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Republic Day Special: "गणतंत्र दिवस जैसा हमने देखा, साल बदले हैं, उल्लास नहीं" - gaiety remains same in Republic Day

राष्ट्र अपना 73वां गणतंत्र दिवस मना रहा है, लेकिन प्रारंभ से लेकर अभी तक का सफर काफी अनोखा रहा है. इस दौरान देश काफी बदला है. ईटीवी भारत की टीम ने इसी बदलाव को जानने की कोशिश की है और उन बुजुर्गों से बात की, जिन्होंने इस दौरान बदलते भारत को देखा है. आइए जानते हैं, इन 8 दशकों में कितना कुछ बदला है.

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Published : Jan 23, 2023, 3:21 PM IST

ग्रीन पार्क एक्सटेंशन में रहने वाले 79 वर्ष के जेआर गुप्ता से बातचीत

नई दिल्ली: देश अपना 73वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहा है. इस दौरान ईटीवी भारत ने दिल्ली के उन वरिष्ठ नागरिकों से बात की, जिन्होंने गणतंत्र के पहले दशक से लेकर आठवें दशक तक का सफर तय किया है. उन्होंने बैल गाड़ियों में बैठकर परेड में हिस्सा लेने पहुंचे नागरिकों को देखा और अब राजपथ पर परमाणु सुसज्जित मिसाइलों को भी देख रहे हैं. देश की उन्नति के साथ ही नागरिक अधिकारों को लेकर संविधान और कानूनी प्रक्रियाओं में बदलाव के भी साक्षी रहे हैं.

ग्रीन पार्क एक्सटेंशन में रहने वाले 79 वर्ष के जेआर गुप्ता बताते हैं कि पहला गणतंत्र तो उनके बालपन में बीता, लेकिन उसके बाद उन्होंने दिल्ली के 60 से ज्यादा गणतंत्र दिवस देखे हैं. राजपथ जो वर्तमान में कर्तव्य पथ के नाम से जाना जाता है, वहां पर हो रहे बदलावों के वह खुद साक्षी हैं. उन्होंने बताया कि राष्ट्र ने निश्चित ही उन्नति की है, लेकिन सामाजिक रूप से यह कमजोर हुआ है. हालांकि, बुजुर्गों की चिंता को लेकर संविधान प्रदत्त शक्तियों को वह एक उपहार मानते हैं.

उन्होंने बताया पिछले 73 वर्षों में राष्ट्र के गणतंत्र घोषित होने का उल्लास आज भी कम नहीं हुआ है. परेड के दौरान मौजूद दर्शकों का उल्लास और युवाओं का जोश यह बताने के लिए काफी है कि गणतंत्र दिवस को मैंने जैसा पहली बार देखा था, आज भी वैसा ही है. गणतंत्र के उल्लास में कोई कमी नहीं आई है. उन्होंने कहा कि आगे आने वाले समय में एक गणतांत्रिक राष्ट्र के रूप में हमारी जिम्मेदारियां और भी बढ़ेंगी. यह सफर अनवरत रूप से आगे बढ़ता रहेगा.

लाजपत नगर में रहने वाले सुरदीप बैसोया ने बताया कि वह पिछले 82 सालों से दिल्ली में ही रह रहे हैं. पहले वह पास के ही कालका गढ़ी गांव में रहते थे. शहर के बदलाव के साथ-साथ देश की उन्नति और जश्न मनाने के अंदाज में बदलाव अपनी आंखों से देखा है. उन्होंने बताया कि जहां पहले गणतंत्र दिवस एक उत्सव के तौर पर होता था. वहीं, अब ज्यादातर लोगों के लिए यह एक सरकारी छुट्टी रह गया है. हालांकि अभी भी पुरानी पीढ़ी के लोग गणतंत्र दिवस परेड को लेकर उत्साहित होते हैं.

उन्होंने बताया कि संविधान सभी को एक समान अवसर और एक समान सम्मान देता है. लेकिन हाल के कुछ दिनों में जिस तरह से संवैधानिक मूल्यों का पतन हुआ है, वह चिंताजनक है. राष्ट्र के रूप में वैज्ञानिक उन्नति जरूरी है, लेकिन हमें अपने मौलिक चरित्र को भी बनाए रखना होगा. इसी से लोगों की आस्था एक राष्ट्र के तौर पर बनी रहेगी.

सरिता विहार के रहने वाले हरीश भार्गव पिछले 40 वर्षों से दिल्ली में रह रहे हैं. वह मूल रूप से राजस्थान के रहने वाले हैं. मध्य पूर्व एशिया और अफ्रीका की कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों में अपनी सेवाएं दे चुके हरीश भार्गव अपने अनुभव साझा करते हुए बताते हैं कि गणतंत्र दिवस को लेकर दिल्ली में हमेशा से ही उत्साह दिखाई देता था. हर जगह बढ़ी हुई सुरक्षा और तिरंगे में रंगी इमारतें आंखों को सुकून देती थी. उन्होंने कहा कि पहले आतंकवाद जैसी समस्या का विस्तार अधिक ना होने के चलते आम लोग गणतंत्र दिवस से अधिक जुड़ पाते थे, लेकिन अब आतंकी घटनाएं अधिक बढ़ गई हैं. ऐसे में कड़ी सुरक्षा और शामिल होने के लिए पेचीदा व्यवस्था होने के चलते लोगों की सहभागिता कम हुई है. वह जोड़ते हैं कि 73 साल के सफर को अगर हम देखें तो निश्चित ही देश में उन्नति की और संविधान ने खुद को अपडेट भी किया.

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कानूनों में होने वाले बदलाव को सकारात्मक ढंग से देखते हुए वह बताते हैं कि जो कानून अब इस्तेमाल के नहीं हैं, उन्हें ढोने से कोई फायदा नहीं. ऐसे में संविधान प्रदत्त शक्तियों से सरकारें उन कानूनों को खत्म कर रही हैं. वह आत्मविश्वास के साथ जोड़ते हैं कि आगे भी राष्ट्र इसी तरह अपनी सफलताओं को दोहराएगा और विश्व को लोकतांत्रिक व्यवस्था का सफलतम उदाहरण बनकर दिखाएगा.

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