झाबुआ। मध्यप्रदेश की शान माने जाने वाले कड़कनाथ मुर्गे की डिमांड हिंदुस्तान से लेकर अरब देशों तक है. कड़कनाथ मुर्गे का नाम सुनकर चिकन के शौकिनों के मुंह में पानी आ ही जाता है, कड़कनाथ पश्चिमी मध्यप्रदेश के अंतिम छोर पर बसे झाबुआ जिले में बहुतायत में पाया जाता है. दुर्लभ प्रजाति के इस मुर्गे को स्थानीय भाषा में कालामासी भी कहते हैं. कहा जाता है कि, डायबिटीज के मरीजों के लिये कड़कनाथ एक बेहतरीन दवा है.
कृषि वैज्ञानिक अमर सिंह दिवाकर ने बताया कि, मध्यप्रदेश में कड़कनाथ-कुकुट पालन की एक सरकारी योजना है. जिसके तहत अलीराजपुर, झाबुआ, धार, बड़वानी, खरगोन, रतलाम इन जिलों में किसानों को चूजों का वितरण किया जाता है. लॉकडाउन में शुरू के एक महीने में चूजों का वितरण नहीं हो पाया था, लेकिन धीरे- धीरे किसानों को कड़कनाथ के चूजें उनके घरों तक पहुंचाए गए.
कुकुट पालन केंद्र के प्रभारी आईएस तोमर ने बताया कि, कड़कनाथ की मांग लगातार बनी हुई थी और करीब तीन से चार महीने की वेटिंग थी. ये वेटिंग मध्यप्रदेश के अलावा दूसरे प्रदेशों से भी थी. लेकिन लॉकडाउन की वजह से खरीददार आ नहीं पा रहे हैं, जिसकी वजह से मुर्गी पालन का व्यवसाय करने वाले लोगों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है. कड़कनाथ की डिमांड पर भी इसका प्रभाव पड़ा है. लॉकडाउन की वजह से कड़कनाथ की सप्लाई पर भी इसका असर पड़ा है.
कड़कनाथ की विशेषताएं
कड़कनाथ में आम नस्ल के मुर्गों से ज्यादा प्रोटीन होता है. आम मुर्गों में जहां 20 फीसदी प्रोटीन होता है, तो वही इसमें 24 फ़ीसदी प्रोटीन पाया जाता है. वसा और कोलेस्ट्रॉल की मात्रा दूसरे प्रजाति के मुर्गों के मुकाबले बेहद कम होती है. इसमें में आयरन विटामिन सहित कई ऐसे पोषक तत्व होते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए गुणकारी माने जाते हैं. इस मुर्गे को हार्ट पेशेंट के लिए भी उपयोगी माना जाता है. कड़कनाथ का नाम आज भले ही मध्यप्रदेश से जुड़ा हो, लेकिन इसका जीआई टैग हासिल करने के लिए दो पड़ोसी राज्यों ने भी दावा ठोक दिया था. हालांकि बाद में कोर्ट से मुर्गों की इस नायाब प्रजाति का जीआई टैग मध्यप्रदेश को हासिल हुआ.