जयपुर. आजादी से पहले या यूं कहें जयपुर की बसावट से ही यहां पानी के संरक्षण और संवर्धन की तकनीक को (Water Crisis in Rajasthan) विकसित किया गया था. विरासत के उस दौर में भी जयपुर में वाटर मैनेजमेंट पॉलिसी थी. नतीजन शहर के हर बाशिंदे तक पर्याप्त पानी पहुंचता था. लेकिन विरासत से विकास की ओर बढ़ते कदमों ने जयपुर की पुरानी जल संवर्धन नीति को पीछे छोड़ दिया. जयपुर का वाटर मैनेजमेंट सिस्टम विकास की भेंट चढ़ गया, और आज पानी का संकट आ गया है.
जयपुर का बाशिंदा पीने के पानी के लिए मोहताज हो गया है. एक ही टैंकर से सैकड़ों लोग धक्का-मुक्की कर प्यास बुझाने का जतन करते हुए देखे जा सकते हैं. इतिहास गवाह है कि जयपुर में पानी की एक-एक बूंद की कद्र की जाती थी. उसको सहेज कर रखा जाता था. आम जनता में जागरूकता पैदा की जाती थी. टांके, बावड़ी में वर्षा जल स्टोर किया जाता था. जिससे वर्षाकाल के बाद बचे हुए 10 महीने में नियमित जलापूर्ति हो पाती थी.
लेकिन अब शहर में ऐसा देखने को नहीं मिलता. आज जयपुर की तीनों चौपड़ों का स्वरूप बदल चुका है. बावड़ियों की संभाल नहीं होने से कुछ सूख चुकी हैं तो कुछ गंदगी से अटी हुई हैं. वर्षा जल का संचय करने वाली नहरें नाले बन चुकी हैं. कुछ जगह अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुकी हैं. यही वजह है कि जयपुर के जिस जलसंवर्धन को वैज्ञानिक भी स्टडी किया करते थे. वो आज सिर्फ किताबी ज्ञान बनकर रह गई है और जयपुर वासियों को अब पानी के लिए दूसरे शहरों की तरफ तांकना पड़ता है.
जयपुर के बसावट में रखा था जलसंवर्धन का ध्यानः 18 नवम्बर 1727 को महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने नींव रखी थी तो बंगाल के वास्तुकार विद्याधर भट्टाचार्य ने इसका डिजाइन तैयार किया. जिसमें जलसंवर्धन का भी ध्यान रखा गया. परकोटे में बनी तीनों चौपड़, कई बावड़ियां, कुंड, तालकटोरा, नहर इसी जलसंवर्धन की कहानी को आज भी बयां करते हैं. लेकिन समय के साथ-साथ सुविधाओं के इस दौर में जयपुर की ऐतिहासिक जलसंवर्धन की तकनीक अब कहानियों में ही सिमट कर रह गई है. जयपुर की संरचना में वर्षा जल संचयन और बारिश के निकासी का विशेष तौर पर इंतजाम किया गया था जो आज भी आधुनिक भारत के ज्यादातर शहरों में देखने को नहीं मिलता. जयपुर की छोटी चौपड़, बड़ी चौपड़ और रामगंज चौपड़ पर बने कुंड इसी संरचना का हिस्सा है.
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जयपुर के पास अपना जल स्त्रोत नहीं थाः चूंकि जयपुर के पास अपना जल स्त्रोत नहीं था. ऐसे में जयपुर वासियों की पेयजल समस्या का समाधान करने के लिए सवाई जयसिंह ने हरमाड़ा के पास से एक नहर निकाली थी. जिससे बालानंद मठ के पीछे सरस्वती कुंड में वर्षा जल का स्टोरेज होता था और जयपुर के अंदर वो नहर गोपनीय रूप से अंदर चलती थी. जो गुप्त गंगा कहलाती थी. ये नहर इतनी चौड़ी थी कि दो घुड़सवार आराम से चल सकते थे और जिस भी आम आदमी को पानी की आवश्यकता होती थी वो जयपुर बने माखों से पानी ले लिया करते थे.
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जल संवर्धन जयपुर की खासियत थीः इतिहासकार देवेन्द्र कुमार भगत के अनुसार जयपुर की बसावट से पहले जल निकासी और जल स्टोरेज की प्लानिंग की गई थी. जयपुर के कुंड, बावड़ी इसी का उदाहरण है. जल संवर्धन जयपुर की खासियत थी. यहां बाजारों के नीचे नहर हुआ करती थी. कुछ साल पहले जब ऑपरेशन पिंक चला था, तब वो नहरें/नाले निकले थे. चूंकि आज के जमाने में उनका कोई उपयोग नहीं है. ऐसे में उन्हें दोबारा ढंक दिया गया था. पुराने शहर में बलवंत व्यामशाला के पास से जो नाला जा रहा है, वो भी किसी जमाने में पेयजल निकासी का स्त्रोत हुआ करता था, जो तालकटोरा में जाता था. इसी तरह गलता की पहाड़ियों और नाहरगढ़ की पहाड़ियों में भी ऐसे ही कई एनीकट बने हुए हैं, जो आज भी मौजूद हैं. जिससे वन्यजीवों के लिए भी पानी की समस्या का समाधान किया गया था.
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पहले जो पानी अतिरिक्त हुआ करता था, वो स्टोर हो जाया करता था. तालकटोरा, मावठा, सागर, जल महल यहां तक कि छोटी चौपड़, बड़ी चौपड़ और रामगंज चौपड़ पर बने हुए कुंड भी जल के स्त्रोत रहे हैं. वहीं बाजारों में जो टनल हुआ करती थी, उसे विकास के नाम पर निस्तेनाबूत कर दिया गया है. शहर की बावड़ियों के प्रति सभी सरकारों ने संवेदनहीनता दिखाई और जल स्रोतों के संवर्धन के लिए कोई कार्य नहीं किया. यही वजह है कि आज जयपुर का बाशिंदा पानी के लिए मोहताज हो गया है.