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सैनिक की विधवा पत्नी को 16 साल बाद मिला सेना कोर्ट से न्याय, मिलेगी पेंशन और सारे अधिकार - Lucknow News

सशत्र-बल अधिकरण के न्यायमूर्ति रवीन्द्र नाथ कक्कड़ (रिटायर्ड) और वाईस एडमिरल अतुल कुमार जैन (रिटायर्ड) की खण्डपीठ ने सुनाया फैसला.

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Published : Apr 17, 2023, 7:16 PM IST

लखनऊ: सशत्र-बल अधिकरण के न्यायमूर्ति रवीन्द्र नाथ कक्कड़ (रिटायर्ड) और वाईस एडमिरल अतुल कुमार जैन (रिटायर्ड) की खण्डपीठ ने बहराईच की रहने वाली फिरोज बानो को 16 साल बाद पेंशन दिए जाने का फैसला सुनाया है. कोर्ट मार्शल की तरफ से सेना की राजपूत रेजिमेंट से बर्खास्त दिवंगत पति सिपाही मो.यूनुस खान से जुड़े मामले पर अधिकरण ने सुनवाई करते हुए ये फैसला सुनाया है.

फिरोज बानो के दिवंगत पति सिपाही मोहम्मद यूनुस चार जुलाई 1990 को राजपूत रेजिमेंट की 25वीं इन्फेंट्री बटालियन में भर्ती हुए थे. जिस समय वह 20 माउंटेन डिवीजन में सेवारत थे उसकी बहन नसीम बानो का पारिवारिक व वैवाहिक जीवन गंभीर खतरे में पड़ गया. बहन के सामने खड़ी विषम परिस्थति में चार अप्रैल 2005 को 62 दिन की लंबी छुट्टी लेकर बहन के घर गोंडा पहुंचे थे.

पुलिस अधीक्षक गोंडा से मामले में हस्तक्षेप की गुहार लगाई थी, जिस पर महिला हेल्पलाइन गोंडा ने सक्रियता दिखाते हुए मामले का संज्ञान लिया. लेकिन, मामला लंबा खिंच गया और उनकी छुट्टी समाप्त होने लगी. घर पर सैनिक के अलावा मामले की पैरवी करने वाला कोई नहीं था. सैनिक को पिता और भाई दोनों का फर्ज निभाना था. इसलिए उसने अपनी लाचारी के बारे में उच्चाधिकारियों को अवगत कराया था. लेकिन, उसे सात सितंबर 2005 को भगोड़ा घोषित कर दिया गया. बहन के ससुराल पक्ष ने मौके का फायदा उठाकर 16 नवंबर 2005 को मामले में फर्जी शपथ-पत्र दाखिल करके मामले को लंबा खींचने की कोशिश की, जिससे सैनिक की नौकरी न बचे, लेकिन जांबाज सैनिक ने बहन को अकेला न छोड़ने का फैसला किया और लड़ाई को आगे बढ़ाया.

आखिरकार बहन को न्याय दिलाने में सफल हुआ. अब सैनिक के सामने सिर्फ आत्म-समर्पण ही विकल्प था, लेकिन वह सेना के सामने समर्पण करे उससे पहले ही उसको मध्य कमान की प्रोवोस्ट यूनिट ने 21 अगस्त 2007 को गिरफ्तार कर लिया. कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी हुई. समरी आफ एविडेंस रिकार्ड किया गया. फिर कोर्ट मार्शल करके 13 सितंबर 2007 को सेना से बर्खास्त कर दिया गया. घर आने के बाद दिल की बाईपास सर्जरी करानी पड़ी. बेटियों की उच्चशिक्षा, आंख की बीमारी और पारिवारिक बोझ के कारण वह अपने मामले को भूल ही गया.

साल 2016 में अधिवक्ता विजय कुमार पाण्डेय के माध्यम से वाद दायर किया गया, लेकिन 21 दिसंबर 2016 को दिल का दौरा पड़ने से सैनिक की मृत्यु हो गई. पत्नी और बच्चों की आय का जरिया न होने के कारण मुकदमे की पैरवी करना कठिन होते हुए भी पत्नी ने लड़ाई को लड़ने का फैसला लिया. सशत्र-बल अधिकरण लखनऊ की न्यायमूर्ति रवीन्द्र नाथ कक्कड़ (सेवानिवृत) और वाईस एडमिरल अतुल कुमार जैन (रिटा.) की खण्डपीठ ने मामले में सुनवाई के बाद फैसला सुनाते हुए कहा कि दिवंगत सैनिक ने 17 साल नौकरी की थी.

अगर उसे सेवा से बर्खास्त न किया गया होता तो वह पेंशन का हकदार होता, लेकिन उसे कोर्ट मार्शल ने कठोर दण्ड दिया जो अपराध की प्रकृति से मेल नहीं खाते, इसलिए सैनिक की बर्खास्तगी को डिस्चार्ज में किया जाता है और भारत सरकार को आदेशित किया जाता है कि चार महीने के अंदर कार्रवाई पूरी करे. पत्नी को उसके पति के सभी लाभ प्रदान करे. अगर इसका अनुपालन तय समय में नहीं किया जाता तो वादिनी आठ प्रतिशत ब्याज की भी हकदार होगी.

ये भी पढ़ेंः ज्ञानवापी मस्जिद में वजू के लिए सुप्रीम कोर्ट का नया आदेश, कहा- वाराणसी डीएम कमेटी के साथ करें वार्ता

लखनऊ: सशत्र-बल अधिकरण के न्यायमूर्ति रवीन्द्र नाथ कक्कड़ (रिटायर्ड) और वाईस एडमिरल अतुल कुमार जैन (रिटायर्ड) की खण्डपीठ ने बहराईच की रहने वाली फिरोज बानो को 16 साल बाद पेंशन दिए जाने का फैसला सुनाया है. कोर्ट मार्शल की तरफ से सेना की राजपूत रेजिमेंट से बर्खास्त दिवंगत पति सिपाही मो.यूनुस खान से जुड़े मामले पर अधिकरण ने सुनवाई करते हुए ये फैसला सुनाया है.

फिरोज बानो के दिवंगत पति सिपाही मोहम्मद यूनुस चार जुलाई 1990 को राजपूत रेजिमेंट की 25वीं इन्फेंट्री बटालियन में भर्ती हुए थे. जिस समय वह 20 माउंटेन डिवीजन में सेवारत थे उसकी बहन नसीम बानो का पारिवारिक व वैवाहिक जीवन गंभीर खतरे में पड़ गया. बहन के सामने खड़ी विषम परिस्थति में चार अप्रैल 2005 को 62 दिन की लंबी छुट्टी लेकर बहन के घर गोंडा पहुंचे थे.

पुलिस अधीक्षक गोंडा से मामले में हस्तक्षेप की गुहार लगाई थी, जिस पर महिला हेल्पलाइन गोंडा ने सक्रियता दिखाते हुए मामले का संज्ञान लिया. लेकिन, मामला लंबा खिंच गया और उनकी छुट्टी समाप्त होने लगी. घर पर सैनिक के अलावा मामले की पैरवी करने वाला कोई नहीं था. सैनिक को पिता और भाई दोनों का फर्ज निभाना था. इसलिए उसने अपनी लाचारी के बारे में उच्चाधिकारियों को अवगत कराया था. लेकिन, उसे सात सितंबर 2005 को भगोड़ा घोषित कर दिया गया. बहन के ससुराल पक्ष ने मौके का फायदा उठाकर 16 नवंबर 2005 को मामले में फर्जी शपथ-पत्र दाखिल करके मामले को लंबा खींचने की कोशिश की, जिससे सैनिक की नौकरी न बचे, लेकिन जांबाज सैनिक ने बहन को अकेला न छोड़ने का फैसला किया और लड़ाई को आगे बढ़ाया.

आखिरकार बहन को न्याय दिलाने में सफल हुआ. अब सैनिक के सामने सिर्फ आत्म-समर्पण ही विकल्प था, लेकिन वह सेना के सामने समर्पण करे उससे पहले ही उसको मध्य कमान की प्रोवोस्ट यूनिट ने 21 अगस्त 2007 को गिरफ्तार कर लिया. कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी हुई. समरी आफ एविडेंस रिकार्ड किया गया. फिर कोर्ट मार्शल करके 13 सितंबर 2007 को सेना से बर्खास्त कर दिया गया. घर आने के बाद दिल की बाईपास सर्जरी करानी पड़ी. बेटियों की उच्चशिक्षा, आंख की बीमारी और पारिवारिक बोझ के कारण वह अपने मामले को भूल ही गया.

साल 2016 में अधिवक्ता विजय कुमार पाण्डेय के माध्यम से वाद दायर किया गया, लेकिन 21 दिसंबर 2016 को दिल का दौरा पड़ने से सैनिक की मृत्यु हो गई. पत्नी और बच्चों की आय का जरिया न होने के कारण मुकदमे की पैरवी करना कठिन होते हुए भी पत्नी ने लड़ाई को लड़ने का फैसला लिया. सशत्र-बल अधिकरण लखनऊ की न्यायमूर्ति रवीन्द्र नाथ कक्कड़ (सेवानिवृत) और वाईस एडमिरल अतुल कुमार जैन (रिटा.) की खण्डपीठ ने मामले में सुनवाई के बाद फैसला सुनाते हुए कहा कि दिवंगत सैनिक ने 17 साल नौकरी की थी.

अगर उसे सेवा से बर्खास्त न किया गया होता तो वह पेंशन का हकदार होता, लेकिन उसे कोर्ट मार्शल ने कठोर दण्ड दिया जो अपराध की प्रकृति से मेल नहीं खाते, इसलिए सैनिक की बर्खास्तगी को डिस्चार्ज में किया जाता है और भारत सरकार को आदेशित किया जाता है कि चार महीने के अंदर कार्रवाई पूरी करे. पत्नी को उसके पति के सभी लाभ प्रदान करे. अगर इसका अनुपालन तय समय में नहीं किया जाता तो वादिनी आठ प्रतिशत ब्याज की भी हकदार होगी.

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