कैब का संचालन कर रहे कैब चालकों का कहना है कि कभी सोचा नहीं था कि इस तरह की परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा. आलम यह है कि कई-कई दिनों तक रेडियो टैक्सी को यात्री नहीं मिलते हैं. चालकों ने बताया कि आमदनी पूरी तरह से ठप है. ऐसे आर्थिक संकट के कारण घर का खर्च बमुश्किल ही चल पा रहा है. वहीं आरटीओ कार्यालय की ओर से टैक्स जमा करने का नोटिस भी आ रहा है.

रोजगार बंद है लेकिन देना पड़ रहा टैक्स

कैब संचालक एजाज खान ने कहा कि, 35 वर्ष से यहीं पर टैक्सी चला रहा हूं. अनलॉक में अब टैक्सी चलाने की अनुमति तो मिल गई है, लेकिन, यात्री नहीं आ रहे. यहां पर खड़े होने का टैक्स भी देना पड़ता है और पेनल्टी भी. बीच में 2 माह का टैक्स माफ भी हुआ था. एक महीने में 200 रुपये पेनल्टी देनी पड़ती है. अब तक 600 रुपये पेनाल्टी और 4000 रुपये टैक्स दे चुका हूं. ऐसे में रोजगार बंद होने के कारण बहुत ही परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. वहीं वर्ष 1976 से टैक्सी संचालित कर रहे कैब ड्राइवर मोहम्मद सगीर ने कहा कि अभी हालात में कोई बदलाव नहीं हुआ और न ही रोजागर अभी पटरी पर आया है.

10 दिन में एक बार होती है आमदनी
कैब चालक हरिलाल ने कहा कि साल 1980 से गाड़ी चलाने का काम कर रहा हूं. इतनी परेशानी कभी नहीं हुई. अनलाॅक में भी यात्री नहीं मिल रहे हैं, जिस कारण परेशानियां बढ़ गईं हैं. उन्होंने बताया कि 8-10 दिन में बोहनी होती है. अभी स्थिति लॉकडाउन की ही तरह है. कोरोना के कारण लोग डरे हैं और बहुत की कम घर से बाहर निकल रहे हैं. बड़ी मुश्किल से गुजारा हो रहा है.


प्रीपेड ऑटो चालकों की भी हालत खस्ता
प्रीपेड ऑटो चालक हंसराज ने बताया कि वह स्टेशन के बाहर 18 वर्ष से ऑटो चला रहे हैं. अनलॉक के बावजूद भी सवारियां नहीं मिल रही हैं. पहले जैसा हिसाब किताब नहीं रह गया है. ऑटो चालकों की हालत बहुत की खराब है. जिसके पास पैसा है. वह बैंक से निकाल कर बच्चों को किसी तरह खिला पिला रहा है. जिसके पास नहीं है. उसके काफी बुरे हाल है और कोई उससे पूछ भी नहीं रहा कि कैसे काम चल रहा है.

लाॅकडाउन के जैसे अभी भी हैं हालात
प्रीपेड बूथ चलाने वाले असद कहते हैं कि स्थित अभी भी लाॅकडाउन जैसी है. बस थोड़ा सा बदलाव हुआ है. रोजगार पूरी तरह से ठप है. चालकों को बहुत आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है. सभी लोग उम्मीद लगाए बैठे हैं कि, जल्द ही स्थिति पहले जैसे हो जाएगी.

लखनऊ: कोरोना की रोकथाम के लिए देश में लगाए गए लाॅकडाउन के कारण कई छोटी कंपनियां बंद हो गई. सैकड़ों कामगार बेरोजगार हो गए. कोरोना के डर से लोग बाहर आने-जाने से परहेज करने लगे. अनलाॅक के बाद ट्रेन का संचानल केंद्र सरकार ने शुरू कर दिया लेकिन बहुत की आवश्यक होने पर ही लोग आवागमन कर रहे हैं. ऐसे में राजधानी लखनऊ के कैब चालक और प्रीपेड ऑटो चालकों को यात्री नहीं मिल रहे हैं. इस कारण उन्हें आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ रहा है. ईटीवी भारत ने चारबाग रेलवे स्टेशन के बाहर कैब चालक और प्रीपेड ऑटो चालकों से बातचीत की, तो उन्होंने बताया कि पहले की अपेक्षा अब रोजगार सिमट कर आधे से भी कम रह गया है.

'अनलॉक' के बाद भी कैब के पहियों ने नहीं पकड़ी रफ्तार, आर्थिक संकट से जूझ रहे ड्राइवर

कई दिनों तक नहीं मिलती सवारी
रेलवे स्टेशन के बाहर पिछले 30 वर्षों से कैब का संचालन कर रहे कैब चालकों का कहना है कि कभी सोचा नहीं था कि इस तरह की परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा. आलम यह है कि कई-कई दिनों तक रेडियो टैक्सी को यात्री नहीं मिलते हैं. चालकों ने बताया कि आमदनी पूरी तरह से ठप है. ऐसे आर्थिक संकट के कारण घर का खर्च बमुश्किल ही चल पा रहा है. वहीं आरटीओ कार्यालय की ओर से टैक्स जमा करने का नोटिस भी आ रहा है.

रोजगार बंद है लेकिन देना पड़ रहा टैक्स

कैब संचालक एजाज खान ने कहा कि, 35 वर्ष से यहीं पर टैक्सी चला रहा हूं. अनलॉक में अब टैक्सी चलाने की अनुमति तो मिल गई है, लेकिन, यात्री नहीं आ रहे. यहां पर खड़े होने का टैक्स भी देना पड़ता है और पेनल्टी भी. बीच में 2 माह का टैक्स माफ भी हुआ था. एक महीने में 200 रुपये पेनल्टी देनी पड़ती है. अब तक 600 रुपये पेनाल्टी और 4000 रुपये टैक्स दे चुका हूं. ऐसे में रोजगार बंद होने के कारण बहुत ही परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. वहीं वर्ष 1976 से टैक्सी संचालित कर रहे कैब ड्राइवर मोहम्मद सगीर ने कहा कि अभी हालात में कोई बदलाव नहीं हुआ और न ही रोजागर अभी पटरी पर आया है.

10 दिन में एक बार होती है आमदनी
कैब चालक हरिलाल ने कहा कि साल 1980 से गाड़ी चलाने का काम कर रहा हूं. इतनी परेशानी कभी नहीं हुई. अनलाॅक में भी यात्री नहीं मिल रहे हैं, जिस कारण परेशानियां बढ़ गईं हैं. उन्होंने बताया कि 8-10 दिन में बोहनी होती है. अभी स्थिति लॉकडाउन की ही तरह है. कोरोना के कारण लोग डरे हैं और बहुत की कम घर से बाहर निकल रहे हैं. बड़ी मुश्किल से गुजारा हो रहा है.


प्रीपेड ऑटो चालकों की भी हालत खस्ता
प्रीपेड ऑटो चालक हंसराज ने बताया कि वह स्टेशन के बाहर 18 वर्ष से ऑटो चला रहे हैं. अनलॉक के बावजूद भी सवारियां नहीं मिल रही हैं. पहले जैसा हिसाब किताब नहीं रह गया है. ऑटो चालकों की हालत बहुत की खराब है. जिसके पास पैसा है. वह बैंक से निकाल कर बच्चों को किसी तरह खिला पिला रहा है. जिसके पास नहीं है. उसके काफी बुरे हाल है और कोई उससे पूछ भी नहीं रहा कि कैसे काम चल रहा है.

लाॅकडाउन के जैसे अभी भी हैं हालात
प्रीपेड बूथ चलाने वाले असद कहते हैं कि स्थित अभी भी लाॅकडाउन जैसी है. बस थोड़ा सा बदलाव हुआ है. रोजगार पूरी तरह से ठप है. चालकों को बहुत आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है. सभी लोग उम्मीद लगाए बैठे हैं कि, जल्द ही स्थिति पहले जैसे हो जाएगी.

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