वाराणसी: हिन्दू धर्मशास्त्रों में हर माह की एकादशी तिथि भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित है. सनातन धर्म में एकादशी तिथि की अपनी खास महत्व है. फाल्गुन मास के शुक्लपक्ष की एकादशी तिथि के दिन आमलकी/रंगभरी एकादशी मनाई जाती है. ऐसी मान्यता है कि आमलकी एकादशी के व्रत से द्वादश मास के समस्त एकादशी के व्रत का पुण्यफल मिलता है, साथ ही जीवन के समस्त पापों का नाश भी होता है. एकादशी तिथि के दिन स्नान दान व्रत से सहस्र गोदान के समान शुभफल की प्राप्ति बतलाई गई है. इस दिन स्नान-दान और व्रत से भगवान् श्रीहरि यानि श्रीविष्णु जी की पूजा-अर्चना का विशेष महत्त्व है.
ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि फाल्गुन शुक्लपक्ष की एकादशी तिथि 2 मार्च, गुरुवार को प्रातः 6 बजकर 40 मिनट पर लग रही है, जो 3 मार्च, शुक्रवार को प्रातः 9 बजकर 12 मिनट तक रहेगी. इस बार सौभाग्य योग का भी संयोग बन रहा है, जो कि 2 मार्च, गुरुवार को सायंकाल 5 बजकर 51 मिनट से 3 मार्च, शुक्रवार को सायं 6 बजकर 44 मिनट तक रहेगा. 3 मार्च, शुक्रवार को उदया तिथि के रूप में एकादशी तिथि रहेगी.
आमलकी एकादशी का व्रत इसी दिन रखा जाएगा. इसी दिन काशी में श्रीकाशी विश्वनाथ का प्रतिष्ठा महोत्सव व श्रृंगार दिवस भी मनाया जाता है. रंगभरी एकादशी के दिन काशी में शिव जी के भक्त बहुत धूम-धाम इस त्योहार को मनाते हैं. इस दिन भोलेनाथ माँ पार्वती का गौना कराकर काशी ले आए थें. इसलिए इस दिन काशी में माँ पार्वती का भव्य स्वागत किया जाता है और इसी खुशी में रंग-गुलाल उड़ाने की परम्परा है.
ऐसे करें भगवान श्रीहरि की पूजाःज्योतिष आचार्य विमल जैन ने बताया कि व्रतकर्ता को अपने दैनिक नित्य कृत्यों से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करके आमलकी/रंगभरी एकादशी व्रत का संकल्प लेना चाहिए. संकल्प के साथ व्रत करके समस्त नियम-संयम आदि का पालन करना चाहिए. ऐसी धार्मिक मान्यता है कि आंवले के वृक्ष में त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश) का वास माना गया है. ब्रह्माजी वृक्ष के ऊपरी भाग में, शिवजी वृक्ष के मध्य भाग में एवं श्रीविष्णु वृक्ष के जड़ में निवास करते हैं.