मुरादाबाद:लोकसभा चुनाव के लिए सियासी बिसात भले ही बिछ चुकी हो लेकिन स्थानीय मुद्दे एक बार फिर राजनैतिक दलों के एजेंडे से गायब दिखाई दे रहे हैं. पीतल नगरी के नाम से दुनिया में अपनी पहचान रखने वाले मुरादाबाद जिले में पीतल का कारोबार अपनी आखिरी सांसें गिन रहा हैं, बावजूद इसके चुनावी मैदान में इसकी चर्चा तक नहीं है. एक अनुमान के मुताबिक पीतल कारोबार की बदहाली के बाद पांच लाख से ज्यादा कारीगर इस कारोबार को छोड़कर दूसरे कामों के जरिये रोजी-रोटी कमा रहे हैं.
पीतल नगरी मुरादाबाद में पीतल कारोबार चुनावी मुद्दों से गायब है. जिले के तहसील स्कूल के पास निर्यात फर्म चला रहे मसूद अली गौहर के मुताबिक पीतल के कच्चे माल की बढ़ती कीमतें, सरकार द्वारा निर्यात पर ड्रॉ बैक की दर कम करने और लगातार बढ़ते विदेशी मुकाबले से पीतल उद्योग बुरे दौर में पहुंच गया है. मसूद के पास कुछ समय पहले तक 200 कारीगर काम करते थे, लेकिन आज यह संख्या पचास तक सिमट गई है. मसूद के मुताबिक चुनाव में कोई भी पार्टी पीतल कारोबार को अपना मुद्दा नहीं बनाती और न ही नेता इस तरफ ध्यान देते हैं.
मसूद अकेले कारोबारी नहीं है जो पीतल उद्योग की बदहाली का रोना रो रहे हैं. आंकड़ों की बात की जाए तो मौजूदा वक्त में पीतल उत्पाद की जगह मिक्स मैटल और अन्य धातुओं ने ले ली है और पीतल का शुद्ध कारोबार महज बीस फीसदी तक सिमट कर रह गया है. कारोबार की बदहाली के बाद इस उद्योग से जुड़े स्थानीय कारीगर देश के दूसरे हिस्सों में पलायन कर गए है या फिर रोजगार के दूसरे साधनों को अपना रहे हैं.
स्थानीय स्तर पर पीतल उत्पादों को तैयार करने वाले दस्तकारों के मुताबिक नेताओं ने आज तक पीतल उद्योग को कोई मदद नहीं दी और चुनाव के वक्त महज वोट हासिल करने के लिए कारीगरों को भ्रमित करने का काम किया. स्थानीय लोगों के मुताबिक लोकसभा चुनाव में पीतल उद्योग की बदहाली सबसे बड़ा मुद्दा होना चाहिए था, लेकिन एक बार फिर चुनाव राजनैतिक दलों के अपने तय एजेंडे पर ही लड़ा जा रहा है. चुनावी मौसम में शहर की गलियों में इक्का- दुक्का जगहों पर जरूर पीतल की नक्काशी करते कारीगर नजर आते हैं, लेकिन मुद्दों से गायब पीतल ज्यादातर गलियों से भी गायब हो चुका है.