नई दिल्ली/गाजियाबादः सनातन धर्म में सावन महीने का विशेष महत्व होता है. हिंदू पंचांग का यह पांचवां महीना भोलेनाथ को समर्पित होता है. मान्यता है कि इस महीने में भगवान शंकर की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाए तो वह अत्यंत प्रसन्न होते हैं और मनोवांछित सभी कामनाओं की पूर्ति होती है. जहां भगवान शिव के भक्तों के लिए पूरा महीना खास होता है, वहीं सोमवार का विशेष महत्व होता है. आज सावन के पहले सोमवार को गाजियाबाद के प्राचीन दुधेश्वर नाथ मठ मंदिर में भक्तों का जनसैलाब उमड़ रहा है.
रात 12:00 बजे से श्रद्धालुओं का तांता
सावन के पहले सोमवार पर गाजियाबाद स्थित दूधेश्वर नाथ मंदिर में कल रात 12:00 बजे से ही श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है. दूधेश्वर नाथ मंदिर के बाहर तकरीबन डेढ़ किलोमीटर लंबी महिला और पुरुष की अलग-अलग दो लाइनें लगी हुई है. यह मंदिर काफी प्राचीन है और इसकी काफी अधिक मान्यता है. इसके चलते मंदिर में जलाभिषेक करने के लिए केवल गाजियाबाद ही नहीं बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश और एनसीआर से श्रद्धालु आते हैं.
श्रद्धालुओं के लिए विशेष प्रबंध
मंदिर के महंत नारायण गिरी ने बताया कि सावन के पहले सोमवार पर भक्तों की मनोकामना भोलेनाथ अवश्य पूरी करते हैं. बीते दो सालों में कोरोना के चलते सावन के महीने में भक्त मंदिर में दर्शन नहीं कर पाए थे, जिसके चलते इस साल भारी भीड़ देखने को मिल रही है. भक्तों की भारी भीड़ को मद्देनजर रखते हुए तकरीबन तीन हफ्ते पहले से ही मंदिर में तैयारियां शुरू कर दी गई थीं. भक्तों को किसी प्रकार की असुविधा न हो इसको लेकर विशेष प्रबंध किए गए हैं.
वेद पुराणों में है मंदिर का वर्णन
दूधेश्वर नाथ मठ मंदिर के महंत नारायण गिरी के मुताबिक मंदिर रावण के पिता ऋषि विश्वश्रवा द्वारा स्थापित है. महंत नारायण गिरी दूधेश्वर नाथ मंदिर के 16 वे महंत है. दूधेश्वर नाथ मंदिर पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रमुख तीर्थ स्थल है. वेद पुराणों में भी प्राचीन विश्वनाथ मंदिर का वर्णन है.
रावण ने की थी पूजा
गाजियाबाद के प्राचीन दूधेश्वर नाथ मठ मंदिर की मान्यता काफी पुरानी है. प्राचीन काल में यहां रावण के पिता ने भी पूजा-अर्चना की थी. प्राचीन काल में मंदिर में रावण ने भी पूजा-अर्चना की थी. इतना ही नहीं, रावण ने अपना 10वां शीष भगवान भोलेनाथ के चरणों में अर्पित कर दिया था. इस मान्यता को भक्त भी जानते हैं और दूर-दूर से यहां आते हैं. प्राचीन काल में मंदिर वाली जगह पर एक टीला होता था. जहां पर गाय स्वयंभू दूध देती थी, वहीं भगवान दूधेश्वर स्थापित हैं.