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अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाले शहीद वीर नारायण सिंह की कहानी

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Published : Dec 10, 2019, 12:14 PM IST

Updated : Dec 10, 2019, 7:46 PM IST

10 दिसंबर को छत्तीसगढ़ राज्य के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी शहीद वीरनारायण सिंह की शहादत दिवस के रूप में मनाया जाता है. वीरनारायण सिंह को आज ही के दिन रायपुर के जयस्तंभ चौक में फांसी दे दी गई थी.

शहीद वीरनारायण सिंह
शहीद वीरनारायण सिंह

रायपुर: गरीबों के मसीहा और छत्तीसगढ़ राज्य के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शहीद वीरनारायण सिंह की आज पुण्यतिथि है. आज ही के दिन 10 दिसंबर 1857 के दिन अंग्रेजों ने रायपुर के जयस्तंभ चौक पर वीरनारायण सिंह को फांसी दे दी थी. तब से लेकर आज तक 10 दिसंबर को पूरे छत्तीसगढ़ में शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है.

शहीद वीर नारायण सिंह की कहानी

वीरनारायण सिंह का जन्म सन् 1795 को छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार जिले के कसडोल विकासखण्ड के एक छोटे से गांव सोनाखान में हुआ था. उस वक्त वीरनारायण सिंह के पिता गांव के जमींदार हुआ करते थे. बताया जाता है कि सोनाखान में वीरनारायण सिंह के पूर्वजों की 300 गांवों की जमींदारी थी. शहीद वीरनारायण सिंह का अपनी प्रजा के प्रति अटूट लगाव और प्रेम था. सन्1856 को सोनाखान में भीषण अकाल पड़ा और सोनाखान की जनता दाने-दाने के लिए मोहताज हो गयी. लोग भूख से मरने लगे. भूख से मर रही जनता का दुख वीरनारायण सिंह से देखा नहीं गया और वीरनारायण सिंह ने कसडोल के साहूकारों का अनाज गोदाम लूटकर अपनी भूखी जनता में बंटवा दिया. साहूकारों ने इसकी शिकायत अंग्रेजों से की.

वीर नारायण सिंह के खिलाफ हुई अंग्रेज

साहूकारों की शिकायत के बाद अंग्रेजों ने शहीद वीरनारायण सिंह के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और वीर नारायण को पकड़ने की कवायद शुरू कर दी. अंग्रेजों ने वीरनारायण सिंह को पकड़ने के लिए सोनाखान में चढ़ाई कर दिया. वीरनारायण सिंह काफी बहादुर थे और अंग्रेजों से अकेले लोहा लेते थे. अंग्रेजों से मुकाबला करने के लिए वीरनारायण सिंह ने कुरुपाठ नामक पहाड़ी को चुना. घने जंगलों के बीच पहाड़ों में वीरनारायण सिंह गुफाओं में आकर रहने लगे. अंग्रेजों पर जीत हासिल करने के लिए वह दंतेश्वरी देवी की पूजा अर्चना करते थे.

अंग्रेजों ने शहीद वीर नारायण सिंह को मारने के लिए रची साजिश

अंग्रेजों को जब शहीद वीरनारायण सिंह की गुफा के बारे में पता चला तो उन्होंने गुफा में बारूद बिछाकर उड़ाने की रणनीति बनाई और अंग्रेजों ने कैप्टन स्मिथ की अगुवाई में गुफा के रास्ते को ध्वस्त करने के लिए बारूद बिछाकर ब्लॉस्ट कर दिया. कुरुपाठ की गुफा को बम से उड़ाने के बाद भी अंग्रेज सफल नहीं हुए.

अंग्रेजों से लिया लोहा
अंग्रेज वीरनारायण सिंह को खोजने बार-बार सोनाखान आने लगे और जैसे ही अंग्रेजों को वीरनारायण सिंह के बारे में पता चला अंग्रेजों ने कुरुपाठ पहाड़ी में धावा बोल दिया. इस बीच अंग्रेजों और वीरनारायण सिंह के बीच भीषण युद्ध हुआ और वीरनारायण सिंह ने अंग्रेजों को कुरुपाठ से मार भगाया. अंग्रेज सैनिकों की मौत से अंग्रेजी हुकूमत हिल गयी और अंग्रेजों ने वीरनारायण सिंह को मारने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी. शहीद वीरनारायण सिंह अंग्रेजों के कब्जे से बाहर थे. इससे बौखलाए अंग्रेजों ने सोनाखान की जनता पर जुल्म ढाना शुरू कर दिया.

जयस्तंभ चौक में दी फांसी
अंग्रेजों के बढ़ते जुल्म को देखते हुए वीरनारायण की पत्नी ने उसे आत्मसमर्पण करने को कहा. तब वीरनारायण ने अंग्रेजों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया. उनके आत्मसर्मपण करते ही उन्हें रायपुर जेल भेज दिया गया और 10 दिसंबर 1857 को रायपुर के जयस्तंभ चौक पर फांसी दे दी.

वीर मेले का आयोजन
शहीद वीरनारायण सिंह कुरुपाठ के पहाड़ पर देवी की साधना करते थे और कुरुपाठ पहाड़ी से ही अंग्रेजों पर नजर रखते थे. क्षेत्र की जनता ने आज भी उस जगह को सुरक्षित रखा है. इस अवसर पर हर साल बलौदाबाजार के सोनाखान में 3 दिन का वीर मेला आयोजित किया जाता है.

रायपुर: गरीबों के मसीहा और छत्तीसगढ़ राज्य के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शहीद वीरनारायण सिंह की आज पुण्यतिथि है. आज ही के दिन 10 दिसंबर 1857 के दिन अंग्रेजों ने रायपुर के जयस्तंभ चौक पर वीरनारायण सिंह को फांसी दे दी थी. तब से लेकर आज तक 10 दिसंबर को पूरे छत्तीसगढ़ में शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है.

शहीद वीर नारायण सिंह की कहानी

वीरनारायण सिंह का जन्म सन् 1795 को छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार जिले के कसडोल विकासखण्ड के एक छोटे से गांव सोनाखान में हुआ था. उस वक्त वीरनारायण सिंह के पिता गांव के जमींदार हुआ करते थे. बताया जाता है कि सोनाखान में वीरनारायण सिंह के पूर्वजों की 300 गांवों की जमींदारी थी. शहीद वीरनारायण सिंह का अपनी प्रजा के प्रति अटूट लगाव और प्रेम था. सन्1856 को सोनाखान में भीषण अकाल पड़ा और सोनाखान की जनता दाने-दाने के लिए मोहताज हो गयी. लोग भूख से मरने लगे. भूख से मर रही जनता का दुख वीरनारायण सिंह से देखा नहीं गया और वीरनारायण सिंह ने कसडोल के साहूकारों का अनाज गोदाम लूटकर अपनी भूखी जनता में बंटवा दिया. साहूकारों ने इसकी शिकायत अंग्रेजों से की.

वीर नारायण सिंह के खिलाफ हुई अंग्रेज

साहूकारों की शिकायत के बाद अंग्रेजों ने शहीद वीरनारायण सिंह के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और वीर नारायण को पकड़ने की कवायद शुरू कर दी. अंग्रेजों ने वीरनारायण सिंह को पकड़ने के लिए सोनाखान में चढ़ाई कर दिया. वीरनारायण सिंह काफी बहादुर थे और अंग्रेजों से अकेले लोहा लेते थे. अंग्रेजों से मुकाबला करने के लिए वीरनारायण सिंह ने कुरुपाठ नामक पहाड़ी को चुना. घने जंगलों के बीच पहाड़ों में वीरनारायण सिंह गुफाओं में आकर रहने लगे. अंग्रेजों पर जीत हासिल करने के लिए वह दंतेश्वरी देवी की पूजा अर्चना करते थे.

अंग्रेजों ने शहीद वीर नारायण सिंह को मारने के लिए रची साजिश

अंग्रेजों को जब शहीद वीरनारायण सिंह की गुफा के बारे में पता चला तो उन्होंने गुफा में बारूद बिछाकर उड़ाने की रणनीति बनाई और अंग्रेजों ने कैप्टन स्मिथ की अगुवाई में गुफा के रास्ते को ध्वस्त करने के लिए बारूद बिछाकर ब्लॉस्ट कर दिया. कुरुपाठ की गुफा को बम से उड़ाने के बाद भी अंग्रेज सफल नहीं हुए.

अंग्रेजों से लिया लोहा
अंग्रेज वीरनारायण सिंह को खोजने बार-बार सोनाखान आने लगे और जैसे ही अंग्रेजों को वीरनारायण सिंह के बारे में पता चला अंग्रेजों ने कुरुपाठ पहाड़ी में धावा बोल दिया. इस बीच अंग्रेजों और वीरनारायण सिंह के बीच भीषण युद्ध हुआ और वीरनारायण सिंह ने अंग्रेजों को कुरुपाठ से मार भगाया. अंग्रेज सैनिकों की मौत से अंग्रेजी हुकूमत हिल गयी और अंग्रेजों ने वीरनारायण सिंह को मारने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी. शहीद वीरनारायण सिंह अंग्रेजों के कब्जे से बाहर थे. इससे बौखलाए अंग्रेजों ने सोनाखान की जनता पर जुल्म ढाना शुरू कर दिया.

जयस्तंभ चौक में दी फांसी
अंग्रेजों के बढ़ते जुल्म को देखते हुए वीरनारायण की पत्नी ने उसे आत्मसमर्पण करने को कहा. तब वीरनारायण ने अंग्रेजों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया. उनके आत्मसर्मपण करते ही उन्हें रायपुर जेल भेज दिया गया और 10 दिसंबर 1857 को रायपुर के जयस्तंभ चौक पर फांसी दे दी.

वीर मेले का आयोजन
शहीद वीरनारायण सिंह कुरुपाठ के पहाड़ पर देवी की साधना करते थे और कुरुपाठ पहाड़ी से ही अंग्रेजों पर नजर रखते थे. क्षेत्र की जनता ने आज भी उस जगह को सुरक्षित रखा है. इस अवसर पर हर साल बलौदाबाजार के सोनाखान में 3 दिन का वीर मेला आयोजित किया जाता है.

Intro:शहीद वीरनारायण सिंह को छत्तीसगढ़ का प्रथम शहीद कहा जाता है और 10 दिसम्बर 1857 को यानी कि आज ही के दिन अंग्रेजों ने रायपुर के जयस्तम्भ चौक में वीरनारायण सिंह को फांसी दे दी थी, तब से लेकर आज तक 10 दिसम्बर को छत्तीसगढ़ में शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज 10 दिसम्बर है और छत्तीसगढ़ के मुखिया भूपेष बघेल पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद सोनाखान आ रहे हैं।

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वियो 1 छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब 140 किमी दूर बलौदाबाजार जिले के कसडोल विकासखण्ड में एक छोटा सा गांव है सोनाखान..... सोनाखान में सन 1795 को जमींदार रामराय के यहां वीरनारायण सिंह का जन्म हुआ,कहा जाता है कि सोनाखान में वीरनारायण सिंह के पूर्वजों की 300 गांवों की जमीदारी थी, शहीद वीरनारायण सिंह का अपनी प्रजा के प्रति अटूट लगाव और प्रेम था, बताया जाता है कि 1856 को सोनाखान में भीषण अकाल पड़ा और सोनाखान की जनता दाने दाने के लिए मोहताज हो गयी, भूखे मर रही जनता का दुख वीरनारायण सिंह से नहीं देखा गया और वीरनारायण सिंह ने कसडोल के साहूकारों का अनाज गोदाम लूटकर अपनी भूखी जनता में बंटवा दिया जिसके बाद साहूकारों ने वीरनारायण सिंह के खिलाफ अंग्रेजों से शिकायत कर दिया।


वियो (2) - जमीदारों के शिकायत के बाद अंग्रेजों ने शहीद वीरनारायण सिंह खिलाफ मोर्चा खोल दिया और वीरनारायण को पकड़ने की कवायद शुरू हो गयी, अंग्रेजों ने वीरनारायण सिंह को पकड़ने के लिए सोनाखान में चढ़ाई कर दिया ,वीरनारायण सिंह काफी बहादुर थे और अंग्रेजों से अकेले लोहा लेते थे, अंग्रेजों से मुकाबला करने के लिए वीरनारायण सिंह ने कुरुपाठ नामक पहाड़ी को चुना और अंग्रेजों से विजयी पाने अपने कुलदेवी दंतेश्वरी देवी की पूजा अर्चना करते थे,घने जंगलों के बीच पहाड़ों में वीरनारायण सिंह गुफाओं में आकर रहने लगे और अंग्रेजों को जब शहीद वीरनारायण सिंह के गुफा के बारे में पता चला तब उस गुफा को माइंस बिछाकर उड़ाने की रणनीति बनी और अंग्रेजों ने कैप्टन स्मिथ की अगुवाई में गुफा के रास्ते को ध्वस्त करने के लिए माइंस बिछाकर ब्लॉस्ट कर दिया, कुरुपाठ की गुफा को बम से उड़ाने के बाद भी अंग्रेज सफल नहीं हुए,वीरनारायण सिंह अंग्रेजों से लोहा लेने की रणनीति गुफा के अंदर रहकर ही बनाते थे, शहीद वीरनारायण सिंह कुरुपाठ के पठार में चट्टानों के टीले में बैठ कर देवी की साधना करते थे, और कुरुपाठ पहाड़ी से ही अंग्रेजों पर नजर रखते थे, क्षेत्र की जनता ने आज भी उस जगह को सुरक्षित रखा है।


वियो (3) - अंग्रेज वीरनारायण सिंह को खोजने बार बार सोनाखान आने लगे और जैसे ही अंग्रेजों को वीरनारायण सिंह के बारे में पता चला अंग्रेजों ने कुरुपाठ पहाड़ी में धावा बोल दिया, इस बीच अंग्रेजों और वीरनारायण सिंह के बीच भीषण युद्ध हुआ और वीरनारायण सिंह ने अंग्रेजों को कुरुपाठ से मार भगाया, अंग्रेजों की मौत से अंग्रेजी हुकूमत हिल गयी और अंग्रेजों ने वीरनारायण सिंह को मारने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी, शहीद वीरनारायण सिंह अंग्रेजों के कब्जे से बाहर थे इससे बौखलाए अंग्रेजों ने सोनाखान की जनता के ऊपर जुल्म ढाना शुरू कर दिया,अंग्रेजों के बढ़ते जुल्म को देखते हुए शहीद की पत्नि ने शहीद को आत्मसमर्पण करने को कहा तब शहीद ने अंग्रेजों समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया, शहीद के आत्मसर्मपण करते ही उन्हें रायपुर जेल भेज दिया गया और 10 दिसम्बर 1857 को रायपुर के जयस्तम्भ चौक में फांसी दे दी।
वीरनारायण सिंह की मौत से कसडोल और आस पास की जनता के मन मे शोक की लहर दौड़ हाई और मानो कसडोल क्षेत्र की जनता ने अपना मसीहा खो दिया था, वीरनारायण सिंह की शहादत के बाद छत्तीसगढ़ में 10 दिसम्बर की शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है।

Conclusion:बाइट - राजेन्द्र दीवान वीर नारायण सिंह के वंसज

बाइट - रामसाय यादव ग्रामीण

बाइट - मिनेश पटेल ग्रामीण
Last Updated : Dec 10, 2019, 7:46 PM IST
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