कोटा. राजस्थान प्रदेश का ऐसा हाड़ौती अंचल जहां, सदियों से लक्ष्मी पूजन के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा और बैलों के पूजन की परंपरा क्षेत्र के धरतीपुत्र किसान आज भी निभाते आ रहे है, बता दें कि हाड़ौती अंचल संभाग में आज भी कुछ किसान बैलों की गोवर्धन पूजा वाले दिन शाम को सूर्य के अस्त होने पर गोवर्धन पूजा शुरू करते हुए महिलाओं के मंगल गीतों के साथ बैलों की पूजा करते है.
किसान बैलों को पूरे शरीर पर मेहंदी लगाते है, बैलों के सींग पर मोरपंख, खजूर पंख और गले में बैलों के घुंघरू बांधते है. पंडित को बुलाकर परंपरागत कृषि यंत्र हल की पूजा करते है. किसान बैलों को पूजते समय रस्सी से बैलों को पकड़कर खड़े होते है. वहीं ढोल नंगाड़ों के साथ लोक और मंगल गीतों के साथ दीपावली पर घर में बने पकवान बैलों को भोग के रूप में चढ़ाते है. इसके बाद पूरा किसान परिवार बैलों को ढोक लगाता है, और कामना करता है कि खेतों में फसल का उत्पादन बढ़े, परिवार में सुख समृद्धि आए, किसान उन्नत हो. बैलों की पूजा के दौरान आतिशबाजी भी की जाती है. यह परंपरा कोटा संभाग के अब देहाती क्षेत्रों में सीमटकर रह गई है. अब ज्यादातर किसान आधुनिक कृषि यंत्र ट्रैक्टरों की पूजा करते है.