मरिगांव (असम) :तिब्बत से निकली विशाल ब्रह्मपुत्र नदी को असम के लोगों के लिए जीवन रेखा माना जाता है, क्योंकि यह अपने दोनों किनारों पर रहने वाले लाखों लोगों की आजीविका का साधन है.
यह इनकी जमीन उपजाऊ बनाती है. इसके पानी से सिंचाई कर फसल लहलहाती है. वहीं नदी के पास रहने वाले हजारों मछुआरों को आजीविका देती है. लेकिन जब इसमें बाढ़ आती है तो ये कहर बरपाती है. हजारों एकड़ फसल बरबाद हो जाती है. लोग बेघर हो जाते हैं. बेरोजगार हो जाते हैं. आंकड़ों के मुताबिक, सरकार ने पिछले डेढ़ दशक में 900 करोड़ रुपये खर्च किए हैं, लेकिन लोगों की जिंदगी अब भी बद्तर है.
ब्रह्मपुत्र नदी मध्य असम के मरिगांव जिले के लोगों के लिए एक अभिशाप बन गई है, जहां पिछले चार दशकों में 153 से ज्यादा गांव तबाह हो गए. इसका असर तीन लाख से अधिक लोगों पर पड़ा. यहां तक कि प्रभावित लोग पड़ोसी राज्यों जैसे अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और मणिपुर में पलायन कर चुके हैं, इनमें से हजारों प्रभावित मोरीगैन जिले के विभिन्न हिस्सों में तटबंधों और सड़क किनारे बने शिविरों में रह रहे हैं.
1988 में चार हजार लोग हो गए थे बेघर
स्थानीय लोगों का कहना है कि 1950 में बड़े भूकंप के बाद मरिगांव जिले में बाढ़ और कटाव हुआ था. जिले के कुछ क्षेत्रों में 1979 के बाद मरिगांव में भयंकर कटाव देखा गया. वहीं, 1988 में बाढ़ तबाही मचाई जिसमें 96 गांव नदी से कट गए. इस बाढ़ ने 4000 से ज्यादा परिवारों को बेघर कर दिया. सीतामढ़ी, सोलमरी, गोरोइमारी और कई गांवों में लोग अभी भी सड़क के किनारे टेंट में रहते हैं.
साल 1989, 1993, 1996 में भी तबाही
आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि 1989 में बाढ़ ने जिले को बुरी तरह प्रभावित किया था. 20 से ज्यादा लोगों ने अपने घरों और धान के खेतों को खो दिया. उसी वर्ष जिले में लाहोरीघाट निर्वाचन क्षेत्र में 60,000 से अधिक परिवार बेघर हो गए.
1993 में बाढ़ से मरिगांव के 228 से अधिक गांव प्रभावित हुए और 2.5 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए.