अजमेर. मुस्लिम समुदाय के लोग ईद मिलादुन्नबी को लेकर उत्साहित है. इस मुबारक मौके पर 27 सितंबर को अजमेर में अंदरकोट क्षेत्र से लेकर सुभाष उद्यान तक जुलूस निकाला जाएगा। इस बार मुस्लिम समुदाय की ओर से जुलूस के माध्यम से आमजन को क्लीन अजमेर ग्रीन अजमेर का संदेश दिया जाएगा. जश्ने ईद मिलादुन्नबी के जलसे मुस्लिम समुदाय की कई संस्थाएं व्यवस्थाओं में शिरकत करती है. इनमें सूफी इंटरनेशनल संस्था भी शामिल है.
सूफी इंटरनेशनल के अध्यक्ष हाजी सरवर सिद्दीकी ने प्रेस वार्ता में बताया कि जश्ने ईद मिलादुन्नबी का दिन मुस्लिम समुदाय के लिए विशेष है. इस दिन पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब का जन्मदिन है. ईद उल मिलादुन्नबी के अवसर पर अंदरकोट क्षेत्र में ढाई दिन के झोपड़े से जश्ने ईद मिलादुन नबी का जुलूस निकाला जाएगा. यह जुलूस सुबह 9 बजे रवाना होगा जो त्रिपोलिया गेट होता हुआ दरगाह के निजाम गेट से होकर दरगाह बाजार, देहली गेट, गंज, फव्वारा सर्किल होते हुए सुभाष उद्यान पहुंचेगा. चिश्ती ने बताया कि जुलूस में हमेशा की तरह इस बार डीजे नहीं बजेगा. साथ ही देहली गेट के समीप लोंगिया क्षेत्र से बड़ी संख्या में लोग ढोल नगाड़ों के साथ जुलूस में शामिल हुआ करते थे उन्हें भी ढोल बजाने से मना किया गया है. उन्होंने कहा कि यह एक धार्मिक पर्व है. इस विशेष पर्व पर मुस्लिम समुदाय के लोग पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब का गुणगान करते हैं. चिश्ती ने कहा कि अजमेर में 27 सितंबर को निकलने वाला जश्ने ईद मिलादुन्नबी के जुलूस में गंगा जमुनी तहजीब भी देखने को मिलती है. पैगंबर मोहम्मद साहब केवल मुस्लिम समुदाय के लिए ही नहीं बल्कि पूरी इंसानियत के लिए हैं. पैगंबर मोहम्मद साहब से पहले औरतों को जिंदा दफनाने की प्रथा थी. जंग के दौरान फसलों और पेड़ों को जला दिया जाता था. बच्चों और औरतों को कैद कर लिया जाता था. इसके साथ ही गुलामी प्रथा थी. हजरत पैगंबर मोहम्मद साहब ने उन सभी कुप्रथाओं को बंद करवा दिया. चिश्ती ने बताया कि जुलूस में हजारों की संख्या में लोग शामिल होंगे. व्यवस्थाओं के लिए जुलूस में 500 वालंटियर्स होंगे. इन सभी वालंटियर्स का बाद में सूफी इंटरनेशनल संस्था की ओर से 5 सितंबर को आयोजित कार्यक्रम में सम्मान भी किया जाएगा. सुरक्षा की दृष्टि से जुलूस के दौरान ड्रोन से निगरानी भी होगी. ताकि जुलूस में कोई सामाजिक गतिविधि ना हो और देश का माहौल खराब ना हो। जुलूस की रिकॉर्डिंग भी होगी.
पढ़ेंहिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल है सेठ मोहन अग्रवाल का परिवार, 1963 से बना रहा ताजिया