करनाल:हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का बड़ा महत्व होता है. कहा जाता है कि पितरों की शांति के लिए पितृ पक्ष मनाया जाता है. पितृ पक्ष में लोग घरों में श्राद्ध करते हैं. पितरों को जल अर्पित करते हैं. जिस दिन पितरों का स्वर्गवास हुआ होता है उस तिथि को याद कर अन्न और वस्त्र के दान करने की मान्यता है. वहीं बात करें हरियाणा के पिहोवा की तो हिंदू धर्म में पिहोवा को पितरों का तीर्थ स्थान कहा गया है. पितरों की मुक्ति और उनके श्राद्ध के लिए लोग हरियाणा के कुरुक्षेत्र से कुछ ही दूर बसे पिहोवा तीर्थ जाते हैं.
पितरों की तीर्थ नगरी पिहोवा:हिंदू धर्म में पिहोवा को पितरों का तीर्थ कहा गया है. आमतौर पर पर पिंड दान करने की जब बात आती है तो लोग बिहार में मौजूद गया तीर्थ को ही अहमियत देते हैं. लेकिन पिहोवा का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है. यह बात लगभग हर किसी को पता है कि कुरुक्षेत्र महाभारत की युद्ध भूमि रही है. यहां पर पांडवों और कौरवों के बीच घमासान युद्ध हुआ था. इस युद्ध में पांडवों के कई सगे संबंधी मारे गए थे. तब युद्ध की समाप्ति के बाद पांडवों ने भगवान श्रीकृष्ण के साथ मिलकर अपने सगे संबंधियों की आत्मा को शांति पहुंचाने के लिए पिहोवा की धरती पर ही श्राद्ध (Shradh in Pitru Paksha) किया था. तब से पिहोवा को पितरों का तीर्थ स्थल माना गया है.
Pitru Paksha 2022: हरियाणा के इस जगह श्राद्ध करने से पितरों को मिलती है शांति, पांडवों ने किया था यहीं पर श्राद्ध - Shradh in Pitru Paksha
हरियाणा के करनाल में पितृ पक्ष में पितरों को दान (Pitru Paksha 2022) करने के लिए यहां हजारों की संख्या में लोग पहुंचते हैं. मान्यता है कि करनाल के पिहोवा में महाभारत काल के दौरान पांडवों ने अपने पितरों का दान यहीं से किया था. हरियाणा के कुरुक्षेत्र के पिहोवा को तीर्थ नगरी भी कहा जाता है.
मिलती है पितरों को शांति :मान्यता है कि प्रेत पीपल पर जल चढ़ाने से जहां पूर्वजों की आत्मा को अक्षय तृप्ति मिलती है, वहीं पूर्वज प्रेत योनि में न जाकर बैकुंठ को प्राप्त होते हैं. तीर्थ पुरोहित ने बताया कि प्रेत पीपल पर सूत रूपी धागा लपेटने से भूत-प्रेत या भटकती हुई मृत आत्माओं को पीपल से बांध देने की मान्यता महाभारत काल से चली आ रही है. तीर्थ पुरोहित ने बताया कि ऐसी भी मान्यता है कि जिन लोगों के पितर स्वप्न में दिखाई देते हैं या किसी प्रकार से तंग करते हैं, तो उन लोगों को प्रेत पीपल पर जल चढ़ाना और सूत बांधना अनिवार्य है. पुरोहित विनोद शास्त्री ने बताया कि प्रेत पीपल ब्रह्माजी का रूप है. जल चढ़ाने का अर्थ है कि मृत पितरों को स्वर्ग की यात्रा के दौरान उन्हें प्यास न लगे वहीं सूत लपेटने का अर्थ है कि पितर सरस्वती तीर्थ पर ब्रह्माजी के साथ बंधे रहें और उन्हें परेशान न करें. उन्होंने बताया कि महाभारत काल में भी युधिष्ठिर ने भी अपने पूर्वजों व सगे संबंधियों की आत्मिक शाति के लिए प्रेत पीपल पर जल चढ़ाया और सूत लपेटा था. यही कारण है कि चैत्र-चौदस मेले में विभिन्न राज्यों से लाखों श्रद्धालु तीर्थ पर स्नान करने के बाद प्रेत पीपल पर जल चढ़ाना व सूत लपेटना नहीं भूलते.
पितृ पक्ष कब है : (when is Pitru Paksha) हिंदू पंचांग के मुताबिक, पितृ पक्ष-2022 (Pitru Paksha 2022) की शुरुआत 10 सितंबर से होगी. बता दें कि हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से पितृ पक्ष शुरु होता है. इस साल यह तिथि 10 सितंबर से आरंभ होकर 25 सितंबर तक चलेगी.