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कोटा: बैलों के पूजन कर किसान परिवारों ने मनाई दिवाली - Goverment worship

कोटा जिले में किसान परिवारों ने लक्ष्मी पूजन के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा की. वहीं शाम को बैलों के पूजन की परंपरा क्षेत्र के धरतीपुत्र किसान आज भी निभाते आ रहे है. जबकि आधुनिक जमाने की खेती परंपरागत बैलों से जोतने वाली खेती किसानी का काम ट्रैक्टर और अन्य कृषि यंत्रों ने निर्भर हो चुकी हैं.

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Published : Oct 28, 2019, 10:44 PM IST

कोटा. राजस्थान प्रदेश का ऐसा हाड़ौती अंचल जहां, सदियों से लक्ष्मी पूजन के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा और बैलों के पूजन की परंपरा क्षेत्र के धरतीपुत्र किसान आज भी निभाते आ रहे है, बता दें कि हाड़ौती अंचल संभाग में आज भी कुछ किसान बैलों की गोवर्धन पूजा वाले दिन शाम को सूर्य के अस्त होने पर गोवर्धन पूजा शुरू करते हुए महिलाओं के मंगल गीतों के साथ बैलों की पूजा करते है.

बैलों के पूजन कर किसान परिवारों ने मनाई दिवाली

किसान बैलों को पूरे शरीर पर मेहंदी लगाते है, बैलों के सींग पर मोरपंख, खजूर पंख और गले में बैलों के घुंघरू बांधते है. पंडित को बुलाकर परंपरागत कृषि यंत्र हल की पूजा करते है. किसान बैलों को पूजते समय रस्सी से बैलों को पकड़कर खड़े होते है. वहीं ढोल नंगाड़ों के साथ लोक और मंगल गीतों के साथ दीपावली पर घर में बने पकवान बैलों को भोग के रूप में चढ़ाते है. इसके बाद पूरा किसान परिवार बैलों को ढोक लगाता है, और कामना करता है कि खेतों में फसल का उत्पादन बढ़े, परिवार में सुख समृद्धि आए, किसान उन्नत हो. बैलों की पूजा के दौरान आतिशबाजी भी की जाती है. यह परंपरा कोटा संभाग के अब देहाती क्षेत्रों में सीमटकर रह गई है. अब ज्यादातर किसान आधुनिक कृषि यंत्र ट्रैक्टरों की पूजा करते है.

पढ़ेंः लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने दी लोगों को दीपावली की शुभकामनाएं

बता दें कि हाड़ौती में 70 फीसदी से ज्यादा परिवार किसान है. ये खेती किसानी से जुड़े हुए है, लेकिन 5 से 10 फीसदी किसान होंगे जो आज भी खेतों को परंपरागत खेती से जुड़े हुए है और वह आज भी अपने खेतों को बैलों से जोतते है, वहीं कंवरलाल सुमन किसान का परिवार हर गोवर्धन पूजा की शाम को अपने बैलों की जोड़ी हीरा और मोती की पूजा करते है.

कोटा. राजस्थान प्रदेश का ऐसा हाड़ौती अंचल जहां, सदियों से लक्ष्मी पूजन के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा और बैलों के पूजन की परंपरा क्षेत्र के धरतीपुत्र किसान आज भी निभाते आ रहे है, बता दें कि हाड़ौती अंचल संभाग में आज भी कुछ किसान बैलों की गोवर्धन पूजा वाले दिन शाम को सूर्य के अस्त होने पर गोवर्धन पूजा शुरू करते हुए महिलाओं के मंगल गीतों के साथ बैलों की पूजा करते है.

बैलों के पूजन कर किसान परिवारों ने मनाई दिवाली

किसान बैलों को पूरे शरीर पर मेहंदी लगाते है, बैलों के सींग पर मोरपंख, खजूर पंख और गले में बैलों के घुंघरू बांधते है. पंडित को बुलाकर परंपरागत कृषि यंत्र हल की पूजा करते है. किसान बैलों को पूजते समय रस्सी से बैलों को पकड़कर खड़े होते है. वहीं ढोल नंगाड़ों के साथ लोक और मंगल गीतों के साथ दीपावली पर घर में बने पकवान बैलों को भोग के रूप में चढ़ाते है. इसके बाद पूरा किसान परिवार बैलों को ढोक लगाता है, और कामना करता है कि खेतों में फसल का उत्पादन बढ़े, परिवार में सुख समृद्धि आए, किसान उन्नत हो. बैलों की पूजा के दौरान आतिशबाजी भी की जाती है. यह परंपरा कोटा संभाग के अब देहाती क्षेत्रों में सीमटकर रह गई है. अब ज्यादातर किसान आधुनिक कृषि यंत्र ट्रैक्टरों की पूजा करते है.

पढ़ेंः लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने दी लोगों को दीपावली की शुभकामनाएं

बता दें कि हाड़ौती में 70 फीसदी से ज्यादा परिवार किसान है. ये खेती किसानी से जुड़े हुए है, लेकिन 5 से 10 फीसदी किसान होंगे जो आज भी खेतों को परंपरागत खेती से जुड़े हुए है और वह आज भी अपने खेतों को बैलों से जोतते है, वहीं कंवरलाल सुमन किसान का परिवार हर गोवर्धन पूजा की शाम को अपने बैलों की जोड़ी हीरा और मोती की पूजा करते है.

Intro:किसान परिवारों ने लक्ष्मी पूजन के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा की शाम को बैलों के पूजन की परंपरा क्षेत्र के धरतीपुत्र किसान आज भी निभाते आ रहे है, जबकि आधुनिक जमाने की खेती परंपरागत बैलों से जोतने वाली खेती किसानी का काम ट्रैक्टर और अन्य कृषि यंत्रों ने निर्भर हो चुकी हैं.Body:कोटा.
राजस्थान प्रदेश का ऐसा हाड़ौती अंचल जहां, सदियों से लक्ष्मी पूजन के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा की शाम को बैलों के पूजन की परंपरा क्षेत्र के धरतीपुत्र किसान आज भी निभाते आ रहे है, जबकि आधुनिक जमाने की खेती परंपरागत बैलों से जोतने वाली खेती किसानी का काम ट्रैक्टर और अन्य कृषि यंत्रों ने निर्भर हो चुकी हैं. ऐसे में बैलों का उपयोग खेतों को जोतने और कृषि के अन्य कार्याे में बैलों का उपयोग कम हो गया, लेकिन हाड़ौती अंचल कोटा संभाग में आज भी कुछ किसान बैलों की गोवर्धन पूजा वाले दिन शाम को सूर्य के अस्त होने पर गोवर्धन पूजा शुरू करते हुए महिलाओं के मंगल गीतों के साथ बैलों की पूजा करते है. उन्हें नहलाते है, बैलों को पूरे शरीर पर मेहंदी लगाते है, बैलों के सिंग, मोरपंख, खजूर पंख, पैरों में गले में बैलों के घुंघरू बांधते है. पंडित को बुलाकर परंपरागत कृषि यंत्र हल की पूजा करते है. किसान बैलों को पूजते समय रस्सी से बैलों को पकड़कर खड़े होते है. ढोल नंगाडों के साथ लोक व मंगल गीतों के साथ दीपावली पर घर में बने पकवान बैलों को भोग के रूप में चढ़ाते है. इसके बाद पूरा किसान परिवार बैलों को ढोक लगाता है, और कामना करता है कि खेतों में फसल का उत्पादन बढ़े, परिवार में सुख समृद्धि आए, किसान उन्नत हो. बैलों की पूजा के दौरान आतिशबाजी भी की जाती है. यह परंपरा कोटा संभाग के अब देहाती क्षेत्रों में सीमटकर रह गई है. अब ज्यादातर किसान आधुनिक कृषि यंत्र ट्रैक्टरों की पूजा करते है. यह पूजा बैलों की पूजा हाड़ौती अंचल के कोटा जिले के सुल्तानपुर गांव के किसान कंवरलाल सुमन के परिवार द्वारा बैलों की पूजा की तस्वीरें है. जहां सदियों से चली आ रही परंपरा को आज भी किसान परिवार जीवत रखे हुए है.Conclusion:हाड़ौती में 70 फीसदी से ज्यादा परिवार किसान है. ये खेती किसानी से जुड़े हुए है, लेकिन 5 से 10 फीसदी किसान होंगे जो आज भी खेतों को परंपरागत खेती से जुड़े हुए है और वह आज भी अपने खेतों को बैलों से जोतते है, लेकिन कंवरलाल सुमन किसान का परिवार हर गोवर्धन पूजा की शाम को अपने बैलों की जोड़ी हीरा और मोती की पूजा करते है.
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