बांसवाड़ा.राजस्थान का दक्षिणी भाग वागड़ अंचल कहलाता है, जो कि घने वनों से घिरा हुआ है. बांसवाड़ा, डूंगरपुर और प्रतापगढ़ जिले को अपने आंचल में समेटने वाले वागड़ अंचल का जलवायु प्रदेश के अन्य हिस्सों के मुकाबले काफी अच्छा माना जाता है. इसके पीछे मुख्य वजह बड़े-बड़े जंगल का होना है. इन जिलों की बड़ी आबादी इन जंगलों में ही निवास करती है अर्थात वन उपज इन लोगों की आजीविका का मुख्य आधार है, इनमें एक महुआ भी शामिल है.
इन दिनों अंचल के जंगलों में महुआ की महक महसूस की जा सकती है. इस बीच बड़ी संख्या में महुआ के पेड़ों पर फूल खिले नजर आते हैं. यह न केवल हथकढ़ शराब बनाने के काम आता है, बल्कि सैकड़ों आदिवासी परिवार इससे अपना जीवन गुजर-बसर कर रहे हैं. इन दिनों महुआ इन लोगों के लिए इनकम का एक प्रमुख स्त्रोत माना जा सकता है. हालांकि, यह एक सीजनली उत्पाद है लेकिन यह बहुत से परिवारों की हर छोटी-बड़ी जरूरतों को पूरा कर रहा है.
बता दें कि घने जंगलों के साथ-साथ आबादी वाले इलाके में भी महुआ के बड़े-बड़े कई पेड़ है. प्रतापगढ़ से लेकर बांसवाड़ा और डूंगरपुर क्षेत्र में आने वाले जंगलों में महुआ के इन पेड़ों को देखा जा सकता है. एक अनुमान के अनुसार इन तीनों जिलों में करीब 5000 से अधिक महुआ के बड़े-बड़े पेड़ है. अप्रैल के बाद से ही इन पेड़ों पर फूल खिलने लग जाते हैं, जो मई तक पककर तैयार हो जाते हैं और स्वत: ही गिरने लगते हैं. फूलों की भीनी-भीनी महक इन घने जंगलों में इनका आभास करा देती है.
सूरज निकलने के साथ ही बिनाई
दरअसल, मई के पहले पखवाड़े से ही महुआ के फूल पीली पड़ने के साथ गिरने लग जाते हैं. इन फूलों को आसपास के लोग एकत्र करने के लिए सूरज निकलने के साथ ही पहुंच जाते हैं. इसके लिए शाम को ही पेड़ के आसपास जमीन को साफ कर दिया जाता है. ताकि सुबह होते ही इन फूलों को एकत्र किया जा सके. महुआ के हर फूल को बिनना होता है, ऐसे में पूरे परिवार के लोग फूल इकट्ठे करने में लग जाते हैं. इसके बाद शाम को फिर फूल बिनाई में जुट जाते हैं.