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buddha purnima 2020: जानिए क्यों खास है बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध की जयंती - Buddha Jayanti 2020

आज पूरे देश में बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध की जयंती मनाई जा रही है. संन्यासी बनकर गौतम बुद्ध ने अपने आप को आत्मा और परमात्मा के निरर्थक विवादों में फंसाने की अपेक्षा समाज कल्याण की ओर अधिक ध्यान दिया. उनके उपदेश मानव को दुःख एवं पीड़ा से मुक्ति दिलाने के माध्यम बने.

बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध की जयंती
बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध की जयंती

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Published : May 7, 2020, 5:43 PM IST

गोरखपुर:आज देशभर में बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध की जयंती बड़ी धूमधाम से मनाई जा रही है. विश्व के महानतम व्यक्तियों में एक गौतम बुद्ध को पूरी दुनिया में भगवान के रूप में देखा जाता है. गोरखपुर के विद्वान ज्योतिषाचार्य शरद चंद मिश्र के अनुसार यह दिन व्रत-दान और भगवान विष्णु के अर्चन की परम पुनीत तिथि है. निर्णय सिन्धु ग्रन्थ के अनुसार इस दिन जल से भरा स्वच्छ जल और पकवान और फल इत्यादि के दान से सौ गोदान का फल प्राप्त होता है.

धर्मशास्त्र में इस तिथि के विषय में और बहुत से माहात्म्यों का वर्णन मिलता है. इसमें पांच या सात ब्राह्मणों को सत्तू, शर्करा सहित दान करने के विषय में पद्मपुराण में उल्लेख है. इसके अतिरिक्त तिल, घृत और चीनी से होम करना भी पुण्यप्रद रहता है. इस दिन सूर्य अपने उच्च स्थिति में और चन्द्रमा भी पूर्णता की स्थिति में रहता है. समस्त वस्तुस्थिति का अवलोकन करने के अनन्तर ही शास्त्रकारों ने इसका अत्यन्त महत्व प्रतिपादित किया है.

ज्योतिषाचार्य मिश्र कहतें है कि इसी दिन भगवान बुद्ध का जन्म, सम्यक संबुद्धत्व की प्राप्ति और निवार्ण भी हुआ था. इसीलिए इस दिन भगवान बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित समस्त पर्वों का आयोजन सम्पन्न होता है. बौद्ध धर्म की उत्पत्ति भी भारतवर्ष में ही हुई और यहीं से यह धर्म विश्व के अनेक देशों में प्रसारित हुआ है.

गीतगोविन्दम् के रचयिता जयदेव ने अपनी रचना में कहा है कि जब पाखण्ड धर्म का वर्चस्व हो गया और धर्म के नाम पर पशुबलि का बोलबाला हो गया तो भगवान विष्णु को बुद्ध के रूप में अवतरित होना पड़ा. हमारे ग्रन्थों में कई स्थानों पर इनके महत्व को दर्शाया गया है. 'बर्टेण्ड रसेल' जो अनीश्वरवादी था. उसने लिखा कि मेरी आस्था ईश्वर में नहीं है परन्तु यदि ईश्वर पृथ्वी पर अवतरित हुआ होगा और चला होगा तो मेरा मानना है वह सिद्धार्थ गौतम ही होंगे. आज भी संसार के समस्त संभागों में विद्यमान प्रबुद्ध व्यक्तियों के उपास्य देव सिद्धार्थ गौतम ही हैं.

गौतम बुद्ध का बचपन
बौद्ध धर्म की नीव मानवता की मुक्ति का मार्ग ढूंढने के लिए त्याग और साधना पर आधारित है. कहतें है कि 'पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं'. इस कहावत को गौतम बुद्ध ने चरितार्थ कर दिखाया. उनका जन्म कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी नामक स्थान पर हुआ था. उनके पिता शुद्धोदन शाक्य वंश के राजा थे और माता महामाया देवी थीं, जो जन्म देते ही स्वर्ग सिधार गईं. गौतम बुद्ध का जन्म का नाम सिद्धार्थ था.

ऋषि असित ने की थी भविष्यवाणी
बचपन में ही ऋषि असित ने गौतम बुद्ध के पिता शुद्धोदन से कहा था कि या तो वह एक महान राजा बनेंगे अथवा एक महान परातत्व से भरा ज्ञानी. इस भविष्यवाणी के कारण ही शुद्धोदन ने अपनी सामर्थ्य की हद तक सिद्धार्थ को दुःख से दूर रखा. फिर भी 29 वर्ष की उम्र में उनकी दृष्टि चार दृश्यों पर पड़ी. वो चार चीजें थीं. एक बूढ़ा अपाहिज, एक बीमार आदमी, एक मुरझाई लाश और एक सन्यासी.

इन चारों दृश्यों को देखकर सिद्धार्थ समझ गये कि सबका जन्म होता है, बीमारी आती है, बुढ़ापा आता है और एक दिन मृत्यु होती है. इस प्रकार उन्होंने अपना समृद्ध जीवन, अपनी जाति, अपनी पत्नी और पुत्र सबको छोड़कर साधु का जीवन अपना लिया ताकि वे जन्म, बुढ़ापे, दर्द, बीमारी और मृत्यु के बारे में कोई उत्तर खोज पाएं.

गौतम बुद्ध ने पांच ब्राह्मणों के साथ सत्य की खोज शुरू की, जिससे उन्हें कठोर तपस्या, भूख और शारीरिक यंत्रणा झेलनी पड़ी. कठोर तपस्या छोड़कर अन्त में उन्होंने आर्य- अष्टांग मार्ग ढूंढ़ा, जो बीच का मार्ग कहलाता है. यह मार्ग तपस्या और असंयम के बीच का है. एक राजकन्या से खीर लेकर शरीर की ऊर्जा में वृद्धि हुई और वे पीपल के पेड़ के नीचे जिसे बोधिवृक्ष कहते हैं, सत्य जानने के लिए बैठ गये. सम्पूर्ण रात्रि ध्यान के अनन्तर प्रज्ञा का समुदय हुआ और 35 वर्ष की उम्र में प्रबुद्ध (बुद्ध) बन गये और पहला धर्मोपदेश वाराणसी के पास सारनाथ (ॠषि पत्तन मृगदाव) में अपने मित्रों को दिया. मित्रों को बोधि कराकर उन्हे संसार के कल्याण के लिए भेज दिया.

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