आसपुर (डूंगरपुर). साबला पंचायत समिति से 16 किमी की दूरी पर गामड़ी निठाऊआ में स्थित चौहान वंश की कुल देवी मां आशापुरा मंदिर जन-जन का आस्था का धाम बना हुआ है. मान्यता है कि आशापुरा मंदिर के दरबार में पहुंचने वाले हर भक्त की मनोकामना पूर्ण होती है. हर साल नवरात्रि पर मां के दरबार में भक्तों का तांता लगा रहता है. लेकिन कोरोना के कारण इस बार भक्तों को माता के दर्शन से संतोष करना पड़ेगा.
वागड़ के निठाऊआ में मां आशापुरा मंदिर के दरबार में भारी संख्या में भक्त पहुंचते हैं. इस मंदिर की मान्यता है कि यहां आनेवाले हर भक्त की मनोकामना पूर्ण होती है. ऐसे तो माता आशापुरा के मंदिर में आम दिनों में भक्तों का तांता लगा रहता है. लेकिन नवरात्री में दूर-दूर से भक्त माता के दरबार पहुंचते हैं लेकिन इस बार कोरोना माता और भक्त के बीच में आ रहा है. इस बार नवरात्री में भक्त माता के पूजन से वंचित हैं. कोरोना गाइडलाइन के अनुसार इस बार भक्तों को सिर्फ आशापुरा माता के दर्शन से संतोष करना पड़ रहा रहा है.
कोविड नियमों के साथ करना होगा दर्शन
इस साल सिर्फ भक्तों को दर्शन ही मिलेंगे. वो भी सोशल डिस्टेंस की कतार में मन्दिर में न अगरबत्ती, माला, तिलक, चुनरी आदि चढ़ाने पर भी पाबंदी है. वहीं मन्दिर परिसर में सजने वाली स्टॉल को भी बन्द कर दिया है और मुख्य द्वार पर भी छोटा दरवाजा ही खुला रखा है.
वहीं हर साल यहां नवरात्री महोत्सव का आयोजन होता है. जिसमें गरबा का आयोजन होता है. नवरात्र में इस मंदिर में भारी भीड़ उमड़ती थी. इसके अलावा हर माह की अष्ठमी, रविवार और मंगलवार को भी भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती थी. लेकिन कोरोना के कारण इस बार कम ही भक्त माता के दरबार में आ रहे हैं.
चौहान वंश की कुलदेवी हैं मां आशापुरा
सम्राट पृथ्वीराज चौहान की आराध्य कुलदेवी जगदंबा आशापुरा की प्रतिमा यहां विराजमान है. मान्यता है कि सांभर (राजस्थान) के पास माता ने देवगिरी पर्वत पर चौहान वंश के राजा माणकराव को आशा पालव के वृक्ष से प्रकट होकर दर्शन दिए थे. तभी भवानी को आशापुरा माताजी के नाम से पूजा जाने लगा.
चौहान राजपुतों की कुलदेवी आशापुरा माता की प्रतिमा की विक्रम संवत 1380 में शासक मोदपाल ने नाडोल (मारवाड) से यहां लाकर प्रतिष्ठा की. इसकी सर्वप्रथम प्रतिष्ठा आमेर के चौहान राजा अणोराज ने तारागढ़ पर विक्रम संवत 1180 से 1208 के मध्यकाल में करवाई थी. विक्रम संवत 1236 में पृथ्वीराज तृतीय दिल्ली के राजा बने. तब इस प्रतिमा को दिल्ली ले जाकर निगम बोध घाट पर पुरोहित गुरूराम से इसकी प्रतिष्ठा करवाई. 1249 में पृथ्वीराज के निधन हो जाने और दिल्ली में इस्लामी शासक हो जाने पर पृथ्वीराज के भाई हरराज, जो कुंवर गोविन्दराम के संरक्षक थे, वे इस प्रतिमा को रणथंभौर ले गए और प्राण प्रतिष्ठा करवाई.
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राजा हमीर के बाद रणथंभौर में भी इस्लामी शासक हो गया. तब उनके वंशज प्रतिमा को सांचौर (मारवाड़) ले गए और उसकी नाडोल में प्राण प्रतिष्ठा करवाई. कालान्तर इसी वंश में मोदपाल नाडोल के शासक बने. चौदहवीं शताब्दी में मुस्लिम हमलवारों ने नाडोल पर आक्रमण कर दिया. नाडोल की सुरक्षा खतरे में पड़ गई. मोदपाल के 32 पुत्र थे. इनमें 28 पुत्र लडाई में काम आएं. काकाजी गंगदेव व मोदपाल ने मिलकर वीरता दिखाई.