भोपाल।मध्य प्रदेश पहले ही महिला अपराधों और नाबालिगों से दुष्कर्म के मामले में अव्वल है और अब प्रदेश में नाबालिगों के आत्महत्या के मामलों में भी बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है. मामूली बातों और विवादों के चलते ही नाबालिग मौत को गले लगा रहे हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक हर महीने करीब 10 से 12 मामले सामने आ रहे हैं. जिनमें छोटी-छोटी बातों के चलते ही बच्चे इतना बड़ा कदम उठा रहे हैं.
नाबालिगों के आत्महत्या के ग्राफ में हुई बढ़ोतरी भोपाल में मामूली कारणों से नाबालिगों ने लगाया मौत को गले:-
⦁ 4 अक्टूबर को श्यामला हिल्स थाना क्षेत्र में रहने वाली 9 वर्षीय छात्रा ने महज इसलिए फांसी लगा ली क्योंकि उसकी मां ने खरगोश के साथ खेलने से मना किया था. मां की डांट से नाराज होकर बच्ची ने छत पर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली.
⦁ 23 जुलाई को 12वीं कक्षा के छात्र ने पढ़ाई के तनाव में रिजल्ट आने से पहले ही मौत को गले लगा लिया. जबकि रिजल्ट आने के बाद पता चला कि उसने 92 प्रतिशत से परीक्षा पास की थी.
⦁ 26 सितंबर को सौम्या हेरिटेज में रहने वाले 12 वर्षीय छात्र ने फांसी लगा ली. पुलिस की पड़ताल में सामने आया कि छात्र पढ़ाई को लेकर तनाव में था.
⦁ 17 अगस्त को दानिश कुंज में रहने वाले बीबीए स्टूडेंट ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. पुलिस की पड़ताल में पता चला है कि लॉकडाउन के दौरान हॉस्टल से छात्र को 2 महीने का एडवांस का पैसा वापस नहीं किया जा रहा था.
⦁ अगस्त माह में ही टीटी नगर थाना क्षेत्र निवासी छात्र 12वीं कक्षा के रिजल्ट आने के बाद दो विषयों में फेल हो गया. जिसके तनाव के चलते छात्र ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली.
⦁ 10 जुलाई को दसवीं क्लास के छात्र ने खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली थी. बताया जा रहा है कि माता-पिता देर रात तक घूमने पर डांट फटकार लगाते थे. आत्महत्या से पहले इंस्टाग्राम पर लिखा जिस इंसान को हद से ज्यादा दर्द मिलता है वह रोता नहीं बल्कि सीधे खामोश हो जाता है.
मामूली कारणों के चलते नाबालिग कर रहे आत्महत्या
चाइल्ड लाइन और पुलिस के पास भी लगातार ऐसे मामलों की संख्या बढ़ती ही जा रही है. जो मामूली विवाद को लेकर ही बड़ा कदम उठा रहे हैं. खास तौर पर किसी तरह के लगाम लगाने के चलते इस तरह के मामले ज्यादा देखने को मिले हैं. जिनमें मोबाइल नहीं चलाने को लेकर या फिर परिजनों की डांट से दुखी होकर ही बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं. भोपाल में ही काउंसलर और मनो चिकित्सकों के पास ऐसे करीब ढाई हजार से ज्यादा बच्चे हैं जो डिप्रेशन के चलते आत्महत्या करने की कोशिश कर चुके हैं या फिर आत्महत्या करने की कगार पर खड़े हैं.
परिजनों की लापरवही से बच्चे हो रहे डिप्रेशन का शिकार
पुलिस अधिकारियों के मुताबिक चाइल्डलाइन के साथ मिलकर लगातार इस दिशा में काम किया जा रहा है. सभी अधिकारी कर्मचारियों को निर्देश दिए गए हैं कि अगर कहीं से भी इस तरह की सूचना मिले या मदद के लिए कॉल करें तो तत्काल प्रभाव से ऐसे बच्चों की काउंसलिंग करवाई जाए. उन्होंने कहा कि कई मामलों में परिजन बच्चों पर ध्यान नहीं दे पाते हैं. जिसकी वजह से बच्चे सबसे ज्यादा डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं.
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पढ़ाई का तनाव बन रहा आत्महत्या का कारण
बाल आयोग के सदस्य बृजेश सिंह चौहान का कहना है कि हाल ही में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिसमें तनाव या फिर पढ़ाई के चलते बच्चों ने आत्महत्या की है. उन्होंने कहा कि बाल आयोग इसे लेकर जागरूकता कार्यक्रम चलाएगा. जिसमें बच्चों और उनके माता-पिता को शामिल किया जाएगा. साथ ही जागरूकता कार्यक्रम के लिए पुलिस और अन्य विभागों की मदद ली जाएगी.
पुलिस और बाल आयोग कर रहे जनजागरूकता का कार्य
मध्यप्रदेश के अलग-अलग जिलों और खास तौर पर भोपाल में नाबालिगों के आत्महत्या के मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है. बच्चों को डिप्रेशन से बाहर निकालने के लिए पुलिस और बाल आयोग जैसी संस्था में लगातार काम कर रही है. लेकिन ज्यादातर मामले ऐसे भी सामने आए हैं जहां बच्चे मामूली कारणों के चलते आत्महत्या जैसा कदम उठा रहे हैं. उम्मीद है कि इनकी जागरूकता कार्यक्रमों से नाबालिगों के आत्महत्या के मामलों में कमी आएगी.