गोरखपुर : देश में बेहतरीन साड़ी के रूप में पहचान रखने वाली बनारसी साड़ी समय के साथ आधुनिकता और फैशन की तरफ भी बढ़ चली है. पहले काफी वजनी और वर्तमान समय में भी लगभग ढाई किलो तक बनने वाली यह बनारसी साड़ी अब आपको 90 ग्राम में भी मिल जाएगी, वह भी बेहद खूबसूरत कलर और डिजाइन में. धागे की गंभीर बुनाई, गाढ़े रंग में की गई रंगाई और छपाई के बाद यह बहुत ही खूबसूरत दिखती है.
चार पीढ़ियों से है कारोबार : खास बात यह है कि इस वजन की साड़ी बनाने का काम वाराणसी से जुड़े एक परिवार के लोग पिछले चार पीढ़ियों से कर रहे हैं. कारोबारी हैदर अली इस हुनर को पूरे परिवार के साथ लेकर आगे बढ़ा रहे हैं, जिसमें 10 लोग जुटे रहते हैं. कारोबारी के मुताबिक, उनका ग्रुप जहां इस साड़ी का निर्माता है, वहीं सूट-साड़ी दुपट्टा और ड्रेस मटेरियल समेत अन्य उत्पाद के डीलर भी हैं. जिसका केंद्र मुंशी का हाता, थाना जैतपुरा वाराणसी है.
1200 रुपये से बिक्री की शुरुआत : हैदर अली दावे के साथ कहते हैं कि बनारस में 90 ग्राम की साड़ी का उत्पादन उन्हीं के घर और हाथों से होता है. 90 ग्राम की यह खास साड़ी वर्तमान में गोरखपुर के कचहरी मैदान में लगी हैंडलूम प्रदर्शनी में बेची जा रही है. इसके अलावा 160 ग्राम, 250 ग्राम, 600 से लेकर ढाई किलो तक यानी की 2500 ग्राम की साड़ी भी काउंटर पर मौजूद है. 90 ग्राम की साड़ी मात्र ₹1200 से बिक्री की शुरुआत में होती है. कलर और डिजाइन के साथ इसकी कीमत थोड़ी बढ़ती है तो वहीं अन्य साड़ियों की कीमत लगभग ₹5000 तक है.
साड़ी को बनाने में 'वान सिल्क' का उपयोग : कारोबारी हैदर अली बताते हैं कि 90 ग्राम की साड़ी को बनाने में 'वान सिल्क' का उपयोग होता है जो रेशम से थोड़ा हटकर होता है. इसका भी उत्पादन सूरत गुजरात में होता है. जहां से यह माल बनारस आता है और हैंडलूम के काम करने वाले कारीगर इसका साड़ी बनाने में उपयोग करते हैं.
उन्होंने कहा कि उनका कारोबार लाख से सवा लाख रुपये का इस साड़ी को लेकर पूरे वर्ष में होता है. कारोबार मंदी से प्रभावित भी रहता है. उन्होंने कहा कि सरकार भले ही उन्हें प्रदेश में वर्ष भर में तीन से चार बार एक्सपो में प्रदर्शनी लगाने का मौका देती है लेकिन, पहले जैसा बाजार और कारोबार अब देखने को नहीं मिलता. नए दौर के फैशन से लोग खुद को जोड़ रहे हैं.
ब्रोकेड या जाली का होता है काम : उन्होंने कहा कि उनके यहां सफेद रंग में साड़ी तैयार की जाती है, वहीं रंग चढ़ाने से लेकर उस पर विभिन्न डिजाइन को बनाने का कार्य भी उनके कारीगर करते हैं. जिसमें महिला-पुरुष, बच्चे सभी शामिल हैं. उन्होंने कहा कि बनारस में 90 ग्राम की जॉर्जेट सिल्क साड़ी भी मीनाकारी डायबल के साथ मिलती है. इसके अलावा महंगी साड़ियों में सोने और चांदी के ब्रोकेड या जाली का काम भी होता है. इन साड़ियों में रेशम और भव्य कढ़ाई होती है.
उन्होंने बताया कि असली बनारसी साड़ी का जो पल्लू होता है वह 6 से 8 इंच लंबा होता है. साड़ी के बॉर्डर और पल्लू पर बेहद बारीक सिल्क के धागों की कारीगरी होती है. उन्होंने बताया कि अगर साड़ी पर अंबी जैसे पैटर्न दिखते हैं और आपको पल्लू पर अमरू भी नजर आता है तो समझ लीजिए कि वह साड़ी असली है. 90 ग्राम वजन के संबंध में उन्होंने कहा कि मौके पर हमारे पास कोई तौल मशीन तो नहीं, लेकिन जबान की भी कोई कीमत होती है. कोई भी इसे तौलकर लाकर उनकी दुकान पर वापस कर सकता है.
बनारसी साड़ी की डिमांड हमेशा: इस दौरान हैदर अली की दुकान पर एक बुजुर्ग महिला नजर आईं. ईटीवी भारत ने जब बनारसी साड़ियों के संबंध में उनसे सवाल किया तो महिला ने कहा कि, बनारसी साड़ियों को पहनने का रिवाज हमारे घरों में शादी- विवाह सभी में है, इसमें सोने-चांदी भी जड़े होते थे. साड़ी काफी वजनदार मिला करती थी, अब भी मिलती है, लेकिन समय के साथ इसमें भी हल्का पन आया है. अलग-अलग सोच के लोगों को अलग-अलग रंग और वजन की साड़ियां पसंद आती हैं. बनारसी साड़ियां कभी भी फैशन से बाहर नहीं हो सकतीं, इसकी डिमांड हमेशा है.
बूटीदार साड़ी का प्रमुख स्थान : कारोबारी हैदर अली ने बताया कि इस प्रदर्शनी में बनारस की पारंपरिक साड़ियों में बूटीदार साड़ी का प्रमुख स्थान है. बनारस में इस तर्ज पर सर्वाधिक बुनाई साड़ियों की होती है. इन साड़ियों में विभिन्न प्रकार की बेल बूटी, जंगला साड़ी का भराव रहता है. साड़ी की मुख्य जमीन की सजावट के लिए विभिन्न प्रकार की छोटी एवं बड़ी बूटियों का प्रयोग आमतौर पर किया जाता है.
बनारस में प्रचलित विभिन्न प्रकार की बूटियों में चांद बूटी, पान बूटी, पंखा बूटी, तिकोनी बूटी, अशर्फी बूटी, मक्खी बूटी, चुनरी बूटी, लतीफा बूटी, लारा बूटी, चमेली बूटी समेत दर्जनों बूटियां शामिल हैं. बनारस वस्त्र उद्योग में मलमल जामदानी काम के चकोरा दुपट्टे, लटके आदि के नमूनो का संग्रह भारत कला भवन वाराणसी और अन्य संग्रहालय में भी देखने को मिलता है, जो बनारस के मलमल की 20वीं शताब्दी तक के परंपरा का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं.
बनारस की प्रमुख साड़ियों में से एक जंगला साड़ी : उन्होंने कहा कि यहां जंगला साड़ी बनारस की प्रमुख पारंपरिक साड़ियों में से एक है. जंगला शब्द जंगल से लिया गया है. इस डिजाइन में फूल और पट्टी की लता इस तरफ फैली होती है, जिसके बीच की रिक्त जगह एक डिजाइन की शक्ल बना देती है. इसमें ज्यादातर घुमावदार डिजाइन का चयन करने और पत्तियों एवं फूलों में अलग-अलग प्रकार के प्रयोग किए गए रहते हैं. इसमें लता को कठुआ विधि कहते हैं. उन्होंने कहा कि जिस कढ़ाई में सोना-चांदी की बुनाई बहुत ही बारीकी तरीके से हुई हो उसे ब्रोकेड कहते हैं, जिसमें एंब्रॉयडरी जैसा काम होता है.
आने-जाने का खर्च वहन करती है सरकार : गोरखपुर हैंडलूम एक्सपो में बनारस से आए अधिकारी उपेंद्र दुबे ने बताया कि हैंडलूम के कारोबारी को प्लेटफार्म दिलाने के लिए प्रदेश सरकार जगह-जगह प्रदर्शनी लगाती है, जिसके क्रम में गोरखपुर में भी यह प्रदर्शनी लगाई गई है. इसमें आए हुए कारीगरों को आने-जाने का खर्च सरकार वहन करती है. इन्हें अपने सामान की प्रदर्शनी और गुणवत्ता के साथ बिक्री करने का अवसर भी मिलता है, जिससे यह अच्छा पैसा कमा सकते हैं.
साथ ही हथकरघा विकास निगम उनके उत्थान के लिए जो भी और जरूरी सुविधाएं होती हैं, उसको देने का प्रयास करता है. उन्होंने कहा कि प्रदेश स्तर पर पुरस्कार प्राप्त बुनकर को राज्य सरकार 60 वर्ष की उम्र के बाद ₹8000 का मासिक पेंशन भी प्रदान करती है, इसका भी लाभ बुनकर उठा सकते हैं.
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