उज्जैन। शहर में स्थित विनोद मिल 26 वर्ष पहले यानी 1996 में भारी नुकसान के चलते बंद हो गई थी. यहां काम करने वाले करीब 4000 से ज्यादा मजदूर बेरोजगार हो गए थे. हालांकि ये सभी मजदूर विनोद मिल की बनी चाल में परिवार के साथ रहते थे. सबने अपने नए काम की तलाश कर ली. लेकिन अब न्यायालय के आदेश के बाद कार्रवाई की तैयारी जोरों पर है. इसके विरोध में यहां रहने वाले उतर आए. क्योंकि वे घर के मालिकाना हक को लेकर चिंता में हैं. मजदूरों का कहना है कि हमारी यहां 4 पीढ़ी बीत गई और अब मकान चले गए. मुआवजा या जमीन नहीं मिली तो कहां जायंगे.
मुआवजा नहीं मिलने का आरोप : दरअसल, लोगों का कहना है कि हमें मुआवजा नहीं मिला सिर्फ. वह पैसा कुछ 6% लोगों को मिला है, जो हमारे पूर्वज मिल में मजदूरी करते थे. उसकी ग्रेच्युटी का पैसा ब्याज सहित मिला है. वह भी 3 साल की लड़ाई के बाद. अभी हम इस स्थिति में कहीं नहीं जाना चाहते, क्योंकि जहां हमें शिफ्ट किया जा रहा है वह सिर्फ मल्टी में 8×8 का कमरा है. इतने में तो बस सामान ही आएगा, रहेंगे कहां. बता दें कि 4 वर्ष पूर्व न्यायालय का फैसला आया था कि सरकार 400 करोड़ की जमीन को 2 साल के अंतराल में खाली करवाये और जो करीब 4000 मजदूरों के परिवार हैं, उन्हें 58 करोड़ व अन्य जो ड्यूज हैं वो चुकाए.
प्रशासन की खाली कराने की तैयारी : बीच में कोरोना के 2 साल के कारण खाली नहीं हो पाए थे मकान. अब कार्रवाई को लेकर तेजी आई है. प्रशासन ने कार्रवाई की तैयारी शुरू कर दी है तो लोग सड़क पर उतर कर नारेबाजी करने से लेकर धर्म परिवर्तन करने तक उतर चुके हैं कि हमें मकानों का मालिकाना हक दिया जाए, या फिर 5 बीघा जमीन दी जाए. अब तक करीब दो हजार श्रमिकों की मृत्यु हो चुकी है, जो जीते हुए दावा राशि पाने से वंचित रहे. कई श्रमिकों ने तो आत्महत्या भी कर ली. साथ ही कुछ श्रमिक और उनके परिजन किडनी, कैंसर, टीबी, मिर्गी, लकवा और दमा जैसी खतरनाक बीमारियों से जूझ रहे हैं.