नई दिल्ली : भारत देश में लगातार अपराध के आकड़े बढ़ रहे हैं. इसके साथ-साथ देश की जनता को न्याय मिलने में भी देरी हो रही है. ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिसमें लोगों की पूरी उम्र बीत जाती है, लेकिन उनको न्याय नहीं मिल पाता. इसी सबको देखते हुए एक रिपोर्ट जारी की गई है, जो भारत की न्यायपालिका पर फोकस है.
आइये डालते हैं, इस रिपोर्ट पर एक नजर.
- यहां केवल 2 राज्य ऐसे हैं जहां हाई कोर्ट के न्यायाधीश के रिक्त पदों की संख्या 20% से कम है.
- 36 में से 19 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश ऐसे हैं जहां अधीनस्थ न्यायालयों में रिक्तियों की संख्या 20% से कम है.
- 30 में से 16 राज्य और केंद्रशासित प्रदेश ऐसे हैं जहां स्वीकृत न्यायाधीशों के मुकाबले अदालतें 10% से कम हैं.
- 29 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में से 11 ऐसे हैं जहां न्यायपालिका के खर्च पूरे राज्य के खर्चों से अधिक हैं.
- केवल झारखंड और मणिपुर में उच्च न्यायालय और अधीनस्थ अदालत ऐसे हैं, जहां 100% से अधिक मामलों की सुनवाई दर थी.
- जो रिपोर्ट जारी की गई है उसके मुताबिक पिछले साल 2020 तक अधीनस्थ न्यायालयों में 5 वर्षों से 4 में से लगभग 2 मामले लंबित हैं.
- भारत के 5 राज्य ऐसे हैं, जहां उच्च न्यायालयों में कोई महिला न्यायाधीश नहीं है.
- बड़े और मध्यम राज्यों में तमिलनाडु और पंजाब न्याय देने में टॉप पर हैं. बता दें, केरल पहले से तीसरे स्थान पर और महाराष्ट्र पहले से पांचवे स्थान पर आ गया है.
- सबसे चौंकाने वाला बदलाव छत्तीसगढ़ में देखने को मिला, जिसने बारहवें स्थान से आठवें पायदान पर छलांग लगाई. छत्तीसगढ़ ने अपने कोर्ट की कमी को कम किया और दोनों अदालतों के स्तर पर मामलों के निपटाने की दरों में वृद्धि दर्ज की.
- राष्ट्रीय स्तर पर उच्च न्यायालयों में लंबित औसत मामले 2016-17 में लगभग 40.12 लाख से बढ़कर 2018-19 में 44.25 लाख हो गए और निचली अदालतों में 2.83 करोड़ से 2.97 करोड़ हो गए.
- कर्नाटक ने अपनी अधीनस्थ अदालत की रिक्तियों को लगभग आधा कर दिया, तमिलनाडु में (10 प्रतिशत से 22 प्रतिशत) और उत्तर प्रदेश (31 प्रतिशत से 39 प्रतिशत) की रिक्तियों में काफी वृद्धि हुई, जबकि मेघालय में 42 प्रतिशत से बढ़कर 60 प्रतिशत हो गया.
- औसतन उच्च न्यायालयों में महिला जजों की हिस्सेदारी 11 प्रतिशत से बढ़कर 13 प्रतिशत हो गई, जबकि अधीनस्थ न्यायालयों में यह 28 प्रतिशत से बढ़कर 30 प्रतिशत हो गई.
- जबकि अधीनस्थ न्यायालयों में तीन में से एक न्यायाधीश एक महिला है, उच्च न्यायालयों में केवल नौ न्यायाधीशों में से एक महिला है.
- उच्च न्यायालयों में लिंग विविधता में सबसे बड़ा सुधार जम्मू-कश्मीर (15 प्रतिशत अंक), छत्तीसगढ़ (14 प्रतिशत अंक), और हिमाचल प्रदेश (11 प्रतिशत अंक) में हुआ. इससे पहले, तीन राज्यों में से किसी में भी महिला न्यायाधीश नहीं थी. बिहार में सबसे बड़ी 6.3 प्रतिशत अंक की गिरावट हुई, जहां अगस्त 2020 तक उच्च न्यायालय में कोई महिला न्यायाधीश नहीं है. 2018 से, मणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा और उत्तराखंड के उच्च न्यायालयों में भी महिला न्यायाधीश नहीं हैं.
बजट खर्च
- दस राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश (दिल्ली) के न्यायपालिका का खर्च पूरे राज्य के खर्चों से अधिक है.
- जिन 18 राज्यों में न्यायपालिका के बजट में वृद्धि हुई है, उनके कुल राज्य खर्च का पता लगाया गया है, उनमें 12 बड़े और मध्यम आकार के राज्य हैं. बता दें इनमें 5 मामले 1 से 5 साल से लंबित हैं. ये राज्य हैं- पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, झारखंड महाराष्ट्र.
- बिहार ने लगभग सात प्रतिशत अंकों की छलांग लगाई. बता दें, 2013-14 से 2017-18 के दौरान कुल बजट में औसतन 16 प्रतिशत की वृद्धि की, जबकि न्यायिक आवंटन में औसतन केवल 9 प्रतिशत की वृद्धि हुई.
आधारिक संरचना
- देश में कोर्ट की कमी 14 प्रतिशत के समान स्तर पर रही. 2018 और 2020 के बीच कार्य करने वाले कोर्टों की हॉल की संख्या 18,444 से बढ़कर 19,632 हो गई है.
- इस मामले में बड़े राज्यों ने बेहतर बढ़त बनाई, लेकिन अरुणाचल प्रदेश (0 प्रतिशत से 21 प्रतिशत), मध्य प्रदेश (13 प्रतिशत से 23 प्रतिशत) और उत्तर प्रदेश (14 प्रतिशत से 29 प्रतिशत) जैसे राज्यों में), पिछली रिपोर्ट के बाद से कमी बढ़ी है.
- हालांकि, यदि स्वीकृत न्यायाधीश शक्ति के पूर्ण पूरक को नियुक्त किया गया था, तो 3,343 कोर्ट की कमी होगी.