जौनपुर: देश के लिए अपनी जान न्यौछावर करने वाले सैनिक जब शहीद होते हैं तो उनके परिवारों से सरकार कई वादे करती है. इन वादों में से कुछ वादे तो सरकार पूरा करती है, लेकिन कई वादों को समय के साथ-साथ सरकार भूल भी जाती है. एक बाप के लिए अपने जीते जी बेटे की अर्थी को कंधा देना सबसे बड़ा दुख होता है. जब बेटा देश की सीमा के लिए शहीद हो तो बाप का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है.
कुछ ऐसा ही हुआ जौनपुर केराकत के भौरा गांव के रहने वाले श्याम नारायण सिंह के साथ. उन्होंने अपने जीते जी बेटे की अर्थी को कंधा दिया तो उनका सीना गर्व से चौड़ा हो गया. बेटे की शहादत के बाद सरकार ने कुछ वादे तो पूरे किए, लेकिन कई वादे अधूरे रह गए.
सरकार ने वादे पूरे नहीं किए-
संजय सिंह 25 जून 2016 को शहीद हुए थे. सैनिक कैंप से लौटते समय आतंकियों ने सीआरपीएफ की बस पर हथगोला फेंका, जिसमें आठ सैनिक शहीद हो गए. बेटे की शहादत के बाद सरकार ने वादे तो बहुत किए, लेकिन इनमें से कुछ वादों को छोड़कर बहुत से वादे अधूरे रह गए.
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शहीद की मां जीते जी देखना चाहती थीं शहीद बेटे की मूर्ति
शहीद की मां अपने जीते जी बेटे की मूर्ति लगी हुई देखना चाहती थीं, लेकिन सरकार अपना वादा पूरा न कर पाई. अब शहीद की मां दुनिया को अलविदा कह चुकी हैं. इस बात का दुख शहीद के पिता को सता रहा है. शहीद के पिता श्याम नारायण सिंह ने बताया कि उनके बेटे को शहीद हुए तीन साल हो चुके हैं, लेकिन अभी तक सरकार ने न तो शहीद द्वार बनवाया और न हीं गांव में शहीद के लिए मूर्ति बनवाई. उन्होंने बताया कि यहां तक की डीएम ने गांव के प्राथमिक स्कूल का नाम भी शहीद के नाम पर करने का वादा किया था, लेकिन वह वादा भी अधूरा रह गया.
शहीद के मां की इच्छा रह गई अधूरी
शहीद संजय सिंह की मां का अभी एक हफ्ते पहले ही देहांत हो गया. शहीद के मां की आखिरी इच्छा थी कि वह अपने जीते जी बेटे की मूर्ति लगी हुई देख सके, लेकिन सरकार ने वादा पूरा नहीं किया और शहीद की मां का सपना अधूरा रह गया. शहीद के पिता सरकार से इन वादों को पूरा कराने के लिए डीएम समेत कई अधिकारियों के यहां अपनी फरियाद कर चुके हैं, लेकिन हालात जस के तस हैं.