हजारीबागः हजारीबाग जिले को प्रकृति ने खुले मन से सजाया है. प्राकृतिक खूबसूरती तो इसकी पहचान है यहां की कला संस्कृति की पहचान भी सात समंदर पार तक है. इन्हीं में से एक है हजारीबाग की सौ साल पुरानी रामनवमी जुलूस की परंपरा. इसकी शुरुआत 1918 से हुई, जिसने अंतरराष्ट्रीय फलक तक अपनी पहचान बनाई है. जिसको देखने के लिए विदेशों से भी लोग आते हैं. लोकसभा में भी इसकी चर्चा हो चुकी है. आप भी जानिए यहां के रामनवमी जुलूस का इतिहास.
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हजारीबाग के रामनवमी का इतिहास 100 साल पुराना है. झारखंड के लोग इसके इंटरनेशनल रामनवमी होने का दावा भी करते हैं. आयोजन की कवरेज के लिए विभिन्न मीडिया चैनलों के अलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर के रिपोर्टर्स और मीडिया घराने के लोग हजारीबाग आते हैं. इस बार भी यहां विदेशी पत्रकारों का जमघट लगा है. इसके इतिहास की अगर बात की जाए तो 1918 में गुरु सहाय ने इस जुलूस की शुरुआत की थी. इसके पीछे भी किंवदंती है कि गुरु सहाय को सपना आया था कि आप महावीर झंडा लेकर पूरे क्षेत्र में भ्रमण करें. इसके बाद उन्होंने 5 दोस्तों के साथ भ्रमण किया. तभी से हर साल यहां जुलूस निकालने की परंपरा शुरू हुई.
प्रारंभिक दौर में गुरु सहाय और उनके मित्रों द्वारा महावीर झंडे का जुलूस निकाला गया और गाजे-बाजे के साथ विभिन्न मंदिर का भ्रमण किया गया. उनकी मृत्यु के बाद उनके परिवार वाले और समाज के लोगों ने इस जुलूस को आगे बढ़ाया. जिसमें तय किया गया कि हर साल भगवान राम का जन्म उत्सव मनाया जाएगा. जुलूस की परंपरा को शहर के समाजसेवी हीरालाल महाजन, टोबरा गोप, कर्मवीर, कन्हैया, घनश्याम, पांचू गांव जैसे राम भक्तों ने आगे बढ़ाया. उन्होंने 1960 में महासमिति का गठन किया.
हजारीबाग गोवा टोली द्वारा ताशा पार्टी को पहली बार 1970 में लाया गया. कहा जाए तो उसी साल से ताशे की परंपरा भी रामनवमी जुलूस से जुड़ गई. कोलकाता और पूरे पश्चिम बंगाल से ताशे वाले हजारीबाग आने लगे. हजारीबाग बड़ा अखाड़ा के महंत बताते हैं कि समय के साथ-साथ रामनवमी जुलूस की शक्ल भी बदलती चली गई. बाद में हजारीबाग में रामनवमी जुलूस 3 दिनों का होने लगा. झांकियों का प्रचलन 1980 के दशक से शुरू हुआ. हजारीबाग और उसके आसपास के जिलों के कई अखाड़े यहां पहुंचने लगे. रामनवमी के समय मोहल्ले को अखाड़ा नाम दिया गया.