भरतपुर.इतिहास में महायुद्ध के नाम से विख्यात हुए खानवा युद्ध के बारे में बताते है जहां बाबर और मेवाड़ के शासक राणा सांगा के बीच भयानक युद्ध हुआ. जिसमें दोनों तरफ से लाखों की संख्या में सेना ने भाग लिया. खानवा का मैदान पहली बार युद्ध में इस्तेमाल की गई तकनीकी का भी गवाह रहा है.
खानवा के मैदान में ही राणा सांगा को लगे थे 80 घाव खानवा के मैदान में आज भी चट्टानों पर गोला बारूद के निशान है. गोलिया से छलनी पहाड़ आसानी से देखें जा सकते है. जिसको देखकर आप अंदाजा लगा सकते है की कितना भीषण युद्ध हुआ होगा. भरतपुर-धौलपुर रोड पर रूपवास के पास ही खानवा गांव है. यहां का कण-कण आज भी इस युद्ध की गवाही देता है. खानवा के मैदान में पहली बार युद्ध में तोपों का इस्तेमाल किया गया था.
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मेवाड़ के राणा सांगा और बाबर के मध्य 17 मार्च 1527 को युद्ध लड़ा गया था.युद्ध करते हुए राणा सांगा की एक आंख, एक हाथ, एक पैर क्षतिग्रस्त हो गए थे और उनके शरीर में करीब 80 जख्म आए थे. बावजूद राणा सांगा युद्ध मैदान में डटे रहे. भारत में मुगलों के प्रवेश को रोकने के लिए ये युद्ध हुआ था. युद्ध में राणा सांगा के बेहोश होने के बाद उनके सरदार उनको दूर एक सुरक्षित स्थान पर ले गए. जहां उनका इलाज कराया गया. लेकिन थोड़ा ठीक होने पर राणा सांगा ने फिर से युद्द करने की इच्छा जताई थी. तभी एक असंतुष्ट उनके सरदार ने उनको जहर दे दिया था. जिसके कारण उनकी 1528 में मौत हो गयी थी और इस खानवा युद्ध को बाबर जीत गया था.
चट्टानों पर गोलियों के निशान इतिहासकारों की माने तो खानवा एक गांव था. जो आज भरतपुर जिले में आता है. जो उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के फतेहपुर सीकरी के पास है. लेकिन खानवा युद्ध के समय यह युद्ध स्थल खानवा फतेहपुर सीकरी में आता था और कहा जाता है की पहले वहां सिकरवार जाटों का राज था. इसलिए उसे सीकरी नाम दिया गया. बाद में बाबर द्वारा खानवा युद्ध को फतेह करने के बाद सीकरी का नाम फतेहपुर सीकरी रखा गया. वहीं खानवा की पहाड़ियां पर जो खानवा युद्ध की भूमि थी. वहां पर राज्य सरकार की तरफ से स्मारक भी बनाया गया है. बता दें कि खानवा गांव में साल 2007 में राणा सांगा स्मारक बनाया गया था. पहाड़ी पर स्थित इस ऐतिहासिक स्मारक की तस्वीर वीर योद्धा राणा सांगा की वीरता का बखान करती है. स्मारक स्थल पर इस युद्ध में भाग लेने वाले योद्धाओं की मूर्तियां भी वीरों की गाथा का गुणगान करती है.
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राणा सांगा अपने पिता रायमल की मौत के बाद मेवाड़ के शासक बने थे. जिन्होंने अपने राज्य का विस्तार किया और राजपूतों को इकठ्ठा करने का काम किया साथ ही दिल्ली पर शासन करने वाले लोदी राजवंश को हराया था. जिसमें उन्होंने काबुल आदेश भेजकर बाबर को साथ देने के लिए भी बुलाया था. मगर बाद में राज्य विस्तार की लालसा के चलते दोनों के बीच खाई पैदा हो गयी और 1527 में पानीपत युद्ध की सफलता के बाद इन दोनों के बीच खानवा का युद्द हुआ.
बाबर के मन में राणा का भय भगवान श्रीकृष्ण की भक्त मीराबाई राणा सांगा के बड़े पुत्र भोजराम की पत्नी थी. बाद में इसी पीड़ी के महाराणा प्रताप और बाबर के पौत्र अकबर के बीच भी हल्दीघाटी का युद्ध हुआ था. राजस्थान की इस मिट्टी में जन्म लेने वाले वीर योद्धाओं की कभी भी कमी नहीं रही. जिन्होंने अपनी ताकत का लोह हमेशा मनवाया था.
प्रख्यात इतिहासकार मजूमदार ने भी खानवा युद्ध का वर्णन किया है. जहां उन्होंने इस युद्द पर काफी अच्छा प्रकाश डाला है और बताया गया है की आज जो खानवा गांव है. वहां एक पहाड़ी आज भी स्थित है. जहां राणा सांगा ने अपनी सेना के साथ डेरा डाला था. जहां पहाड़ी पर आज भी बाबर द्वारा चलाई गयी तोपों के गोलों के निशान देखे जा सकते है.
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कई अंग्रेज विद्वानों ने भी अपने गजेटियर में खानवा युद्ध का वर्णन किया है. जो युद्ध के बाद यहां देखने के लिए आये थे और वे गजेटियर आज भी लन्दन स्थित लाइब्रेरी में रखे हुए है. दरअसल बाबर की राज्य विस्तार लालसा के चलते राणा सांगा से मतभेद हो गया था. क्योंकि राणा सांगा देश में हिंदुत्व स्थापित करना चाहते थे. मगर बाबर द्वारा पूरे देश पर अपनी बादशाहत स्थापित करनी थी. जिसके चलते दोनों के बीच खानवा युद्ध हुआ. जहां राणा सांगा बेहद गंभीर घायल हो गए थे और उसके बाबजूद वह फिर से युद्ध करना चाहते थे. जिसके चलते खुद राणा सांगा के किसी सरदार ने ही उनकी विष देकर हत्या कर दी थी.