चंडीगढ़: लोकसभा चुनाव 2024 से पहले जननायक जनता पार्टी (JJP, जेजेपी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अजय चौटाला के बयान से इंडियन नेशनल लोकदल (INLD इनेलो) और जेजेपी की एक होने की चर्चा के शुरू हो गई थी. उसके बाद अभय चौटाला ने जहां इसकी संभावनाओं को खारिज कर दिया. वहीं, यह जंग अब दोनों पार्टी के नेताओं के बीच सोशल मीडिया पर भी शुरू हो गई. क्या इस जुबानी जंग से हरियाणा के इस राजनीतिक परिवार की एक होने की संभावनाएं खत्म हो गईं? इनके एक न होने से किसका होगा नफा, किसका होगा नुकसान?
हरियाणा में जेजेपी और इनेलो के बीच जंग!: जेजेपी और इनेलो के बीच छिड़ी जंग को लेकर राजनीतिक मामलों के जानकार धीरेंद्र अवस्थी कहते हैं "जननायक जनता पार्टी ने बीते साढ़े चार साल में बीजेपी के साथ राजनीति की है जिस तरीके से वे सरकार से बाहर आए हैं. उसके बाद अजय चौटाला का यह एक टेक्टिकल स्टेटमेंट माना गया. आने वाले समय में जेजेपी का राजनीतिक सफर अच्छा नहीं माना जा रहा है. अजय चौटाला ने अपने बयान के जरिए एक पासा फेंका था. उनको लगता था कि यह एक पारिवारिक मामला है कोई एक बीच का रास्ता निकल आए. लेकिन, अभय चौटाला और अजय चौटाला के बीच जिस तरह की बयानबाजी और संघर्ष 2018 से चल रहा है जब इनेलो से टूटकर जेजेपी बनी और उसके बाद का घटनाक्रम रहा है उसमें परिवार की दूरियां इतनी बढ़ गई हैं कि एक होने की संभावनाएं नजर नहीं आती हैं."
'किसान आंदोलन के दौरान बयानबाजी पड़ी भारी': राजनीतिक विश्लेषक के अनुसार एक होना उस स्थिति में मुश्किल दिखाई देता है कि 2018 में जिस स्टेटमेंट के साथ जेजेपी बनी थी. उन्होंने पार्टी चौधरी देवीलाल जोकि सबसे बड़े किसान नेता के तौर पर भी जाने जाते थे उनके वे असली वारिस हैं. चौधरी देवीलाल के नाम के साथ जननायक लगाया जाता था, इसलिए उन्होंने पार्टी का नाम भी जननायक जनता पार्टी रखा. लेकिन किसान आंदोलन हुआ और उस किसान आंदोलन के दौरान दुष्यंत चौटाला या जेजेपी के नेताओं ने जिस तरह के बयान दिए जो उनका स्टैंड रहा, यह उसी वक्त यह माना जा रहा था कि जेजेपी अपने नेचर के खिलाफ राजनीति कर रही है. लोग यह कह रहे थे कि यह जेजेपी के लिए पॉलिटिकल सुसाइड होगा. क्योंकि लोग मानने के लिए तैयार नहीं थे कि चौधरी देवीलाल की लेगेसी पर दवा करने वाली पार्टी इस तरह से स्टेटमेंट दे, जिससे यह नजर आए कि वह बीजेपी के साथ खड़े हैं.
धीरेंद्र अवस्थी कहते हैं कि जेजेपी का जो वोट बैंक था उसमें भी इसको लेकर इतनी नाराजगी थी कि वे वक्तव्य का इंतजार कर रहे थे. जाहिर सी बात है कि पांच साल बाद राजनीति में वह वक्त चुनाव के समय आता है. उसी वक्त का लोग इंतजार कर रहे थे. उसी वक्त यह साफ हो चुका था कि जेजेपी का कोर वोट बैंक खिसक चुका है.
2014 और 2019 में वोट प्रतिशत: वहीं, क्या दोनों इनेलो और जेजेपी एक हो सकती है? इस पर राजनीतिक विश्लेषक धीरेंद्र अवस्थी कहते हैं "इसको हम इस तरह से देख सकते हैं कि 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव का विश्लेषण करेंगे तो स्थिति समझ आएगी. दोनों एक साथ जब थे तो क्या था अलग हो गए तो क्या था. जब इनेलो एक थी तो 2014 लोकसभा चुनाव हुए तो उसे करीब 24 फीसदी वोट मिले थे. जो कि 2014 विधानसभा में भी लगभग यही वोट प्रतिशत था. इससे यह भी पता चलता है कि जाट समाज के लोग एकतरफा इन्हें वोट देते थे. इसी वोट बैंक के सहारे इनेलो की 2014 में विधानसभा में 19 सीट आई थी और पार्टी मुख्य विपक्षी दल थी. लोकसभा में भी दो उम्मीदवार जीते थे."
2019 में बदल गया समीकरण: राजनीतिक मामलों के जानकार कहते हैं कि 2019 में स्थिति पलट गई. 2019 के विधानसभा चुनाव में जेजेपी को करीब 14.85 फीसदी वोट मिला. पार्टी के दस विधायक जीतकर आए. जबकि इनेलो को करीब ढाई फीसदी वोट मिले और एक विधायक जीतकर आया. दोनों का वोट बैंक करीब 17 फीसदी बना. इससे साफ हो गया था कि परिवार के अलग होने से उनको नुकसान हुआ था. वहीं, 2019 में लोकसभा चुनाव में जेजेपी को चार फीसदी के करीब वोट मिले, जबकि इनेलो को करीब 2 फीसदी वोट मिले. कोई सीट दोनों दलों को नहीं मिली. यानी वोट बैंक खिसक चुका था. हालांकि 2019 का चुनाव बालाकोट एयर स्ट्राइक की वजह से एक तरफा था. नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट पड़ा था.
INLD को उम्मीद: इससे यह साफ है कि 2014 में उनकी स्थिति क्या थी. 2019 में स्थिति क्या हुई. आज की स्थिति यह है कि इनेलो को इस बात का भरोसा है कि जेजेपी ने जिस तरह की पिछले साढ़े चार साल में राजनीति की उसकी वजह से उनका जो वोट बैंक है वह इनेलो की तरफ आ चुका है. ऐसे में अब ऐसी कोई संभावना नहीं है कि जेजेपी और इनेलो में कोई समझौता होगा.
'जेजेपी और इनेलो दोनों का नुकसान': इसका किसे नुकसान और फायदा होगा? इस पर धीरेंद्र अवस्थी कहते हैं कि देखा जाए तो इससे जेजेपी और इनेलो दोनों का नुकसान हो रहा है. क्योंकि इसकी संभावनाएं कम ही हैं कि निकट भविष्य में इनेलो का वोट बैंक 24 या 25 फीसदी तक पहुंच जाए. फिर भी यह माना जा रहा है कि 2019 में चौधरी देवीलाल के हरियाणा में जो हार्ड कोर सपोर्टर थे जेजेपी की तरफ खिसक कर चले गए थे, क्योंकि अजय चौटाला जेल में थे. लोगों के मन में यह बात थी कि अजय चौटाला के परिवार के साथ न्याय नहीं हुआ और लोगों में इनके प्रति सहानुभूति थी. इसी वजह से उनको वोट मिला था. लेकिन, बीते साढ़े चार साल में इन्होंने उस वोट बैंक की कद्र नहीं की, जिसकी वजह से इनका यह हाल हुआ है.
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