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World Tuberculosis Day: खतरनाक प्री-एक्सडीआर टीबी का अब छह माह में होगा उपचार, जानिए कैसे?

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Published : Mar 24, 2023, 5:16 PM IST

आगरा में खतरनाक प्री-एक्सडीआर टीबी मरीजों का इलाज अब छह माह में किया जाएगा. पायलट प्रोजेक्ट के तहत की गई केस स्टडी के रिजल्ट अच्छे आए हैं. इस पायलट प्रोजेक्ट को टीबी मुक्त भारत अभियान में शामिल किया जा सकता है.

खतरनाक प्री-एक्सडीआर टीबी का छह माह में उपचार
खतरनाक प्री-एक्सडीआर टीबी का छह माह में उपचार

खतरनाक प्री-एक्सडीआर टीबी का छह माह में उपचार

आगरा:पीएम मोदी ने टीबी मुक्त भारत मिशन-2025 शुरू किया है. इसके तहत देश में टीबी और उसके उपचार पर रिसर्च भी की जा रही है. जिससे टीबी का देश से खात्मा किया जाए. इसी कड़ी में इंडियन काउंसिल ऑफ रिसर्च (आईसीएमआर) ने मेडिकल कॉलेज में मल्टी ड्रग रजिस्टेंट (एमडीआर ) के साथ टीबी के मरीजों के लिए प्री-एक्सटेंसिवली ड्रग रजिस्टेंट (प्री-एक्सडीआर) को लेकर 'माॅडीफाइड बीपाल रेजिमेंट' रिसर्च का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है. यह पायलट प्रोजेक्ट यूपी के आगरा और राजधानी लखनऊ में चल रहा है. इसी के साथ मुंबई में दो, गुजरात में दो और एक नई दिल्ली के एक संंस्थान में रिसर्च पायलट प्रोजेक्टत चल रहा है.

पिछले एक साल से आगरा में पायलट प्रोजक्ट की कमान संभाल रहे एसएन मेडिकल कॉलेज के टीबी एंड चेस्ट विभाागाध्यक्ष प्रोफेसर संतोष कुमार से ईटीवी भारत ने एक्सक्लुसिव बातचीत की. उन्होंने बताया कि एसएनएमसी में प्री-एक्सडीआर टीबी के मरीजों पर की गई रिसर्च के रिजल्ट बेहतर हैं. इस खतरनाक टीबी के मरीजों को सिर्फ तीन दवाएं देकर छह माह तक दी जाती है, जिससे मरीज ठीक हो गए हैं. इस रिसर्च को जल्द ही पीएम मोदी के मिशन टीबी मुक्त भारत अभियान में शामिल किया जाएगा.

समझें प्री-एक्सडीआर टीबी:जो मरीज टीबी का उपचार बीच में छोड़ देते हैं. जिससे उनमें ड्रग रजिस्टेंट टीबी यानी मल्टी ड्रग रजिस्टेंट (एमडीआर) टीबी हो जाती है. एमडीआर टीबी के मरीज का उपचार किया जाता है. लेकिन छह माह उपचार के बाद भी अगर मरीज की रिपोर्ट पाॅजिटव आती है. ऐसे में मरीज प्री- एक्सटेंसिवली ड्रग रजिस्टेंट (प्री-एक्सडीआर) टीबी का शिकार हो जाता है. यह बेहद खतरनाक टीबी होती है. इसमें दो साल तक टीबी मरीज की नियमित दवा चलती है.

60-60 मरीजों के समूह पर रिसर्च:एसएनएमसी के टीबी एंड चेस्ट एचओडी प्रो. संतोष कुमार का कहना है कि इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (Indian Council of Medical Research) का एसएनएमसी में टीबी के प्रीएक्सडीआर के मरीजों को लेकर पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया था. इस पायलट प्रोजेक्ट में प्रीएक्सडीआर टीबी के मरीजों को रजिस्टर किया गया है. इसमें 60 मरीज पर स्टडी की गई है. स्टडी के दौरान प्री-एक्सडीआर टीबी के मरीजों को तीन दवाएं दी गईं. जिनके रिजल्ट बहुत अच्छे आए हैं. यह पायलट प्रोजेक्ट एक साल से चल रहा है. इसमें प्री-एक्सडीआर टीबी मरीज का पहले जहां दो साल तक उपचार चलता था. इस रिसर्ज में ऐसे मरीज छह माह में ठीक हो रहे हैं.

तीन दवा से क्योर रेट 85 प्रतिशत:एसएनएमसी के टीबी एंड चेस्ट एचओडी प्रो. संतोष कुमार बताते हैं कि पायलट प्रोजेट में प्रीएक्सडीआर टीबी के मरीजों को छह माह तक तीन दवाएं दी गईं. जिसमें बिडाक्यूलिन, प्रिटामोमेनिड और लिनोजोलेड शामलि थी. जिसका क्योर रेट 85 प्रतिशत से ज्यादा है. यह केस स्टडी मरीजों के लिए वरदान साबित होगी.


नेशनल टीबी इलेमिनेशन प्रोग्रोम में वरदान स्टडी:एचओडी प्रो. संतोष कुमार ने बताया कि जिस तरह के रिजल्ट तीन दवाओं के डोज से आए हैं. इससे हो सकता है कि इस पायलट प्रोजेक्ट को नेशनल टीबी इलेमिनेशन प्रोग्रोम में शामिल कर दिया जाए. जिससे पीएम मोदी के टीबी मुक्त भारत अभियान में तेजी आएगी और लक्ष्य जल्द पूरा हो जाएगा.

देश में सात संस्थान में पायलट प्रोजेक्ट:एसएनएमसी के टीबी एंड चेस्ट एचओडी प्रो. संतोष कुमार ने बताया कि चेन्नई के नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च इन ट्यूबरक्लोसिस (National Institute for Research in Tuberculosis) की ओर से देश में सात जगह पायलट प्रोजेक्ट के लिए चिन्हित की गई थी. पायलट प्रोजेक्ट में दो साइट मुम्बई, दो गुजरात, दो यूपी और एनआईआरटी (National Institute for Research in Tuberculosis) दिल्ली में एक साइट थी. यूपी में आगरा और लखनऊ के मेडिकल काॅलेज में पायलट प्रोजेक्ट की एक-एक साइट है.

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