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समान नागरिक संहिता जैसे उपाय देश की एकता को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाएंगे : मुहम्मद साद बेलगामी - President of Jamaat-e-Islami Karnataka

दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) को लागू किए जाने को लेकर की गई टिप्पणी पर जमात-ए-इस्लामी कर्नाटक के अध्यक्ष डॉ. मुहम्मद साद बेलगामी ने कहा है कि यूसीसी जैसे उपाय देश की एकता को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाएंगे.

मुहम्मद साद बेलगामी
मुहम्मद साद बेलगामी
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Published : Jul 15, 2021, 5:50 PM IST

बेंगलोर : समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) को लेकर अभी हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट की न्यायाधीश प्रतिभा सिंह के द्वारा इसे लागू करने का आह्वान किया गया था. इस पर जमात-ए-इस्लामी कर्नाटक के अध्यक्ष डॉ. मुहम्मद साद बेलगामी का कहना है कि भारत बहु-धार्मिक और विविधतापूर्ण है, जहां विभिन्न संस्कृतियां और परंपराएं पाई जाती हैं और प्रत्येक धर्म के व्यक्तिगत कानून को संविधान के अनुच्छेद 21 से 28 तक संरक्षित किया गया है. उन्होंने कहा कि इसलिए धारा 44 की गलत व्याख्या करना और समान नागरिक संहिता पर चर्चा करना सही नहीं है.

डॉ. मुहम्मद साद ने कहा कि किसी भी देश का जब तक विश्वास प्राप्त नहीं होता है तब तक अधिकांश देश किसी भी राष्ट्र के व्यक्तिगत कानून को बदलने के लिए सहमत नहीं होते हैं. और न ही इसे लागू किया जा सकता है. इसलिए मुसलमानों पर भरोसा किए बिना इस संबंध में कोई कदम नहीं उठाया जा सकता है.

डॉ. साद बेलगामी ने कहा कि समान नागरिक संहिता, राष्ट्रीय एकता या गठबंधन के बारे में जो कहा जा रहा है वह शरारत हो सकती है. इसलिए समान नागरिक संहिता जैसे उपाय देश की एकता और सांप्रदायिक सद्भाव को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाएंगे. इस संबंध में उन्होंने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ एक ईश्वरीय कानून है जिसमें कोई दोष नहीं है. हालांकि, इस कानून को लागू करने में कठिनाईयां हैं, क्योंकि मुसलमानों में गरीबी, शैक्षिक पिछड़ापन और अज्ञानता है जिसकी वजह से वे मुस्लिम पर्सनल लॉ का ठीक से पालन नहीं करते हैं इससे वे संकट में हैं. उन्होंने कहा कि इसलिए इसका समाधान यह नहीं है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बदल जाए या खत्म कर दिया जाए बल्कि मुसलमानों की सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति में भी सुधार किया जाए ताकि वे पर्सनल लॉ का पालन करें.

ये भी पढ़ें - देश में समान नागरिक संहिता की जरूरत : दिल्ली हाईकोर्ट

बता दें कि दिल्ली हाईकोर्ट की जज प्रतिभा एम. सिंह ने तलाक के एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि देश अब धर्म, जाति और वर्ग के भेदों को लांघ चुका है. इसलिए समान नागरिक संहिता लागू करने की जरूरत है. उन्होंने अपने फैसले में कहा था कि आज का भारत धर्म, जाति और राष्ट्र से आगे निकल गया है. वहीं आधुनिक भारत में धर्म और जाति के बंधन तेजी से टूट रहे हैं. ये तेजी से हो रहे बदलाव अंतर्धार्मिक और अंतर-वर्गीय विवाह और तलाक में मुश्किलें पैदा कर रहे हैं.

बता दें कि दिल्ली हाईकोर्ट की जज प्रतिभा एम. सिंह ने तलाक के एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि देश अब धर्म, जाति और वर्ग के भेदों को लांघ चुका है. इसलिए समान नागरिक संहिता लागू करने की जरूरत है. उन्होंने अपने फैसले में कहा था कि आज का भारत धर्म, जाति और राष्ट्र से आगे निकल गया है. वहीं आधुनिक भारत में धर्म और जाति के बंधन तेजी से टूट रहे हैं. ये तेजी से हो रहे बदलाव अंतर्धार्मिक और अंतर-वर्गीय विवाह और तलाक में मुश्किलें पैदा कर रहे हैं.

बेंगलोर : समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) को लेकर अभी हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट की न्यायाधीश प्रतिभा सिंह के द्वारा इसे लागू करने का आह्वान किया गया था. इस पर जमात-ए-इस्लामी कर्नाटक के अध्यक्ष डॉ. मुहम्मद साद बेलगामी का कहना है कि भारत बहु-धार्मिक और विविधतापूर्ण है, जहां विभिन्न संस्कृतियां और परंपराएं पाई जाती हैं और प्रत्येक धर्म के व्यक्तिगत कानून को संविधान के अनुच्छेद 21 से 28 तक संरक्षित किया गया है. उन्होंने कहा कि इसलिए धारा 44 की गलत व्याख्या करना और समान नागरिक संहिता पर चर्चा करना सही नहीं है.

डॉ. मुहम्मद साद ने कहा कि किसी भी देश का जब तक विश्वास प्राप्त नहीं होता है तब तक अधिकांश देश किसी भी राष्ट्र के व्यक्तिगत कानून को बदलने के लिए सहमत नहीं होते हैं. और न ही इसे लागू किया जा सकता है. इसलिए मुसलमानों पर भरोसा किए बिना इस संबंध में कोई कदम नहीं उठाया जा सकता है.

डॉ. साद बेलगामी ने कहा कि समान नागरिक संहिता, राष्ट्रीय एकता या गठबंधन के बारे में जो कहा जा रहा है वह शरारत हो सकती है. इसलिए समान नागरिक संहिता जैसे उपाय देश की एकता और सांप्रदायिक सद्भाव को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाएंगे. इस संबंध में उन्होंने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ एक ईश्वरीय कानून है जिसमें कोई दोष नहीं है. हालांकि, इस कानून को लागू करने में कठिनाईयां हैं, क्योंकि मुसलमानों में गरीबी, शैक्षिक पिछड़ापन और अज्ञानता है जिसकी वजह से वे मुस्लिम पर्सनल लॉ का ठीक से पालन नहीं करते हैं इससे वे संकट में हैं. उन्होंने कहा कि इसलिए इसका समाधान यह नहीं है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बदल जाए या खत्म कर दिया जाए बल्कि मुसलमानों की सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति में भी सुधार किया जाए ताकि वे पर्सनल लॉ का पालन करें.

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बता दें कि दिल्ली हाईकोर्ट की जज प्रतिभा एम. सिंह ने तलाक के एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि देश अब धर्म, जाति और वर्ग के भेदों को लांघ चुका है. इसलिए समान नागरिक संहिता लागू करने की जरूरत है. उन्होंने अपने फैसले में कहा था कि आज का भारत धर्म, जाति और राष्ट्र से आगे निकल गया है. वहीं आधुनिक भारत में धर्म और जाति के बंधन तेजी से टूट रहे हैं. ये तेजी से हो रहे बदलाव अंतर्धार्मिक और अंतर-वर्गीय विवाह और तलाक में मुश्किलें पैदा कर रहे हैं.

बता दें कि दिल्ली हाईकोर्ट की जज प्रतिभा एम. सिंह ने तलाक के एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि देश अब धर्म, जाति और वर्ग के भेदों को लांघ चुका है. इसलिए समान नागरिक संहिता लागू करने की जरूरत है. उन्होंने अपने फैसले में कहा था कि आज का भारत धर्म, जाति और राष्ट्र से आगे निकल गया है. वहीं आधुनिक भारत में धर्म और जाति के बंधन तेजी से टूट रहे हैं. ये तेजी से हो रहे बदलाव अंतर्धार्मिक और अंतर-वर्गीय विवाह और तलाक में मुश्किलें पैदा कर रहे हैं.

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